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ब्रह्मांड ज्ञान

@brahmandgyan
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⚛️ क्या ब्रह्मांड का हर इलेक्ट्रॉन बिल्कुल एक जैसा है? यह बात सुनने में साधारण लगती है, लेकिन इसके पीछे भौतिकी का एक बेहद दिलचस्प विचार छिपा है।

प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी जॉन व्हीलर ने एक हैरान कर देने वाला विचार रखा था। उनका मानना था कि ब्रह्मांड में मौजूद सभी इलेक्ट्रॉन इतने पूरी तरह एक जैसे हैं कि शायद वे अलग-अलग कण नहीं, बल्कि एक ही इलेक्ट्रॉन हैं, जो समय में आगे और पीछे यात्रा करता हुआ हमें अलग-अलग जगहों पर दिखाई देता है।

इस विचार को One-Electron Universe Hypothesis कहा जाता है। यह एक रोचक सैद्धांतिक परिकल्पना थी, जिसने वैज्ञानिकों को कणों और समय के बारे में नए तरीके से सोचने पर मजबूर किया।

हालाँकि, आज तक इस परिकल्पना को साबित करने वाला कोई प्रत्यक्ष वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिला है, इसलिए इसे स्थापित वैज्ञानिक तथ्य नहीं माना जाता। फिर भी यह आधुनिक भौतिकी के सबसे दिलचस्प विचारों में से एक है।

कई बार विज्ञान सिर्फ जवाब नहीं देता, बल्कि ऐसे सवाल भी खड़े करता है जो हमारी सोच की सीमाएँ बदल देते हैं।

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पेट अक्सर भारी रहता है, गैस या कब्ज परेशान करती है? खाने की कुछ आसान चीजें पाचन को बेहतर रखने में मदद कर सकती हैं।

दही में जीवित अच्छे बैक्टीरिया यानी प्रोबायोटिक्स हो सकते हैं। कुछ शोधों में प्रोबायोटिक्स को कब्ज के लक्षणों और आंतों की गतिविधि में सुधार से जोड़ा गया है।

छाछ भी हल्का और आसानी से लिया जाने वाला डेयरी फूड है। इसमें पानी के साथ प्रोटीन, कैल्शियम जैसे पोषक तत्व मिलते हैं। अगर इसे बहुत ज्यादा नमक या मसाले के साथ न लिया जाए, तो यह रोज की डाइट का हिस्सा बन सकती है।

केला पेट के लिए एक आसान फल है। इसमें कार्बोहाइड्रेट और फाइबर होते हैं, हालांकि कब्ज में हर व्यक्ति का अनुभव अलग हो सकता है। इसलिए इसे किसी पक्के इलाज की तरह नहीं देखना चाहिए।

मेथी दाना खास तौर पर फाइबर के लिए जाना जाता है। इसमें मौजूद फाइबर आंतों की नियमित गतिविधि में मदद कर सकता है। 

पेट को स्वस्थ रखने के लिए सिर्फ एक-दो चीजों पर निर्भर रहने के बजाय फाइबर वाली डाइट, पर्याप्त पानी, फल-सब्जियां और रोज की physical activity ज्यादा मायने रखती है।

ओरिजन सोर्स: एनआईएच और हार्वर्ड

आपके पेट के लिए इनमें से सबसे पसंदीदा चीज कौन-सी है?

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अगर आज हम एक सामान्य रॉकेट में बैठकर सौर मंडल की सैर पर निकलें, तो सबसे पहले एक बात जान लीजिए... अंतरिक्ष फिल्मों की तरह कुछ घंटों में ग्रहों तक पहुँचना संभव नहीं है। असलियत इससे कहीं ज़्यादा दिलचस्प है।

मान लीजिए हमारा रॉकेट औसतन 40,000 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से उड़ रहा है। सबसे पहले सामने आएगा चंद्रमा, और वहाँ पहुँचने में लगेंगे करीब 3 दिन।

इसके बाद बारी आएगी शुक्र की। पृथ्वी का सबसे नज़दीकी ग्रह होने के बावजूद वहाँ पहुँचने में लगभग 5 महीने लग सकते हैं। और अगर लक्ष्य मंगल हो, तो सफर करीब 6 महीने का हो सकता है। यही वजह है कि मंगल मिशन इतने लंबे और चुनौतीपूर्ण होते हैं।

अब ज़रा और आगे बढ़ते हैं। बृहस्पति, सौर मंडल का सबसे बड़ा ग्रह, वहाँ पहुँचने में करीब 5 साल लग सकते हैं। उसके बाद शनि, जिसकी खूबसूरत रिंग्स दुनिया भर में मशहूर हैं, वहाँ तक पहुँचने में लगभग 7 साल का समय लग सकता है।

लेकिन असली धैर्य की परीक्षा तो इसके बाद शुरू होती है। अरुण (यूरेनस) तक पहुँचने में करीब 8.5 साल, जबकि सबसे दूर के प्रमुख ग्रह वरुण (नेपच्यून) तक पहुँचने में लगभग 12.5 साल लग सकते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि बुध सूर्य के सबसे पास होने के बावजूद वहाँ पहुँचना हमेशा सबसे आसान नहीं होता। सूर्य के बेहद शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण और जटिल कक्षीय मार्गों की वजह से कई मिशनों को वहाँ पहुँचने में करीब 7–8 साल तक लग चुके हैं।

हालाँकि, ये सभी समय अनुमानित हैं। वास्तविक यात्रा मिशन की तकनीक, रॉकेट की गति, ग्रहों की उस समय की स्थिति और चुने गए उड़ान मार्ग पर निर्भर करती है।

यानी अंतरिक्ष में दूरी सिर्फ़ किलोमीटर से नहीं, बल्कि सालों के धैर्य से भी मापी जाती है।

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मंगल ग्रह तक पहुँचने की रेस शुरू हो चुकी है। लेकिन अगर एक ही मंज़िल तक अलग-अलग रफ्तार से जाया जाए, तो सफर कितना बदल जाता है, इसका अंदाज़ा शायद आपने कभी नहीं लगाया होगा।

सबसे पहले बात करते हैं प्रकाश की। अगर किसी तरह प्रकाश की गति से मंगल की ओर जाया जा सके, तो पृथ्वी और मंगल की उस समय की दूरी के अनुसार वहाँ पहुँचने में सिर्फ़ 3 से 22 मिनट लगेंगे। लेकिन इंसानों के लिए यह फिलहाल असंभव है, क्योंकि कोई भी अंतरिक्ष यान प्रकाश की गति के करीब भी नहीं पहुँच सकता।

अब आते हैं असली अंतरिक्ष यात्रा पर। आज के आधुनिक रॉकेट, जैसे मंगल मिशनों में इस्तेमाल होने वाले अंतरिक्ष यान, आमतौर पर 6 से 9 महीने में मंगल तक पहुँचते हैं। यही वजह है कि हर मंगल मिशन की महीनों पहले से तैयारी करनी पड़ती है।

अब ज़रा सोचए... अगर वही सफर किसी हवाई जहाज़ से करना पड़े। क्योंकि उसकी गति रॉकेट से बहुत कम होती है, इसलिए मंगल तक पहुँचने में लगभग 20 से 30 साल लग सकते हैं।

