
सिफारिश का फोन आते ही फाइल दौड़ती है… आम आदमी की बारी कब आएगी? कहते हैं लोकतंत्र में जनता मालिक होती है। लेकिन कभी-कभी लगता है कि मालिक को ही अपना काम कराने के लिए किसी की सिफारिश की जरूरत पड़ जाती है। आम आदमी आवेदन लेकर पहुंचता है “साहब, मेरा काम कब होगा?”जवाब मिलता है “प्रक्रिया में है… देखेंगे… समय लगेगा।” फिर कहीं से एक फोन आता है “इनका काम देख लेना।” और अचानक वही प्रक्रिया तेज हो जाती है। फाइल चलती है, टेबल बदलती है और काम की रफ्तार भी बदल जाती है। यही वह जगह है जहां सवाल पैदा होता है- क्या व्यवस्था नियम से चल रही है या पहचान से? नेताओं का सम्मान होना चाहिए। जनप्रतिनिधियों के माध्यम से जनता की समस्याएं प्रशासन तक पहुंचना भी लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन जब किसी नागरिक का जायज काम केवल इसलिए पीछे रह जाए क्योंकि उसके पास कोई सिफारिश नहीं है, तब व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है। भ्रष्टाचार सिर्फ पैसे के लेन-देन का नाम नहीं है। जब नियम सबके लिए समान न रहें, तब भी व्यवस्था की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा होता है। आज सुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही की बातें खूब हो रही हैं। अब जरूरत इस बात की है कि इन शब्दों का असर सरकारी दफ्तर की उस कुर्सी तक भी पहुंचे, जहां एक आम नागरिक अपनी समस्या लेकर बैठा है। क्योंकि लोकतंत्र की असली परीक्षा बड़े मंचों पर नहीं होती। उसकी परीक्षा तब होती है, जब एक सामान्य आदमी बिना पहचान, बिना दबाव और बिना सिफारिश के अपना जायज काम कराने सरकारी कार्यालय पहुंचता है।
अब आपकी बारी…
सरकारी दफ्तरों में अपना काम करवाते समय आपके अनुभव क्या रहे है? क्या आज भी आम आदमी को अपना काम कराने के लिए किसी पहचान या सिफारिश की जरूरत पड़ती है? क्या अधिकारी और कर्मचारी सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार कर रहे हैं? या व्यवस्था धीरे-धीरे बदल रही है? आप क्या सोचते हैं? अपनी बात कमेंट में लिखिए। क्योंकि सवाल किसी एक व्यक्ति या संस्था का नहीं है, सवाल उस व्यवस्था का है, जिसे जनता की सेवा के लिए बनाया गया है।
जनता की सेवा में व्यवस्था झुके
व्यवस्था के सामने जनता नहीं।
✍️राजिद अहमद
उपाधि धारक पत्रकार
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