पत्रकार से मारपीट, मोबाइल छीना, ₹1,000 गायब करने का आरोप…
15 दिन बाद भी FIR नहीं!
वायरल वीडियो में कथित मारपीट और गाली-गलौज के दावे के बावजूद कार्रवाई पर सवाल; आरोपी पर शांति भंग की कार्रवाई के बाद मामला ठंडे बस्ते में क्यों?
कलम उठी तो दबंगों को नागवार गुजरी,
सच लिखने की कीमत क्या अब मार खाकर चुकानी पड़ेगी?
स्वतंत्रता दिवस पर समाचार कवरेज करना एक पत्रकार को कथित तौर पर भारी पड़ गया। उरई के रामेश्वर चौराहे स्थित जीवन धारा अस्पताल के सामने पत्रकार विकास कुमार के साथ मारपीट, मोबाइल छीनने, मोबाइल कवर में रखे ₹1,000 निकाल लेने और धमकी देने के आरोपों का मामला अब पुलिस प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।
पीड़ित पत्रकार का कहना है कि 15 अगस्त की घटना के बाद वह पुलिस अधीक्षक, क्षेत्राधिकारी उरई और फैक्ट्री एरिया चौकी तक शिकायत कर चुका है, लेकिन करीब 15 दिन बीतने के बाद भी उसके प्रार्थना पत्र के आधार पर मुकदमा दर्ज नहीं किया गया है।
सवाल यह है—FIR आखिर क्यों नहीं?
शिकायत के मुताबिक समाचार कवरेज के दौरान बीर सिंह राजपूत निवासी मुहाना, थाना डकोर, हाल निवासी उरई तथा प्रदुम नामक युवक अपने कुछ साथियों के साथ मौके पर पहुंचे। आरोप है कि समाचार कवरेज को लेकर अभद्रता शुरू हुई और देखते ही देखते मामला मारपीट तक पहुंच गया।
पीड़ित का आरोप है कि उसका मोबाइल छीन लिया गया और मोबाइल कवर में रखे ₹1,000 भी निकाल लिए गए। बाद में मोबाइल वापस कर दिया गया, लेकिन रुपये वापस नहीं किए गए।
मामले में पुलिस द्वारा एक आरोपी को गिरफ्तार किए जाने और बाद में शांति भंग की कार्रवाई किए जाने की बात सामने आई है।
लेकिन पीड़ित का सवाल है कि जब उसने बाकायदा प्रार्थना पत्र देकर मारपीट, मोबाइल छीने जाने, रुपये निकालने और धमकी देने जैसे आरोप लगाए हैं, तो उसकी शिकायत के आधार पर अब तक मुकदमा क्यों दर्ज नहीं किया गया?
वायरल वीडियो ने बढ़ाए सवाल
इस पूरे प्रकरण से जुड़ा वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने का दावा किया जा रहा है। पीड़ित पक्ष का कहना है कि वीडियो में कथित तौर पर गाली-गलौज और मारपीट की स्थिति दिखाई देती है।
यदि वीडियो की सत्यता पुलिस जांच में प्रमाणित होती है तो सवाल उठना स्वाभाविक है—
क्या वायरल वीडियो की जांच हुई?
क्या घटनास्थल के CCTV फुटेज सुरक्षित किए गए?
क्या सभी प्रत्यक्षदर्शियों के बयान दर्ज किए गए?
क्या वीडियो में दिखाई देने वाले प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका जांची गई?
जब शिकायत पुलिस के आला अधिकारियों तक पहुंच चुकी है तो FIR में देरी क्यों?
समझौते के दबाव का भी आरोप
पीड़ित पत्रकार की ओर से यह भी आरोप लगाया गया है कि मामले में उस पर समझौता करने का दबाव बनाया जा रहा है।
ऐसे में बड़ा सवाल यह भी है कि—
अगर आरोप गलत हैं तो निष्पक्ष जांच होने दीजिए।
अगर आरोप सही नहीं हैं तो जांच में सच सामने आ जाएगा।
लेकिन अगर वीडियो और शिकायत दोनों मौजूद हैं, तो फिर कार्रवाई से दूरी क्यों?
पत्रकार की कलम पर दबाव क्यों?
पत्रकार संगठनों का कहना है कि पत्रकार का काम समाचार को सामने लाना है।
यदि समाचार कवरेज के दौरान पत्रकार के साथ कथित मारपीट और धमकी की घटना होती है और शिकायत के बावजूद कार्रवाई लंबित रहती है, तो यह केवल एक पत्रकार का मामला नहीं बल्कि पत्रकारिता की स्वतंत्रता और कानून-व्यवस्था से जुड़ा सवाल बन जाता है।
सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि—
क्या कानून सबके लिए बराबर है?
पीड़ित पक्ष का कहना है कि जनपद में किसी पत्रकार के खिलाफ शिकायत आने पर कई बार बिना पूरी जांच के मुकदमा दर्ज किए जाने के आरोप सामने आते हैं।
ऐसे में उनका सवाल है कि जब एक पत्रकार खुद शिकायतकर्ता है और मामले से जुड़ा वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल बताया जा रहा है, तब कार्रवाई में इतनी देरी क्यों?
पुलिस प्रशासन से सीधे सवाल
15 अगस्त की घटना के बाद 15 दिन क्यों बीते?
प्रार्थना पत्र पर FIR क्यों नहीं?
क्या वायरल वीडियो की फोरेंसिक/तकनीकी जांच कराई गई?
CCTV फुटेज की जांच हुई या नहीं?
प्रत्यक्षदर्शियों के बयान दर्ज हुए या नहीं?
आरोपितों के खिलाफ सिर्फ शांति भंग की कार्रवाई पर्याप्त है?
मारपीट, धमकी और रुपये निकालने के आरोपों की जांच कहां तक पहुंची?
पीड़ित पर समझौते का दबाव किसके द्वारा बनाया जा रहा है?
यदि आरोप गंभीर हैं तो मुकदमा दर्ज करने में देरी की वजह क्या है?
और यदि आरोप गलत हैं तो निष्पक्ष जांच कर पीड़ित को भी इसकी जानकारी क्यों नहीं दी जा रही?
कलम को डराओगे तो आवाज दबेगी नहीं,
सच को सताओगे तो बात रुकेगी नहीं।
इंसाफ में देर का मतलब ये नहीं कि इंसाफ मर गया,
सवाल बस इतना है—जिम्मेदारों का जमीर क्यों सो गया?
अब निगाहें पुलिस अधीक्षक जालौन, क्षेत्राधिकारी उरई और उरई पुलिस की कार्रवाई पर टिकी हैं।
पीड़ित पत्रकार और पत्रकार संगठनों की मांग है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यदि आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो संबंधित लोगों के खिलाफ नियमानुसार कानूनी कार्रवाई की जाए।
कमेंट बॉक्स में बताइए—अगर किसी घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो और पीड़ित कई स्तरों पर शिकायत कर चुका हो, फिर भी FIR न हो तो क्या निष्पक्ष जांच के लिए पुलिस को तत्काल कार्रवाई नहीं करनी चाहिए?
नोट: खबर में लगाए गए आरोप शिकायतकर्ता/पीड़ित पक्ष के कथन पर आधारित हैं।
आरोपों की अंतिम पुष्टि पुलिस जांच और संबंधित साक्ष्यों से ही होगी
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Kalpi, Jalaun | Aug 30, 2026