अगर कोई 100 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से कार चलाकर निकल जाए, तो यह सफर और भी हैरान कर देगा। मंगल तक पहुँचने में करीब 200 से 300 साल लग सकते हैं। यानी कई पीढ़ियाँ गुजर जाएँगी, लेकिन मंज़िल शायद तब भी दूर होगी।

और अगर कोई पैदल ही मंगल की ओर चल पड़े... तो यह यात्रा लगभग 4,000 से 6,000 साल तक खिंच सकती है।

हालाँकि, ये सभी आँकड़े अनुमानित हैं। क्योंकि पृथ्वी और मंगल के बीच की दूरी हमेशा एक जैसी नहीं रहती। दोनों ग्रह लगातार सूर्य की परिक्रमा करते रहते हैं, इसलिए मिशन का समय, चुना गया मार्ग और रॉकेट की तकनीक यात्रा की अवधि को बदल सकते हैं।

यानी अंतरिक्ष में सिर्फ़ दूरी ही नहीं, रफ्तार भी किस्मत बदल देती है।

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खून की सेहत के लिए चुकंदर, लहसुन और अनार को अच्छा माना जाता है, लेकिन इनके बारे में सोशल मीडिया पर कई बातें बढ़ा-चढ़ाकर कही जाती हैं।
इन तीनों में कुछ पोषक तत्व और पौधों से मिलने वाले compounds जरूर होते हैं, लेकिन इन्हें किसी बीमारी का इलाज समझना सही नहीं है।

चुकंदर में फोलेट, आयरन और नाइट्रेट जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं। आयरन शरीर में हीमोग्लोबिन बनाने के लिए जरूरी है, जबकि फोलेट लाल रक्त कोशिकाओं के बनने में भूमिका निभाता है। 

लेकिन सिर्फ चुकंदर खाने से कम हीमोग्लोबिन या एनीमिया ठीक हो जाएगा, ऐसा कहना सही नहीं है। अगर शरीर में आयरन की कमी है, तो उसके कारण का पता लगाना और जरूरत के हिसाब से इलाज करना जरूरी है।

लहसुन की बात करें तो इसमें कई bioactive compounds होते हैं। कुछ रिसर्च में इसके सेवन को ब्लड प्रेशर और दिल की सेहत से जुड़े फायदे से जोड़ा गया है, लेकिन इसे सीधे “खून साफ करने वाला” खाना कहना सही नहीं होगा।

अनार में पॉलीफेनॉल और दूसरे antioxidants पाए जाते हैं। ये शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से निपटने में भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन अनार को हीमोग्लोबिन बढ़ाने की पक्की दवा मानना ठीक नहीं है। 

एक और आसान बात याद रखो—पौधों से मिलने वाले आयरन को शरीर उतनी आसानी से नहीं सोखता जितना heme iron को। खाने में विटामिन सी वाली चीजें साथ लेने से plant-based iron का absorption बेहतर हो सकता है। 

इसलिए चुकंदर, अनार और लहसुन को balanced diet का हिस्सा जरूर बनाया जा सकता है, लेकिन इन्हें “खून साफ करने” या एनीमिया का इलाज बताना सही नहीं है।

ओरिजन सोर्स: एनआईएच और यूएसडीए

तुम इनमें से कौन-सी चीज रोजाना खाना पसंद करोगे?

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भारत में एआई की दौड़ अब सिर्फ सॉफ्टवेयर तक नहीं रही।
एलएंडटी को मिला एक ऐसा ऑर्डर, जो देश के एआई इंफ्रास्ट्रक्चर की तस्वीर बदल सकता है।

भारत की लार्सन एंड टुब्रो (एलएंडटी) को अमेरिकी एआई क्लाउड कंपनी टुगेदर एआई से करीब 1.57 अरब डॉलर, यानी लगभग 15,000 करोड़ रुपये तक का बड़ा ऑर्डर मिला है। इसके तहत चेन्नई में एक विशाल एआई डेटा सेंटर तैयार किया जाएगा।

यह कोई सामान्य डेटा सेंटर नहीं होगा। यहां करीब 10,000 एनवीडिया बी300 जीपीयू लगाए जाने हैं। यही जीपीयू बड़े एआई मॉडल की ट्रेनिंग, उन्हें चलाने और भारी कंप्यूटिंग वाले कामों को संभालने में मदद करेंगे।

आसान भाषा में समझें तो एआई जितना बड़ा और ताकतवर होता जा रहा है, उसे चलाने के लिए उतनी ही ज्यादा कंप्यूटिंग पावर चाहिए। यही पावर देने के लिए ऐसे बड़े डेटा सेंटर बनाए जा रहे हैं।

एलएंडटी का यह प्रोजेक्ट चेन्नई में उसके डेटा सेंटर कैंपस का हिस्सा होगा। कंपनी पहले से एनवीडिया के साथ भारत में बड़े पैमाने की एआई फैक्ट्री और जीपीयू इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने की योजना पर काम कर रही है।

इसका फायदा सिर्फ एक कंपनी को नहीं होगा। भारत में बड़े एआई मॉडल की ट्रेनिंग, क्लाउड सेवाओं और हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग के लिए देश के अंदर ज्यादा क्षमता तैयार होगी।

लेकिन 1.57 अरब डॉलर को सीधे एलएंडटी की कमाई समझना सही नहीं है। यह अधिकतम ऑर्डर वैल्यू है, यानी अंतिम रकम प्रोजेक्ट की शर्तों और वास्तविक काम के दायरे पर निर्भर करेगी।

दिलचस्प बात यह है कि एलएंडटी, जो लंबे समय से इंजीनियरिंग और कंस्ट्रक्शन के लिए जानी जाती है, अब तेजी से एआई और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की तरफ बढ़ रही है।

ओरिजन सोर्स: रॉयटर्स की 13 अगस्त रिपोर्ट

क्या आपको लगता है कि ऐसे बड़े एआई डेटा सेंटर भारत को एआई की दुनिया में बड़ी ताकत बना सकते हैं?

