देवास में तीन परिवीक्षाधीन पटवारियों की सेवाएं समाप्त किए जाने के अगले ही दिन बड़ा विरोध देखने को मिला। मिली जानकारी के अनुसार उज्जैन संभाग से करीब दो हजार पटवारी कलेक्टर कार्यालय पहुंचे और जमकर नारेबाजी की। इस दौरान कलेक्टर के खिलाफ भी नारे लगाए गए, जिसके बाद विरोध की भाषा और मर्यादा को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
दरअसल, कलेक्टर ऋतुराज सिंह ने शासकीय कार्यों में लापरवाही, अनुशासनहीनता और आदेशों की अवहेलना के आधार पर तीन परिवीक्षाधीन पटवारियों की सेवाएं समाप्त की थीं। विवाद की मुख्य वजह स्वामित्व योजना के तहत होने वाली रजिस्ट्री में पटवारियों को निष्पादक की भूमिका दिए जाने को लेकर है।
पटवारियों का तर्क है कि इस भूमिका के चलते भविष्य में उन्हें कानूनी विवाद और कोर्ट-कचहरी का सामना करना पड़ सकता है। उनकी इस आशंका को प्रशासन को गंभीरता से लेते हुए कानूनी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
लेकिन इसी बीच सवाल यह भी है कि ग्रामीण क्षेत्रों में राजस्व व्यवस्था की अहम जिम्मेदारी संभालने वाले पटवारी यदि इसी काम से पीछे हटेंगे, तो ग्रामीणों के जरूरी काम आगे कैसे बढ़ेंगे?
स्वामित्व योजना का उद्देश्य पात्र ग्रामीण परिवारों को आबादी क्षेत्र की संपत्ति का अधिकार-पत्र उपलब्ध कराना, उनके संपत्ति अधिकार सुरक्षित करना और जरूरत पड़ने पर बैंक से ऋण लेने में सुविधा देना है। ऐसे में यदि देवास में अब तक एक भी रजिस्ट्री नहीं हो पाई है, तो इसका असर उन ग्रामीण परिवारों पर पड़ रहा है, जिन्हें इस योजना का लाभ मिलना है।
अपनी मांग रखना पटवारियों का अधिकार है, लेकिन सरकारी व्यवस्था में विरोध के साथ जिम्मेदारी भी जरूरी है। प्रशासन को कानूनी भूमिका स्पष्ट करनी चाहिए और पटवारियों को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके आंदोलन या असहमति का खामियाजा आम ग्रामीणों को न भुगतना पड़े।
आखिर सरकारी व्यवस्था का उद्देश्य जनता को सुविधा देना है—उन्हें अपने ही काम के लिए इंतजार करवाना नहीं।
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