
जब आपका बच्चा अकेले बैठकर गुनगुनाने लगे और अपने खिलौनों से बातें करने लगे, तो टोकिए मत।
असल में यही उसके खुश और शांत होने की सबसे बड़ी निशानी हो सकती है।
मनोवैज्ञानिक वाइगोत्स्की ने बताया था कि बच्चे खुद से बोलकर सोचना और सीखना शुरू करते हैं। इसे "प्राइवेट स्पीच" कहते हैं। तीन से सात साल की उम्र में यह सबसे ज्यादा दिखती है और यह बच्चे के दिमागी विकास का बहुत जरूरी हिस्सा है।
जो बच्चा अंदर से सुरक्षित महसूस करता है, वही खुलकर गाता है और बेफिक्र होकर बोलता है। गाना उसका मन शांत करता है, और तुकबंदी से उसका शब्द-भंडार और याददाश्त भी मजबूत होती है।
खिलौनों से बातें करना भी कोई अजीब बात नहीं है। यह उसकी कल्पनाशक्ति और क्रिएटिविटी की निशानी है।
खुश बच्चे की और पहचान क्या है? वह खेलते-खेलते मगन हो जाता है, आसानी से हँसता है, ठीक से खाता-सोता है और नई चीजों को लेकर उत्सुक रहता है।
अब आप क्या कर सकते हैं? उसके गाने पर ध्यान दीजिए, कभी-कभी साथ में गाइए, रोज थोड़ी देर मोबाइल हटाकर सिर्फ उसके साथ बैठिए, और जब वह खुलकर बोले तो उसकी तारीफ जरूर कीजिए।
हाँ, एक बात का ध्यान रखिए। अगर बच्चा अचानक चुप हो जाए, खेलना छोड़ दे, हर वक्त डरा या उदास दिखे, तो यह बदलाव हल्के में मत लीजिए। ऐसे में डॉक्टर या चाइल्ड काउंसलर से सलाह लेना बेहतर रहता है।
याद रखिए, हर बच्चा अलग होता है। कोई कम बोलता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि कुछ गड़बड़ है।
आपका बच्चा खुश होने पर सबसे ज्यादा क्या करता है? गाता है, नाचता है या खिलौनों से बातें करता है? नीचे कमेंट में जरूर बताइए।
जानकारी का मूल स्रोत: लेव वाइगोत्स्की का प्राइवेट स्पीच सिद्धांत
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Bihar, India | Oct 2, 2026