#संगरिया पंचायत समिति की 26 पंचायतें और सवालों की चुप्पी
बोलांवाली में जांच की दस्तक… बाकी 26 पंचायतों में सन्नाटा क्यों?
संगरिया की आवाज़
#बोलांवाली ग्राम पंचायत में छह विकास कार्यों को लेकर शिकायतें हुईं, जिला परिषद की टीम ने मौके पर पहुंचकर जांच भी पूरी कर ली और अब ग्रामीणों को रिपोर्ट का इंतजार है।
शौचालय से लेकर वाटिका, सड़क और अन्य विकास कार्यों तक सवाल उठे हैं। कहीं रिकॉर्ड में दर्ज सामग्री पर सवाल है, कहीं काम की गुणवत्ता पर और कहीं भुगतान के बावजूद अधूरे काम की बात सामने आई है।
अब असली सवाल यह है—
अगर एक पंचायत में ग्रामीण सवाल पूछ सकते हैं, आरटीआई लगा सकते हैं और अधिकारियों के दरवाजे तक पहुंच सकते हैं, तो संगरिया की बाकी बची 26 ग्राम पंचायतों में जनता इतनी शांत क्यों है?
क्या वहां विकास कार्य इतने शानदार हैं कि किसी को शिकायत ही नहीं?
या फिर...
“भाई साहब, पंचायत का काम है… अपना क्या जाता है!”
यही सोच लोकतंत्र की सबसे बड़ी समस्या बन चुकी है।
गांव में सड़क बनती है—लोग उद्घाटन की फोटो खिंचवा लेते हैं।
नाली बनती है—लोग फीता काटते देख लेते हैं।
पार्क बनता है—लोग सोशल मीडिया पर बधाई दे देते हैं।
लेकिन सवाल पूछने की बारी आती है तो अचानक गांव की सामूहिक आवाज़ का नेटवर्क डाउन हो जाता है!
और अगर कोई व्यक्ति पूछ ले—
“कितने रुपये स्वीकृत हुए?”
“कितना भुगतान हुआ?”
“कितनी सामग्री लगी?”
“काम वास्तव में कितना हुआ?”
तो कुछ लोग ऐसे देखते हैं जैसे उसने गांव का राजकोष नहीं, बल्कि किसी की निजी तिजोरी का हिसाब मांग लिया हो!
भ्रष्टाचार की जड़ें मजबूत हैं या निगरानी की जड़ें कमजोर?
बोलांवाली में लगे आरोपों की सच्चाई जांच रिपोर्ट आने के बाद ही स्पष्ट होगी। लेकिन इस पूरे मामले ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—
क्या पंचायतों में होने वाले हर विकास कार्य की सामाजिक निगरानी हो रही है?
क्योंकि सरकारी पैसा किसी सरपंच, पंच, अधिकारी या ठेकेदार की निजी संपत्ति नहीं है।
यह जनता का पैसा है।
इसलिए जनता को पूछने का पूरा अधिकार है कि पैसा कहां लगा, कितना लगा और जमीन पर कितना दिखाई दे रहा है।
संगरिया की बाकी पंचायतों के जागरूक नागरिकों से भी सवाल है—
क्या आपकी पंचायत में हुए विकास कार्यों का हिसाब आपने कभी मांगा?
अगर नहीं मांगा तो फिर शिकायत सिर्फ तब क्यों, जब मामला अखबार की सुर्खी बन जाए?
लोकतंत्र में “सब चलता है” वाली मानसिकता सबसे खतरनाक है।
क्योंकि जब जनता हिसाब मांगना बंद कर देती है, तब फाइलों में विकास बहुत तेजी से दौड़ता है और जमीन पर विकास को चलने के लिए बैसाखी ढूंढनी पड़ती है!
बोलांवाली की जांच रिपोर्ट आने दीजिए। दूध का दूध और पानी का पानी होने दीजिए।
लेकिन साथ ही संगरिया की बाकी पंचायतों के ग्रामीण भी अपनी-अपनी पंचायतों के विकास कार्यों की जानकारी देखें, रिकॉर्ड मांगें, मौके पर काम देखें और गड़बड़ी लगे तो नियमानुसार शिकायत करें।
सवाल पूछना किसी के खिलाफ होना नहीं है।
सवाल पूछना जनता के पक्ष में होना है।
और आखिर में एक सीधा सवाल—
**बोलांवाली के ग्रामीण जाग गए हैं…
संगरिया की बाकी 26 पंचायतों की जनता कब जागेगी?**
कहीं ऐसा तो नहीं कि पंचायतों में भ्रष्टाचार से ज्यादा मजबूत हमारी चुप्पी की दीवारें हैं?
Vijay Singh Beniwal ✍️
संगरिया की आवाज़।
विजयसिहं बैनिवाल