*सोने की चोरी से शुरू हुआ विवाद, पुलिस कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल*
#फरियादी के लगातार वरिष्ठ अधिकारियों से शिकायत करने के बावजूद चोरी का खुलासा नहीं; पुलिस पर गंभीर आरोप, अब मारपीट, एफआईआर और फरियादी की सुरक्षा को लेकर भी सवाल
#छतरपुर। प्रमोद तिवारी के लाखों रुपये कीमत के सोने की चोरी का मामला अब केवल चोरी के खुलासे तक सीमित नहीं रह गया है। लगातार वरिष्ठ अधिकारियों से शिकायत, थाना प्रभारी पर लगाए गए गंभीर आरोप, पुलिस और फरियादी के बीच हुआ विवाद, पुलिसकर्मियों के घायल होने की पुलिस की बात, फरियादी और उसकी पत्नी की ओर से लगाए गए मारपीट के आरोप तथा फरियादी द्वारा अपनी जान को खतरा होने की आशंका जताए जाने के बाद यह पूरा मामला अब पुलिस की कार्यप्रणाली और उसकी निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े कर रहा है।
फरियादी का दावा है कि #चोरी के खुलासे और अपना चोरी गया माल बरामद कराने के लिए उसने थाना स्तर से लेकर #आईजी, #डीआईजी, #कमिश्नर, #मुख्यमंत्री और गृहमंत्री तक आवेदन दिए। मीडिया के माध्यम से भी उसने लगातार अपनी बात सामने रखी, लेकिन उसके अनुसार अभी तक चोरी का संतोषजनक खुलासा नहीं हो सका है।
#यह सही है कि कई मामलों में चोरी का खुलासा काफी समय बाद होता है और पुलिस जांच में समय लग सकता है। लेकिन जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक लगातार वरिष्ठ अधिकारियों के सामने एक ही शिकायत लेकर पहुंचता रहे, तो उसकी शिकायत की स्थिति और उस पर हुई कार्रवाई को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना भी पुलिस प्रशासन की जिम्मेदारी बन जाती है।
****थाना प्रभारी पर गंभीर आरोप, जांच कौन करेगा?*****
फरियादी की ओर से थाना प्रभारी पर चोरी गए माल की कथित जब्ती और उस माल को हड़पने जैसे गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं।
इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी बाकी है और अंतिम सत्य जांच के बाद ही सामने आ सकता है।
***लेकिन सवाल बेहद महत्वपूर्ण है—***
जब आरोप स्वयं थाना प्रभारी पर लगे हों, तो उस थाना तंत्र के भीतर रहकर निष्पक्ष जांच किस प्रकार सुनिश्चित होगी?
क्या ऐसे मामले में किसी दूसरे थाने या स्वतंत्र वरिष्ठ अधिकारी को जांच सौंपी गई?
क्या आरोपों की जांच के दौरान थाना प्रभारी को जांच से अलग रखा गया?
क्या जब्ती और बरामदगी से संबंधित दस्तावेजों का स्वतंत्र सत्यापन कराया गया?
और सबसे महत्वपूर्ण—फरियादी द्वारा लगाए गए आरोपों पर जांच का निष्कर्ष क्या है?
##नवागत आईजी से न्याय की उम्मीद लेकर पहुंचा था फरियादी?###
बताया जा रहा है कि नवागत आईजी की छवि एक न्यायप्रिय अधिकारी के रूप में बनी है। संभवतः इसी उम्मीद के साथ प्रमोद तिवारी अपनी शिकायत लेकर आईजी से मिलने पहुंचा।
लेकिन इसके बाद घटनाक्रम ने नया मोड़ ले लिया।
जानकारी के अनुसार फरियादी और पुलिस के बीच विवाद हुआ और उसके साथ मारपीट किए जाने के आरोप सामने आए। फरियादी की पत्नी ने भी आरोप लगाया कि उसके साथ पुरुष पुलिसकर्मियों ने मारपीट की।
इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
लेकिन यदि पुलिसकर्मियों पर मारपीट के आरोप लगाकर लिखित शिकायत दी गई है तो जनता यह जानना चाहेगी कि—
क्या उस शिकायत पर एफआईआर दर्ज हुई?
यदि नहीं, तो क्यों नहीं?
क्या मामले की स्वतंत्र जांच कराई गई?
क्या फरियादी और उसकी पत्नी का मेडिकल परीक्षण कराया गया?