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आज से करीब 13.8 अरब साल पहले... कुछ भी नहीं था जैसा हम आज देखते हैं। न तारे, न ग्रह, न आकाशगंगाएँ। फिर हुआ बिग बैंग, और उसी पल से शुरू हुआ ब्रह्मांड का सबसे लंबा सफर।

शुरुआत में पूरा ब्रह्मांड बेहद गर्म और ऊर्जा से भरा हुआ था। समय बीतने के साथ यह ठंडा होने लगा। फिर लगभग 13.7 अरब साल पहले, गैसों के विशाल बादलों से पहली बार तारों का जन्म हुआ। इन्हीं तारों ने ब्रह्मांड के अंधेरे को पहली रोशनी दी।

इसके कुछ समय बाद, करीब 13.6 अरब साल पहले, गैस, धूल और अरबों तारों ने मिलकर विशाल आकाशगंगाएँ बनानी शुरू कीं। इन्हीं में से एक बनी हमारी मिल्की वे, यानी आकाशगंगा।

करोड़ों नहीं, बल्कि अरबों साल गुजर गए। फिर करीब 4.6 अरब साल पहले, हमारी आकाशगंगा के एक कोने में गैस और धूल का एक बादल सिकुड़ने लगा, और उसके केंद्र में जन्म हुआ सूर्य का।

सूर्य के चारों ओर बची हुई धूल और चट्टानों के टुकड़े आपस में टकराते रहे। धीरे-धीरे उनसे ग्रह बनने लगे। करीब 4.5 अरब साल पहले, हमारी पृथ्वी अस्तित्व में आई। शुरुआती पृथ्वी आग का गोला थी, लेकिन समय के साथ ठंडी हुई, महासागर बने और आखिरकार जीवन की शुरुआत हुई।

इसी दौर में एक विशाल टक्कर के बाद पृथ्वी का चंद्रमा भी बना। चंद्रमा ने पृथ्वी की घूर्णन गति और झुकाव को काफी हद तक स्थिर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे लंबे समय में जीवन के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ बनी रहीं।

यानी आज आसमान में चमकता हर तारा, हमारी पृथ्वी, और हम खुद... 13.8 अरब साल लंबी एक ब्रह्मांडीय कहानी का हिस्सा हैं।

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सीवर की खुदाई कर रहे 18 साल के युवक को जमीन के नीचे ऐसा खजाना मिला, जिसे देखकर पहले उसे सिक्के भी मामूली लगे।
लेकिन कुछ ही देर में पता चला कि वहां करीब 98 करोड़ रुपये का सोना छिपा था।

यह मामला बेल्जियम के सिंट-गिलिस-डेंडरमोंडे का है। 18 साल का कोबे गर्मियों की छुट्टियों में कंस्ट्रक्शन का काम कर रहा था। टीम एक पुरानी इमारत में सीवर पाइप डालने के लिए खुदाई कर रही थी, तभी जमीन के नीचे कुछ चमकता हुआ दिखाई दिया।

शुरुआत में कोबे को लगा कि शायद वहां कुछ एक यूरो के सिक्के पड़े हैं। लेकिन जब खुदाई आगे बढ़ी तो सोने के सिक्कों के साथ गोल्ड बार और नगेट्स भी मिलने लगे। पूरी खोज की अनुमानित कीमत करीब 9 मिलियन यूरो, यानी लगभग 98 करोड़ रुपये बताई गई।

सबसे दिलचस्प बात यह थी कि सोना किसी खुले गड्ढे में नहीं पड़ा था। इसे एक पुराने ब्रुअरी मालिक थियोफिलस वैन अस्शे की 19वीं सदी की हवेली के तहखाने की दीवार के अंदर ईंटों से छिपाया गया था।

पुलिस की तस्वीरों में 49 गोल्ड बार और बड़ी संख्या में सोने के सिक्के दिखाई दिए। मजदूरों ने खजाना अपने पास रखने के बजाय तुरंत पुलिस और संबंधित संस्था को इसकी जानकारी दी। बाद में पूरा सोना ब्रुसेल्स की एक हाई-सिक्योरिटी सरकारी जगह पर सुरक्षित रख दिया गया।

अब सबसे बड़ा सवाल है—यह सोना आखिर किसका था?

अधिकारी इसकी origin की जांच कर रहे हैं और यह भी देखा जा रहा है कि कहीं यह चोरी या किसी अपराध से जुड़ी संपत्ति तो नहीं। वैन अस्शे परिवार के वंशजों समेत कई पक्ष ownership का दावा कर सकते हैं।

यानी 18 साल के कोबे ने खजाना जरूर खोज लिया, लेकिन 98 करोड़ रुपये अभी उसके हाथ नहीं आए हैं। आगे कानूनी जांच तय करेगी कि इस सोने का असली मालिक कौन है और खोजने वालों को कोई reward मिलेगा या नहीं।

ओरिजन सोर्स: द गार्जियन की रिपोर्ट

अगर तुम्हें ऐसा खजाना मिले, तो क्या तुम तुरंत पुलिस को बताओगे या पहले अपनी किस्मत पर यकीन करोगे?

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इंडोनेशिया में आए 7.7 तीव्रता के भूकंप ने कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों की जिंदगी बदल दी।
53 लोगों की मौत के बाद अब लगातार आ रहे आफ्टरशॉक्स ने राहत और बचाव का काम और मुश्किल कर दिया है।

यह भूकंप 15 अगस्त को फ्लोरेस द्वीप के पास आया था। इसके झटकों से घर और दूसरी इमारतें क्षतिग्रस्त हुईं, कई जगह भूस्खलन हुआ और सड़कें मलबे से बंद हो गईं।

अब तक करीब 5,000 लोगों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचाया गया है। इनमें बड़ी संख्या में लोग खुले मैदानों, स्टेडियम और अस्थायी टेंट में रह रहे हैं, क्योंकि उन्हें कमजोर इमारतों में वापस जाने से डर लग रहा है।

भूकंप के बाद लगातार आफ्टरशॉक्स दर्ज किए जा रहे हैं। रिपोर्टों के मुताबिक करीब 1,000 आफ्टरशॉक्स रिकॉर्ड हो चुके हैं। यही झटके राहत टीमों के लिए सबसे बड़ी परेशानी बन रहे हैं, क्योंकि मलबे और भूस्खलन के बीच किसी इमारत में फंसे लोगों तक पहुंचना जोखिम भरा हो गया है।

राहत और बचाव अभियान में 3,500 से ज्यादा सैनिक और पुलिसकर्मी लगाए गए हैं। टीमों का फोकस उन इलाकों पर है जहां लोग मलबे के नीचे फंसे हो सकते हैं। कई जगह साफ पानी, खाना और कंबल जैसी चीजों की जरूरत भी सामने आई है।

भूकंप से 900 से ज्यादा घर सिर्फ ईस्ट नुसा तेंगारा प्रांत में तबाह हुए हैं या बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुए हैं। कुछ जरूरी सड़कें भी बंद हैं, जिससे दूरदराज के इलाकों तक मदद पहुंचाना मुश्किल हो रहा है।

इंडोनेशिया में भूकंप का खतरा ज्यादा रहता है, क्योंकि यह पैसिफिक रिंग ऑफ फायर के इलाके में आता है, जहां कई टेक्टोनिक प्लेटें सक्रिय हैं।

फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती है—मलबे में फंसे लोगों को जल्दी निकालना और हजारों विस्थापित लोगों तक जरूरी मदद पहुंचाना।

ओरिजन सोर्स: रॉयटर्स की 16 अगस्त रिपोर्ट

क्या आपको लगता है कि भूकंप जैसे हालात में लोगों को बचाने के लिए सबसे पहले किस तरह की तैयारी जरूरी होनी चाहिए?

