#सेवा_संकल्प_अभियान
कहानी बदलाव की
खेत और पशुधन के संसाधनों से बनाई जैविक खाद, श्री कुकला ने घटाई खेती की लागत
परम्परागत कृषि विकास योजना से मिला मार्गदर्शन, एक एकड़ में सालाना लगभग 10 हजार रुपये की हो रही बचत
खेती में बढ़ती लागत के बीच खेत और पशुधन से उपलब्ध संसाधनों का सही उपयोग किसानों के लिए आर्थिक रूप से लाभकारी साबित हो सकता है। विकासखण्ड मेघनगर के ग्राम हात्यादेली के कृषक श्री कुकला ने इसे अपने खेत में अपनाकर दिखाया है। परम्परागत कृषि विकास योजना के अंतर्गत मिले प्रशिक्षण एवं तकनीकी मार्गदर्शन से उन्होंने स्वयं वर्मी कम्पोस्ट तैयार करने के साथ जैविक कीट एवं रोग नियंत्रण के उपाय अपनाए। इससे रासायनिक उर्वरकों एवं दवाओं पर उनकी निर्भरता कम हुई और खेती की लागत में भी कमी आई है।
42 वर्षीय श्री कुकला एवं उनके भाई के पास कुल 1.50 हेक्टेयर सिंचित कृषि भूमि है। पांच सदस्यीय परिवार की आजीविका मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर है। वे खरीफ में मक्का, कपास एवं सोयाबीन तथा रबी में गेहूं एवं चना की खेती करते हैं। कृषि के साथ पशुपालन भी उनकी आजीविका का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उनके पास 2 बैल, एक गाय, 3 भैंस एवं 2 पड़ापाड़ी हैं। पशुओं से मिलने वाले गोबर को बेकार जाने देने के बजाय वे इसका उपयोग जैविक खाद तैयार करने में कर रहे हैं।
परम्परागत कृषि विकास योजना से बदला खेती का तरीका
पूर्व में श्री कुकला फसल उत्पादन के लिए मुख्य रूप से रासायनिक उर्वरकों एवं अन्य बाहरी कृषि आदानों पर निर्भर थे। कम लागत में बेहतर खेती के विकल्प तलाशने के दौरान वे परम्परागत कृषि विकास योजना (PKVY) के अंतर्गत गठित क्लस्टर से जुड़े। योजना के माध्यम से उन्हें जैविक खेती का प्रशिक्षण, कृषक भ्रमण एवं तकनीकी मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। प्रशिक्षण में सीखी तकनीकों को उन्होंने केवल जानकारी तक सीमित न रखकर अपने खेत में प्रयोग करना शुरू किया।
योजना के अंतर्गत श्री कुकला को वर्मी कम्पोस्ट इकाई की स्थापना के लिए 5 हजार रुपये का अनुदान मिला। उन्होंने इकाई का नियमित संचालन करते हुए अपने पशुधन से प्राप्त गोबर का उपयोग वर्मी कम्पोस्ट बनाने में किया। श्री कुकला के अनुसार अब तक इस इकाई के माध्यम से लगभग 50 हजार रुपये मूल्य की वर्मी कम्पोस्ट खाद तैयार की गई है, जिसका उपयोग स्वयं के खेत में किया गया। इससे बाजार से खाद खरीदने की आवश्यकता कम हुई है।
एक एकड़ में लगभग 10 हजार रुपये सालाना की बचत
श्री कुकला बताते हैं कि स्वयं तैयार जैविक खाद एवं जैविक कीट नियंत्रण उपायों के उपयोग से रासायनिक उर्वरक और दवाओं पर होने वाले खर्च में उल्लेखनीय कमी आई है। उनके द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारी के अनुसार एक एकड़ भूमि पर प्रतिवर्ष लगभग 10 हजार रुपये तक की लागत की बचत हो रही है। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों से कृषि आदानों की पूर्ति होने के कारण बाजार पर उनकी निर्भरता भी कम हुई है।
गेहूं की फसल में भी अपना रहे जैविक तकनीक
वर्तमान रबी मौसम में श्री कुकला गेहूं की खेती में भी जैविक पद्धतियों का प्रयोग कर रहे हैं। बुवाई से पूर्व वर्मी कम्पोस्ट में ट्राइकोडर्मा का मिश्रण कर बीज उपचार किया गया तथा फसल की प्रारंभिक अवस्था में वर्मी-वॉश का छिड़काव किया गया। कृषक के अनुसार इससे अच्छा अंकुरण एवं फसल की स्वस्थ वृद्धि देखने को मिली है।
फसल में कीट एवं रोग नियंत्रण के लिए भी वे स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों से जैविक घोल एवं अन्य सामग्री तैयार कर आवश्यकता के अनुसार उपयोग करते हैं। इसके साथ ही फसल की नियमित निगरानी कर समय पर जैविक कीट एवं रोग प्रबंधन के उपाय किए जाते हैं।
कृषि और पशुपालन को बनाया एक-दूसरे का पूरक
श्री कुकला की खेती की विशेषता कृषि और पशुपालन का समन्वित उपयोग है। पशुओं से प्राप्त गोबर से वर्मी कम्पोस्ट तैयार होती है और यही खाद पुनः खेतों में उपयोग की जाती है। इस तरह खेत एवं पशुधन से उपलब्ध संसाधनों का पुनः कृषि उत्पादन में उपयोग कर बाहरी कृषि आदानों पर निर्भरता कम करने का प्रयास किया जा रहा है।
श्री कुकला बताते हैं कि जैविक खेती के शुरुआती वर्ष में उत्पादन में कुछ कमी महसूस हुई, लेकिन बाजार से रासायनिक उर्वरक एवं कीटनाशक नहीं खरीदने के कारण खेती की लागत भी कम हुई। लगातार जैविक तकनीकों के उपयोग और फसल की नियमित निगरानी से उनका जैविक खेती के प्रति विश्वास बढ़ा है।
सेवा-संकल्प अभियान अंतर्गत श्री कुकला की यह “कहानी बदलाव की” बताती है कि शासन की योजना से मिले प्रशिक्षण एवं तकनीकी सहयोग को स्थानीय संसाधनों के साथ जोड़कर किसान खेती की लागत कम करने की दिशा में सार्थक प्रयास कर सकते हैं। स्वयं निर्मित जैविक खाद, पशुधन का उपयोग और जैविक कीट प्रबंधन अपनाकर श्री कुकला कम लागत एवं टिकाऊ खेती की ओर आगे बढ़ रहे हैं।
Jansampark Madhya Pradesh CM Madhya Pradesh Indore Commissioner Department of Agriculture, Madhya Pradesh Department of Animal Husbandry, Madhya Pradesh #Jhabua #JansamparkMP #SevaSankalpAbhiyan #AshirwadKaDiya
9 views | Jhabua, Madhya Pradesh | Sep 29, 2026