इन सवालों का जवाब भी उतनी ही स्पष्टता से सामने आना चाहिए, जितनी स्पष्टता से पुलिस ने फरियादी के विरुद्ध दर्ज मामले की जानकारी सार्वजनिक की है।
**पुलिस का पक्ष भी सामने आया**
दूसरी ओर, छतरपुर एसपी की ओर से जारी बयान में बताया गया कि फरियादी पुलिस पर अनावश्यक दबाव बनाने का प्रयास कर रहा था और घटनाक्रम के दौरान उसने कुछ पुलिसकर्मियों को घायल किया। इसी आधार पर उसके विरुद्ध संबंधित धाराओं में मामला दर्ज किए जाने की बात कही गई है।
यदि पुलिस का यह पक्ष सही है तो कानून के अनुसार कार्रवाई होना स्वाभाविक है।
लेकिन इसी के साथ यह भी जरूरी है कि फरियादी और उसकी पत्नी द्वारा लगाए गए पुलिस पर मारपीट के आरोपों की भी निष्पक्ष जांच हो।
कानून सभी के लिए समान होना चाहिए—चाहे आरोप पुलिसकर्मी पर हों या आम नागरिक पर।
आखिर प्रमोद तिवारी बार-बार थाना प्रभारी का नाम क्यों ले रहा है?
****यह पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है।****
यदि प्रमोद तिवारी की शिकायत निराधार है, तो जांच के बाद उसे स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि उसके आरोप तथ्यहीन क्यों हैं। जिसको लेकर आज के पूर्व आधिकारिक बयान जारी नहीं हुए।
लेकिन यदि उसकी शिकायत में प्रथम दृष्टया कोई तथ्य सामने आता है, तो उसकी स्वतंत्र जांच क्यों नहीं कराई जाए?
आखिर ऐसा क्या है कि एक व्यक्ति वर्षों से अधिकारियों के कार्यालयों के चक्कर लगाने का दावा कर रहा है?
क्यों वह लगातार थाना प्रभारी का नाम ले रहा है?
क्या उसकी मूल शिकायत की जांच पूरी हुई?
क्या उसे लिखित रूप में जांच का निष्कर्ष दिया गया?
क्या चोरी गए माल की बरामदगी और जब्ती के संबंध में उसे स्पष्ट जानकारी दी गई?
इन सवालों का जवाब इस पूरे विवाद की दिशा तय कर सकता है।
***थाना प्रभारी की पूर्व #पृष्ठभूमि की भी हो निष्पक्ष जांच***
फरियादी की ओर से यह भी दावा किया जा रहा है कि संबंधित थाना प्रभारी पर पूर्व में #सागर में भी आरोप लग चुके हैं और विभागीय कार्रवाई की बात सामने आई थी।
यदि यह दावा रिकॉर्ड में उपलब्ध है, तो इसकी आधिकारिक पुष्टि होना आवश्यक है।
क्या वास्तव में पूर्व में शिकायत हुई थी?
क्या विभागीय जांच हुई थी?
यदि हुई थी तो उसका परिणाम क्या रहा?
क्या कोई विभागीय कार्रवाई की गई?
इन सवालों को वर्तमान मामले की जांच से अलग नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि यदि किसी अधिकारी के विरुद्ध पूर्व में भी गंभीर शिकायतों का आधिकारिक रिकॉर्ड मौजूद है, तो उसकी पृष्ठभूमि की समीक्षा जांच की निष्पक्षता के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।
हालांकि केवल पूर्व शिकायत होना किसी अधिकारी को दोषी सिद्ध नहीं करता। दोष सिद्धि केवल सक्षम जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही हो सकती है।
***सबसे गंभीर पहलू—फरियादी ने अपनी जान को खतरा बताया***
इस पूरे मामले का सबसे संवेदनशील पहलू प्रमोद तिवारी द्वारा कथित रूप से अपनी सुरक्षा को लेकर जताई गई आशंका है।
बताया जा रहा है कि अस्पताल आने-जाने के दौरान वह समय-समय पर यह कहता रहा कि उसे अपनी जान का खतरा है और उसका एनकाउंटर हो सकता है।
यदि किसी नागरिक ने पुलिस या प्रशासन के सामने ऐसी आशंका व्यक्त की है, तो इसे केवल बयान मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
#प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि—
क्या प्रमोद तिवारी ने लिखित रूप में अपनी सुरक्षा को लेकर शिकायत की थी?
यदि की थी तो उस पर क्या कार्रवाई हुई?
क्या उसकी सुरक्षा को लेकर कोई खतरा आंका गया?