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करीब 440 साल पहले इटली के एक शक्तिशाली शाही परिवार में अचानक हुई एक मौत ने पूरे यूरोप में सनसनी मचा दी थी। लोग कहते थे कि राजकुमार को ज़हर देकर मार दिया गया, क्योंकि उसके दुश्मन भी कम नहीं थे। यह रहस्य सदियों तक इतिहास की सबसे चर्चित पहेलियों में से एक बना रहा।

लेकिन अब, लगभग साढ़े चार सौ साल बाद, इस रहस्य की गवाही किसी गवाह ने नहीं… बल्कि उसकी अपनी हड्डियों में बचा प्राचीन डीएनए लेकर दी है।

येल यूनिवर्सिटी और यूनिवर्सिटी ऑफ़ पीसा के वैज्ञानिकों ने ग्रैंड ड्यूक फ्रांसेस्को प्रथम डी मेडिची के कंकाल से डीएनए निकाला। जब उसकी जांच की गई, तो उसमें Plasmodium falciparum और Plasmodium malariae नाम के मलेरिया परजीवियों के आनुवंशिक निशान मिले। यानी जिस व्यक्ति के बारे में सदियों से ज़हर देने की कहानी सुनाई जाती रही, वह वास्तव में मलेरिया से संक्रमित था।

इतना ही नहीं, उसके भाई कार्डिनल जियोवानी डी मेडिची के अवशेषों में भी मलेरिया के डीएनए मिले। वैज्ञानिकों को तो Plasmodium falciparum का एक ऐसा प्राचीन स्ट्रेन भी मिला, जो पहले कभी दर्ज नहीं किया गया था। इससे यह भी पता चला कि उस दौर में यूरोप में मलेरिया पहले से कहीं ज़्यादा फैला हुआ था।

हालाँकि, एक बात अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। कुछ इतिहासकार अब भी मानते हैं कि पुराने आर्सेनिक वाले अध्ययन को पूरी तरह नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। इसलिए वैज्ञानिक यह नहीं कह रहे कि ज़हर की थ्योरी 100 प्रतिशत गलत साबित हो गई है। लेकिन प्राचीन डीएनए से मिला मलेरिया का सबूत अब तक का सबसे मजबूत वैज्ञानिक प्रमाण माना जा रहा है कि उनकी मौत का असली कारण मलेरिया था, न कि कोई राजनीतिक साज़िश।

यह खोज दिखाती है कि आज का विज्ञान केवल भविष्य नहीं बदल रहा, बल्कि सदियों पुराने इतिहास के रहस्यों से भी धीरे-धीरे पर्दा उठा रहा है।

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प्लैंक देखने में आसान लगती है, लेकिन एक छोटी गलती भी पूरी एक्सरसाइज का असर बदल सकती है।
खासकर जब कूल्हे नीचे गिरने लगें या सिर जरूरत से ज्यादा ऊपर उठ जाए, तो फॉर्म बिगड़ जाती है।

प्लैंक एक कोर एक्सरसाइज है, जिसमें पेट, पीठ और पेल्विस के आसपास की मांसपेशियां मिलकर शरीर को स्थिर रखने का काम करती हैं। सही तरीके से करने पर यह कोर की ताकत और शरीर की स्थिरता बढ़ाने में मदद कर सकती है। 

सबसे आम गलती है कूल्हों को नीचे छोड़ देना। इससे शरीर की सीधी लाइन टूट जाती है। दूसरी तरफ कूल्हों को बहुत ज्यादा ऊपर उठाना भी सही फॉर्म नहीं है। प्लैंक में सिर, पीठ, कूल्हे और पैर एक नियंत्रित लाइन में रखने की कोशिश करनी चाहिए।

पेट और नितंबों को ढीला छोड़ना भी बड़ी गलती है। कोर को हल्का कसकर रखना शरीर को स्थिर रखने में मदद करता है। साथ ही सांस रोकने के बजाय आराम से सांस लेते रहना चाहिए। 

सिर को ऊपर उठाकर सामने देखने की जरूरत नहीं है। सिर और गर्दन को पीठ के साथ सीधी, प्राकृतिक स्थिति में रखना बेहतर है। कोहनियां कंधों के नीचे रहें और पैरों की उंगलियां जमीन पर मजबूती से टिकी रहें।

एक और गलती है सिर्फ ज्यादा देर तक टिके रहने के लिए फॉर्म बिगाड़ देना। एसीई के मुताबिक, प्लैंक में समय बढ़ाने के चक्कर में कूल्हे नीचे गिरना, नितंब ऊपर उठना या कंधे ढहना आम समस्या हो सकती है। 

इसलिए 30 सेकंड सही फॉर्म वाली प्लैंक, गलत तरीके से कई मिनट टिकने से बेहतर हो सकती है।

अगर प्लैंक करते समय कमर या किसी जोड़ में दर्द हो, तो एक्सरसाइज रोककर विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर है।

ओरिजन सोर्स: मेयो क्लिनिक और एसीई

क्या आप प्लैंक करते समय इनमें से कोई गलती करते हो?

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मंगल के आसमान में छिपा एक छोटा सा चंद्रमा 149 साल पहले इंसानों की नजर में आया था।
इस खोज ने मंगल के बारे में हमारी समझ को एक नई दिशा दी।

17 अगस्त 1877 को अमेरिकी खगोलशास्त्री आसफ हॉल ने मंगल के छोटे चंद्रमा फोबोस को खोज निकाला। यह खोज वॉशिंगटन डीसी स्थित अमेरिकी नौसेना वेधशाला में की गई थी।

दिलचस्प बात यह है कि फोबोस की खोज अचानक नहीं हुई थी। आसफ हॉल कई रातों से मंगल के आसपास किसी चंद्रमा की तलाश कर रहे थे। पहले उन्हें डीमोस मिला और उसके करीब छह दिन बाद फोबोस भी उनकी नजर में आ गया।

फोबोस मंगल से बेहद करीब है। यह मंगल की सतह से लगभग 6,000 किलोमीटर ऊपर घूमता है और सिर्फ करीब 7 घंटे 39 मिनट में मंगल का एक चक्कर पूरा कर लेता है। इतनी तेज परिक्रमा के कारण मंगल की सतह से देखने पर यह एक ही दिन में कई बार आसमान पार करता दिखाई दे सकता है।

इस छोटे चंद्रमा की सतह पर स्टिकनी क्रेटर नाम का एक विशाल गड्ढा है, जिसका व्यास करीब 9.7 किलोमीटर है। यह फोबोस की चौड़ाई का लगभग आधा हिस्सा घेरता है। इसका नाम आसफ हॉल की पत्नी एंजेलिन स्टिकनी के नाम पर रखा गया था।

और सबसे हैरान करने वाली बात इसका भविष्य है।

मंगल का गुरुत्वाकर्षण फोबोस को धीरे-धीरे अपनी तरफ खींच रहा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक आने वाले करोड़ों वर्षों में यह मंगल से टकरा सकता है या टूटकर मंगल के चारों तरफ एक रिंग बना सकता है।

यानी जिस चंद्रमा को इंसानों ने 1877 में पहली बार देखा था, उसका भविष्य शायद मंगल के साथ जुड़कर खत्म होगा।

ओरिजन सोर्स: नासा की आधिकारिक रिपोर्ट

आपको क्या लगता है, फोबोस आखिर मंगल से टकराएगा या एक शानदार रिंग में बदल जाएगा?

