चीनी के दाम जब ₹20 किलो थे, तब संसद में इसकी महंगाई को लेकर मुखरता से आवाज उठती थी। आज चीनी ₹65 किलो तक पहुंच गई है, लेकिन संसद से लेकर सियासी गलियारों तक मानो सन्नाटा पसरा हुआ है।
महंगाई का असर तब भी जनता पर था, आज भी है। सवाल सिर्फ कीमत का नहीं, बल्कि उस दोहरे रवैये का है—क्या महंगाई का मुद्दा सत्ता के हिसाब से बदल जाता है?
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