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🚀 क्या सच में नील आर्मस्ट्रांग को चांद से लौटते ही जेल भेज दिया गया था?

यह बात सुनने में चौंकाने वाली लगती है, लेकिन पूरी सच्चाई कुछ और है। जब अपोलो 11 मिशन के बाद नील आर्मस्ट्रांग, बज़ एल्ड्रिन और माइकल कॉलिन्स पृथ्वी पर लौटे, तो उन्हें जेल नहीं, बल्कि 21 दिनों के क्वारंटीन (अलग निगरानी) में रखा गया था।

वैज्ञानिकों को आशंका थी कि कहीं चांद से कोई अज्ञात सूक्ष्मजीव पृथ्वी पर न आ जाए। इसलिए उनकी और उनके साथ लाए गए चंद्र नमूनों की सावधानीपूर्वक जांच की गई। जब यह सुनिश्चित हो गया कि कोई खतरा नहीं है, तब उन्हें बाहर आने की अनुमति दी गई।

यानी वायरल दावा "जेल" का नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सुरक्षा के लिए किए गए क्वारंटीन का था।

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करीब 4,000 साल पहले का प्राचीन मिस्र… जहाँ राजाओं की कहानियाँ तो हर कोई जानता है, लेकिन अब एक नई खोज ने इतिहास की सबसे दिलचस्प पहेलियों में से एक को फिर से खोल दिया है।

वैज्ञानिकों ने मिस्र की पाँच राजकुमारियों और एक राजा के कंकालों का आधुनिक तकनीकों से दोबारा अध्ययन किया। ये अवशेष 1890 के दशक में मिले थे, लेकिन सौ साल से भी ज़्यादा समय तक संग्रहालय के भंडार में पड़े रहे। जब इन्हें दोबारा जांचा गया, तो कुछ ऐसा सामने आया जिसने शोधकर्ताओं को चौंका दिया।

राजकुमारियों की कंधों, बाजुओं और हाथों की हड्डियों पर ऐसे निशान मिले, जो आमतौर पर तब बनते हैं जब कोई व्यक्ति वर्षों तक कठिन शारीरिक अभ्यास करता है। ऐसा लगा जैसे वे सिर्फ़ महल में रहने वाली शाही महिलाएँ नहीं थीं, बल्कि नियमित रूप से अपने शरीर को ट्रेन भी करती थीं।

सबसे दिलचस्प बात यह थी कि इनकी कब्रों से पहले ही धनुष, तीर, खंजर और गदा जैसे हथियार मिल चुके थे। लंबे समय तक इतिहासकार मानते रहे कि ये सिर्फ़ धार्मिक या शाही प्रतीक थे। लेकिन अब कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि शायद ये हथियार केवल सजावट के लिए नहीं थे। हो सकता है कि ये राजकुमारियाँ वास्तव में तीरंदाजी का अभ्यास करती थीं, शिकार में हिस्सा लेती थीं या किसी तरह का सैन्य प्रशिक्षण भी लेती थीं।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। कई दूसरे विशेषज्ञ इस निष्कर्ष से पूरी तरह सहमत नहीं हैं। उनका कहना है कि सिर्फ़ हड्डियों के निशानों के आधार पर किसी को योद्धा घोषित नहीं किया जा सकता। ऐसे बदलाव दूसरी शारीरिक गतिविधियों या प्राकृतिक कारणों से भी हो सकते हैं।

यानी फिलहाल यह खोज इतिहास की एक मज़बूत संभावना पेश करती है, कोई अंतिम सत्य नहीं। लेकिन इतना ज़रूर है कि इसने प्राचीन मिस्र की राजकुमारियों की छवि बदल दी है। शायद वे केवल राजमहल की शाही महिलाएँ नहीं, बल्कि अपनी ताकत और कौशल के लिए भी जानी जाती रही हों।

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वायरस हमारे शरीर में कैसे फैलते हैं? अब तक वैज्ञानिकों को लगता था कि इसका जवाब लगभग पूरा मिल चुका है। लेकिन हाल ही में हुई एक नई खोज ने इस सोच को बदलना शुरू कर दिया है।

जब कोई वायरस हमारी किसी कोशिका पर हमला करता है, तो वह उसके अंदर अपनी लाखों कॉपी बनाता है। इसके बाद अक्सर वह कोशिका मर जाती है। वैज्ञानिक लंबे समय से मानते थे कि मरने के बाद कोशिका का काम वहीं खत्म हो जाता है। लेकिन नई रिसर्च ने एक बिल्कुल अलग तस्वीर दिखाई।

वैज्ञानिकों ने पाया कि मरती हुई कोशिका अपने पीछे छोटे-छोटे झिल्लीदार कण छोड़ सकती है। इन कणों को Extracellular Vesicles कहा जाता है और शोधकर्ताओं ने इनमें से एक खास संरचना को "FOOD" यानी Footprint Of Death नाम दिया है।

सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि अगर वह कोशिका किसी वायरस से संक्रमित थी, तो इन छोटे कणों के अंदर वायरस के प्रोटीन, और कुछ मामलों में पूरे वायरस कण भी मौजूद हो सकते हैं।

अब यही कण आसपास की दूसरी स्वस्थ कोशिकाओं तक पहुँचकर वायरस को आगे ले जाने में मदद कर सकते हैं। यानी वायरस सिर्फ़ कोशिका के फटने से ही नहीं, बल्कि मरती हुई कोशिका द्वारा छोड़े गए इन सूक्ष्म पैकेट्स के ज़रिए भी फैल सकता है।

हालाँकि, यहाँ एक बात समझना बहुत ज़रूरी है। यह खोज अभी प्रयोगशाला में किए गए अध्ययनों पर आधारित है। वैज्ञानिकों ने कोई यह दावा नहीं किया है कि सभी वायरस इसी तरीके से फैलते हैं। फिलहाल इसे वायरस फैलने का एक नया संभावित तरीका माना जा रहा है, जिस पर आगे और शोध जारी है।

अगर भविष्य के अध्ययन भी इस खोज की पुष्टि करते हैं, तो वायरस के खिलाफ नई दवाएँ और उपचार विकसित करने का रास्ता खुल सकता है। यानी कभी-कभी एक मरती हुई कोशिका भी विज्ञान को ज़िंदगी बचाने का नया सुराग दे जाती है।

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एक शिक्षक ने अपनी क्लास में ऐसा नजारा देखा कि वह खुद को रोक नहीं पाए।
सिर्फ चार शब्दों का जवाब लिखने में छात्रों को परेशानी हुई, और शिक्षक की आंखों से आंसू निकल आए।

यह मामला अमेरिका के ह्यूस्टन स्थित व्हीटली हाई स्कूल का है। शिक्षक डेरियस विलियम्स ने स्कूल के दूसरे ही दिन अपनी सीनियर क्लास को पढ़ने और लिखने का एक आसान सा काम दिया।

छात्रों को दो छोटे पैराग्राफ पढ़ने थे और एक अधूरे वाक्य में सिर्फ चार शब्द भरने थे। शिक्षक के मुताबिक उन्होंने पहले उदाहरण समझाया, साथ में टेक्स्ट को एनोटेट किया और जवाब तक पहले बता दिए। फिर भी कई छात्र इस काम को पूरा नहीं कर पाए।

यही देखकर विलियम्स भावुक हो गए। उन्होंने सोशल मीडिया पर बताया कि उन्हें सबसे ज्यादा चिंता इस बात की थी कि 17 और 18 साल के कुछ छात्र हाई स्कूल के आखिरी साल में पहुंचने के बावजूद बेसिक रीडिंग और राइटिंग में संघर्ष कर रहे हैं।

लेकिन इस घटना का मतलब यह नहीं है कि व्हीटली हाई स्कूल के सभी छात्र पढ़ना-लिखना नहीं जानते। यह एक शिक्षक का अपनी क्लास में देखा गया अनुभव है, जिसे पूरे स्कूल के हर छात्र पर लागू नहीं किया जा सकता।

इस घटना ने अमेरिका की एजुकेशन सिस्टम पर फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। खास बात यह है कि व्हीटली में पिछले कुछ सालों में अकादमिक सुधार भी हुआ है, फिर भी कुछ छात्रों की बेसिक लिटरेसी को लेकर चिंता बनी हुई है।

शिक्षक की आंखों में आए आंसू सिर्फ एक क्लास की कहानी नहीं, बल्कि उस सवाल को सामने लाते हैं कि अगर कोई छात्र हाई स्कूल के आखिरी साल तक पहुंच गया, तो उसकी बुनियादी पढ़ाई कमजोर रहने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?

ओरिजन सोर्स: ह्यूस्टन क्रॉनिकल की रिपोर्ट

आपके हिसाब से बच्चों की ऐसी स्थिति के लिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी किसकी होनी चाहिए—स्कूल, माता-पिता या पूरा एजुकेशन सिस्टम?

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क्या मौत के बाद भी इंसान की यादें, सोच और personality जिंदा रह सकती है?
वैज्ञानिकों के सामने एक ऐसा आइडिया है, जो भविष्य में इंसान और कंप्यूटर के रिश्ते को पूरी तरह बदल सकता है।

इसे माइंड अपलोडिंग या होल-ब्रेन इम्यूलेशन कहा जाता है। इसमें विचार यह है कि इंसान के दिमाग को इतनी बारीकी से स्कैन किया जाए कि उसके neural connections, memories और सोचने के तरीके का एक digital model बनाया जा सके।

फिर उस मॉडल को कंप्यूटर पर चलाया जाए। अगर यह कभी पूरी तरह संभव हुआ, तो कंप्यूटर में मौजूद डिजिटल रूप इंसान की तरह यादें याद कर सकता है, सवालों के जवाब दे सकता है और पुराने अनुभवों के आधार पर बातचीत कर सकता है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यहीं से शुरू होता है।

क्या वह सच में वही इंसान होगा, या सिर्फ उस इंसान की बेहद सटीक copy?

क्योंकि वैज्ञानिक अभी तक consciousness यानी चेतना को पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं। सिर्फ दिमाग की जानकारी को कंप्यूटर में कॉपी कर देना और असली चेतना को ट्रांसफर कर देना एक ही बात नहीं है।

इंसानी दिमाग बेहद जटिल है। उसके हर neural connection और उनकी activity को सही तरीके से रिकॉर्ड करना आज की technology से बहुत दूर है।

फिर भी research आगे बढ़ रही है। वैज्ञानिक पूरे दिमाग के computational models और digital brain जैसी technologies पर काम कर रहे हैं। 2025 के एक वैज्ञानिक सर्वे में विशेषज्ञों ने भविष्य में human whole-brain emulation की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया, हालांकि इसकी timing को लेकर काफी अनिश्चितता है।

इसका मतलब यह नहीं कि आज इंसान की मौत के बाद उसकी consciousness को कंप्यूटर में जिंदा किया जा सकता है। अभी यह एक future possibility है, proven technology नहीं।

अगर कभी ऐसा हुआ, तो सबसे बड़ा सवाल technology का नहीं, पहचान का होगा—कंप्यूटर में मौजूद डिजिटल इंसान क्या सच में वही इंसान होगा?

ओरिजन सोर्स: नेचर और पीएमसी रिसर्च

अगर इंसान की पूरी यादें और personality कंप्यूटर में कॉपी हो जाएं, तो क्या तुम उसे वही इंसान मानोगे?

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जेम्स वेब टेलीस्कोप ने ब्रह्मांड में एक ऐसा रहस्यमयी पिंड खोजा है, जिसे देखकर वैज्ञानिक भी हैरान हैं।
यह तारे जैसा दिखता है, लेकिन इसके अंदर छिपा हो सकता है एक तेजी से बढ़ता ब्लैक होल।

इसका नाम एमओएम-बीएच-स्टार-1 रखा गया है। यह ब्रह्मांड के उस दौर का है, जब बिग बैंग के करीब 66 करोड़ साल ही हुए थे। वैज्ञानिकों के मुताबिक यह पिंड लगभग पूरे सौरमंडल जितने क्षेत्र में फैला हो सकता है।

इसके बीच में एक बेहद विशाल ब्लैक होल है, जिसके चारों तरफ बहुत घनी और गर्म गैस का घेरा मौजूद है। ब्लैक होल जब आसपास की गैस को तेजी से अपनी तरफ खींचता है, तो यह गैस इतनी गर्म हो जाती है कि जबरदस्त रोशनी पैदा करती है।

यही वजह है कि बाहर से यह किसी विशाल चमकते तारे जैसा नजर आता है, जबकि इसकी ऊर्जा का असली स्रोत ब्लैक होल हो सकता है। रिपोर्टों के मुताबिक इसकी चमक किसी सामान्य तारे की तुलना में करीब 100 अरब गुना ज्यादा हो सकती है।

सबसे दिलचस्प कड़ी है लिटिल रेड डॉट्स।

जेम्स वेब ने शुरुआती ब्रह्मांड में ऐसे छोटे लाल पिंडों की बड़ी संख्या देखी थी, जिनकी असली पहचान लंबे समय से वैज्ञानिकों के लिए पहेली बनी हुई है। अब वैज्ञानिकों का मॉडल बताता है कि ऐसे ब्लैक होल स्टार इन रहस्यमयी लाल बिंदुओं के पीछे छिपे हो सकते हैं।

अगर यह विचार आगे की रिसर्च में सही साबित होता है, तो इससे यह समझने में मदद मिल सकती है कि ब्रह्मांड के शुरुआती दौर में इतने बड़े सुपरमैसिव ब्लैक होल इतनी जल्दी कैसे बन गए।

हालांकि अभी इसे अंतिम रूप से साबित हुई नई श्रेणी मानना जल्दबाजी होगी। वैज्ञानिक इसे एक मजबूत संभावित व्याख्या के रूप में जांच रहे हैं।

ओरिजन सोर्स: एमआईटी और नेचर रिसर्च

आपको क्या लगता है, लिटिल रेड डॉट्स का रहस्य आखिर इसी ब्लैक होल स्टार से जुड़ेगा?

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एक इंसान की किडनी में एक-दो या पाँच-दस स्टोन होना तो सुना होगा… लेकिन अगर कोई डॉक्टर ऑपरेशन के दौरान एक साथ 418 किडनी स्टोन निकाल दे, तो यकीन करना भी मुश्किल हो जाता है। लेकिन हैदराबाद के AINU अस्पताल में ऐसा सचमुच हुआ।

करीब 60 साल के एक व्यक्ति को लंबे समय से किडनी स्टोन की समस्या थी। शुरुआत में दर्द ज़्यादा नहीं था, इसलिए बीमारी बढ़ती रही। लेकिन जब तेज़ पेट दर्द और लगातार उल्टियाँ शुरू हुईं, तो उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया।

जाँच में डॉक्टर भी हैरान रह गए। मरीज की बाईं किडनी में सैकड़ों छोटे-बड़े स्टोन जमा हो चुके थे और किडनी सिर्फ़ 27 प्रतिशत क्षमता से काम कर रही थी। सबसे बड़ा स्टोन लगभग 2 सेंटीमीटर का था।

आख़िर इतने सारे स्टोन बने कैसे? डॉक्टरों के मुताबिक, एक बड़ी पथरी ने मूत्र के सामान्य रास्ते को रोक दिया था। जब पेशाब पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाता, तो उसमें मौजूद कैल्शियम, ऑक्सालेट और दूसरे खनिज धीरे-धीरे जमा होने लगते हैं। समय के साथ यही छोटे-छोटे कण मिलकर नई पथरियाँ बनाते रहते हैं। यही प्रक्रिया सालों तक चलती रही और किडनी में 418 स्टोन जमा हो गए।

इसके बाद डॉक्टरों ने PCNL नाम की आधुनिक मिनिमली इनवेसिव सर्जरी की। पीठ पर एक छोटा-सा चीरा लगाकर कैमरा और विशेष उपकरण किडनी तक पहुँचाए गए। करीब दो घंटे तक चली इस जटिल सर्जरी में डॉक्टरों ने एक-एक करके सभी 418 स्टोन सफलतापूर्वक निकाल दिए और किडनी को बचाने में भी कामयाब रहे।

यह मामला इसलिए खास माना गया क्योंकि इतनी खराब हालत में भी बिना बड़ी ओपन सर्जरी किए, आधुनिक तकनीक की मदद से मरीज का सफल इलाज किया गया। यह याद दिलाता है कि अगर किडनी स्टोन के शुरुआती लक्षणों को नज़रअंदाज़ किया जाए, तो छोटी-सी समस्या भी समय के साथ बेहद गंभीर रूप ले सकती है।

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सिर्फ डेढ़ साल के इलाज के बाद एक अल्जाइमर मरीज के दिमाग में जमा प्रोटीन की परतें गायब हो गईं।
लेकिन इस खबर के पीछे की असली बात इससे भी ज्यादा दिलचस्प है।

फ्लोरिडा के 79 साल के स्कॉट मिलिंस्की को शुरुआती अल्जाइमर था। उन्हें एक नई दवा किसुनला दी गई, जिसे महीने में एक बार नस के जरिए दिया जाता है।

करीब 18 महीने में उन्होंने 18 इन्फ्यूजन लिए। इलाज के बाद जब उनका दोबारा पीईटी स्कैन किया गया, तो दिमाग में जमा एमिलॉयड बीटा प्रोटीन की प्लाक दिखाई नहीं दीं।

आसान भाषा में समझें तो अल्जाइमर में दिमाग की कोशिकाओं के आसपास कुछ प्रोटीन जमा होकर प्लाक बना सकते हैं। किसुनला का काम इन्हीं एमिलॉयड प्लाक को निशाना बनाकर शरीर की इम्यून सिस्टम की मदद से हटाना है।

लेकिन यहां एक बहुत जरूरी बात है—प्लाक साफ होने का मतलब अल्जाइमर पूरी तरह ठीक हो गया, ऐसा नहीं है।

अमेरिकी एफडीए ने किसुनला को शुरुआती अल्जाइमर यानी हल्की याददाश्त और सोचने-समझने की समस्या वाले मरीजों के लिए मंजूरी दी है। क्लिनिकल ट्रायल में इस दवा ने बीमारी से जुड़ी याददाश्त और रोजमर्रा के काम करने की क्षमता में गिरावट की रफ्तार को धीमा किया।

यानी इस मामले में सबसे बड़ी उपलब्धि दिमाग से एमिलॉयड प्लाक का लगभग पूरी तरह हटना है, न कि बीमारी का पूरी तरह खत्म हो जाना।

साथ ही यह इलाज हर किसी के लिए आसान या जोखिम-मुक्त नहीं है। किसुनला से दिमाग में सूजन या छोटे रक्तस्राव जैसी एआरआईए समस्या हो सकती है, इसलिए इलाज के दौरान एमआरआई जैसी निगरानी जरूरी होती है।

ओरिजन सोर्स: साउथ फ्लोरिडा हॉस्पिटल न्यूज़

क्या आपको लगता है कि भविष्य में ऐसे इलाज अल्जाइमर को काफी हद तक रोक पाएंगे?

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जब भी कोई इंसान रोता है, तो सिर्फ़ आँखों से आँसू नहीं निकलते... कुछ ही सेकंड बाद नाक भी बहने लगती है। ऐसा क्यों होता है? क्या रोने का नाक से भी कोई कनेक्शन है? जवाब है—हाँ, और यह पूरी तरह विज्ञान है।

हमारी आँखों के ऊपर एक छोटी-सी ग्रंथि होती है, जिसे लैक्रिमल ग्लैंड कहा जाता है। यही ग्रंथि हर समय आँसू बनाती रहती है। ये आँसू सिर्फ़ भावनाएँ दिखाने के लिए नहीं होते, बल्कि आँखों को नम रखते हैं, धूल हटाते हैं और बैक्टीरिया से भी बचाते हैं।

आमतौर पर आँसू बहुत कम मात्रा में बनते हैं। इसलिए वे आँख के अंदरूनी कोने में मौजूद छोटे-से छिद्र से होकर एक पतली नली के ज़रिए सीधे नाक के अंदर पहुँच जाते हैं। यह प्रक्रिया हर समय चलती रहती है, लेकिन हमें इसका एहसास नहीं होता।

अब जब आप ज़ोर से रोते हैं, तो लैक्रिमल ग्लैंड अचानक बहुत ज़्यादा आँसू बनाने लगती है। आँखें इतने सारे आँसू संभाल नहीं पातीं। कुछ आँसू गालों पर बह जाते हैं, जबकि बड़ी मात्रा उसी नली से नाक में पहुँच जाती है।

नाक एक साथ इतने तरल को तुरंत अवशोषित नहीं कर पाती। यही वजह है कि रोते समय नाक बहने लगती है और बार-बार उसे साफ़ करना पड़ता है। कई बार यही आँसू गले तक भी पहुँच जाते हैं।

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मालासन सिर्फ बैठने की मुद्रा नहीं, बल्कि शरीर के निचले हिस्से की mobility को बेहतर करने वाला योगासन है।

दिनभर कुर्सी पर बैठने से हमारे कूल्हे, टखने और जांघों की flexibility धीरे-धीरे कम हो सकती है। ऐसे में मालासन एक आसान तरीका हो सकता है, जो इन हिस्सों को एक साथ stretch और activate करता है।

मालासन में पैरों को थोड़ा फैलाकर गहराई से squat किया जाता है। फिर घुटनों को बाहर की तरफ रखते हुए पैरों के तलवों को जमीन पर टिकाने की कोशिश की जाती है।

इसके बाद हाथों को छाती के सामने नमस्कार की मुद्रा में जोड़ें और रीढ़ को जितना हो सके आराम से सीधा रखें। कोहनियां घुटनों के अंदर की तरफ रह सकती हैं, लेकिन घुटनों को जबरदस्ती बाहर धकेलना नहीं चाहिए।

इस मुद्रा में सबसे ज्यादा काम hips, inner thighs, ankles और lower body पर होता है। नियमित अभ्यास से squat करने की क्षमता और निचले शरीर की mobility बेहतर होने में मदद मिल सकती है।

मालासन को पाचन के लिए भी फायदेमंद बताया जाता है। गहरी squat position पेट और pelvic area के आसपास हल्का दबाव और movement पैदा करती है, जिससे कुछ लोगों को bowel movement में मदद मिल सकती है। लेकिन इसे कब्ज का इलाज नहीं माना जा सकता।

अगर एड़ियां जमीन पर नहीं टिकतीं, तो उनके नीचे मुड़ा हुआ कंबल या कोई सहारा रखा जा सकता है। शुरुआत में कुछ सांसों तक ही मुद्रा में रहें और शरीर की क्षमता के हिसाब से धीरे-धीरे समय बढ़ाएं।

लेकिन अगर घुटने, टखने, कूल्हे या कमर में दर्द या चोट है, तो मालासन जबरदस्ती न करें।

यानी मालासन का असली फायदा शरीर को जबरदस्ती मोड़ना नहीं, बल्कि hips, ankles और lower body की movement को धीरे-धीरे बेहतर करना है।
16 अगस्त 1858… संचार की दुनिया में एक ऐसा दिन, जब हजारों किलोमीटर की दूरी अचानक छोटी हो गई।

उस दौर में यूरोप से अमेरिका तक कोई जरूरी खबर पहुंचाने में कई दिन, कभी-कभी हफ्ते लग जाते थे। संदेश जहाज से भेजे जाते थे, इसलिए समुद्र पार की खबर तुरंत पहुंचाना लगभग नामुमकिन था।

लेकिन कुछ इंजीनियर और कारोबारी इस दूरी को खत्म करना चाहते थे।

अमेरिकी कारोबारी सायरस वेस्ट फील्ड ने समुद्र के नीचे एक टेलीग्राफ केबल बिछाने की कोशिश शुरू की। यह काम बिल्कुल आसान नहीं था। अटलांटिक महासागर हजारों किलोमीटर चौड़ा था और समुद्र की गहराई में केबल बिछाना उस समय बेहद चुनौतीपूर्ण तकनीकी काम था।

कई कोशिशों और असफलताओं के बाद आखिरकार यूरोप और उत्तरी अमेरिका के बीच टेलीग्राफ कनेक्शन स्थापित हो गया।

फिर आया 16 अगस्त 1858।

इस दिन पहली बार अटलांटिक के पार टेलीग्राफ संदेश भेजा गया। इसके बाद ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया ने अमेरिका के राष्ट्रपति जेम्स बुकानन को बधाई संदेश भेजा।

सोचिए, जिस खबर को पहले समुद्र पार पहुंचने में कई दिन लगते थे, अब वही संदेश एक इलेक्ट्रिक सिग्नल के रूप में समुद्र के नीचे बिछी केबल से दूसरी तरफ पहुंच रहा था।

इस उपलब्धि को उस समय संचार की दुनिया में क्रांतिकारी माना गया।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।

पहली केबल ज्यादा समय तक काम नहीं कर पाई। कुछ ही हफ्तों में सिग्नल कमजोर पड़ने लगे और आखिरकार कनेक्शन बंद हो गया।

फिर भी इस असफलता ने एक बेहद जरूरी बात साबित कर दी—महासागर के नीचे केबल बिछाकर दो महाद्वीपों को सीधे जोड़ा जा सकता है।

इसके बाद इंजीनियरों ने अपनी गलतियों से सीखा और नई तकनीक के साथ बेहतर केबल तैयार की।

1866 में एक ज्यादा सफल ट्रांस-अटलांटिक केबल स्थापित हुई।

यही कोशिशें आगे चलकर उस वैश्विक संचार व्यवस्था की नींव बनीं, जिसकी वजह से आज दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक जानकारी कुछ ही सेकंड में पहुंच जाती है।
अगर आज दुनिया का पूरा इंटरनेट, करोड़ों किताबें, तस्वीरें और ज़रूरी दस्तावेज़ एक ऐसी चीज़ में सुरक्षित रख दिए जाएँ जो आग, समय और गर्मी से लगभग बेअसर रहे, तो कैसा होगा? वैज्ञानिक अब इसी दिशा में काम कर रहे हैं।

ब्रिटेन की यूनिवर्सिटी ऑफ़ साउथैम्प्टन के वैज्ञानिकों ने एक खास 5D ऑप्टिकल मेमोरी क्रिस्टल विकसित किया है। यह कोई साधारण हार्ड डिस्क या SSD नहीं है। इसमें डेटा को लेज़र की मदद से काँच जैसे बेहद मज़बूत फ्यूज़्ड क्वार्ट्ज के अंदर बेहद सूक्ष्म स्तर पर लिखा जाता है।

इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत इसकी क्षमता है। एक ही क्रिस्टल में लगभग 360 टेराबाइट, यानी करीब 3 लाख 60 हज़ार गीगाबाइट तक डेटा सुरक्षित रखा जा सकता है।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। यह क्रिस्टल 1000 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान सह सकता है। साथ ही यह अत्यधिक ठंड, तेज़ दबाव और विकिरण जैसी कठिन परिस्थितियों में भी डेटा को सुरक्षित रखने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि सही परिस्थितियों में इसमें रखा गया डेटा अरबों वर्षों तक सुरक्षित रह सकता है। ध्यान रहे, यह अनुमान प्रयोगों और वैज्ञानिक गणनाओं पर आधारित है। किसी क्रिस्टल को वास्तव में अरबों वर्षों तक परखा नहीं गया है।

फिलहाल यह तकनीक आम लोगों के लिए उपलब्ध नहीं है। इसका उद्देश्य रोज़मर्रा की हार्ड डिस्क को बदलना नहीं, बल्कि मानव इतिहास, वैज्ञानिक शोध, सांस्कृतिक विरासत और जीनोम जैसी बेहद महत्वपूर्ण जानकारी को बहुत लंबे समय तक सुरक्षित रखना है।

यानी भविष्य में हमारी सबसे कीमती जानकारी किसी सर्वर में नहीं, बल्कि एक छोटे-से पारदर्शी क्रिस्टल के अंदर सुरक्षित हो सकती है… जो समय की सबसे कठिन परीक्षा भी झेल सके।

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