क्या उसकी शिकायत वरिष्ठ अधिकारियों के संज्ञान में थी?
यह विषय इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि बाद में यदि कोई अप्रिय घटना होती है तो पहले से जताई गई सुरक्षा संबंधी शिकायतों की जिम्मेदारी और कार्रवाई पर भी सवाल उठ सकते हैं।
क्या जनता के मन में डर पैदा हो रहा है?
आज इस पूरे घटनाक्रम को लेकर सबसे बड़ी चिंता यही है कि क्या आम नागरिक के मन में यह धारणा बन रही है कि पुलिस व्यवस्था के खिलाफ बार-बार शिकायत करना उसके लिए परेशानी का कारण बन सकता है?
यदि ऐसा माहौल बन रहा है तो यह किसी भी पुलिस व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
एक नागरिक को यह विश्वास होना चाहिए कि—
वह पुलिस के खिलाफ भी शिकायत कर सकता है।
उसकी शिकायत सुनी जाएगी।
जांच निष्पक्ष होगी।
और यदि उसकी शिकायत गलत है तो उसे भी कानून के अनुसार कारण सहित बताया जाएगा।
छतरपुर पुलिस की छवि भी दांव पर
इस मामले में अब केवल प्रमोद तिवारी और पुलिस के बीच विवाद नहीं है।
इस मामले में छतरपुर पुलिस की सार्वजनिक छवि भी दांव पर है।
पूर्व में छतरपुर पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर जनता के बीच संतोषजनक धारणा नहीं होने की चर्चाएं रही हैं। ऐसे में वर्तमान प्रकरण पुलिस प्रशासन के लिए अपनी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता दिखाने का अवसर भी है।
यदि पुलिस सही है, तो स्वतंत्र जांच से पुलिस की स्थिति और मजबूत होगी।
यदि फरियादी के आरोप गलत हैं, तो जांच से यह तथ्य सामने आएगा।
और यदि पुलिस के किसी अधिकारी की भूमिका संदिग्ध पाई जाती है, तो कार्रवाई से जनता का विश्वास और मजबूत होगा।
निष्पक्ष जांच पुलिस के खिलाफ नहीं होती—निष्पक्ष जांच पुलिस की विश्वसनीयता को मजबूत करती है।
अब वरिष्ठ अधिकारियों को क्या करना चाहिए?
इस मामले में सबसे बेहतर रास्ता यही दिखाई देता है कि आरोप-प्रत्यारोप के बीच किसी एक पक्ष को सही या गलत घोषित करने के बजाय एक स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच टीम गठित की जाए।
जांच में निम्न बिंदुओं को शामिल किया जाए—
1. चोरी की मूल घटना और उसकी जांच।
2. चोरी गए माल का विवरण और अनुमानित कीमत।
3. कथित बरामदगी और जब्ती का पूरा रिकॉर्ड।
4. थाना प्रभारी पर लगाए गए आरोप।
5. फरियादी और उसकी पत्नी द्वारा लगाए गए मारपीट के आरोप।
6. पुलिसकर्मियों के घायल होने से संबंधित मेडिकल और अन्य साक्ष्य।
7. घटनास्थल के सीसीटीवी फुटेज और उपलब्ध अन्य इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य।
8. फरियादी द्वारा वरिष्ठ अधिकारियों को दिए गए सभी आवेदनों की समीक्षा।
9. थाना प्रभारी के विरुद्ध पूर्व में हुई शिकायतों/विभागीय कार्रवाई के आधिकारिक रिकॉर्ड की जांच।
10. फरियादी द्वारा जताई गई सुरक्षा संबंधी आशंका और उस पर पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई।
और यदि आवश्यक हो तो इस जांच की निगरानी किसी स्वतंत्र वरिष्ठ अधिकारी अथवा सक्षम न्यायिक प्राधिकारी की निगरानी में कराई जाए।
अब जनता सिर्फ बयान नहीं, परिणाम चाहती है
इस पूरे मामले में अब सबसे महत्वपूर्ण बात यह नहीं है कि किसने किस पर क्या आरोप लगाया।
महत्वपूर्ण यह है कि सच क्या है?
क्या प्रमोद तिवारी की चोरी का वास्तव में खुलासा हुआ?
क्या चोरी गया माल बरामद हुआ?
क्या जब्ती की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी थी?
क्या थाना प्रभारी पर लगाए गए आरोप निराधार हैं या उनमें कोई तथ्य है?
क्या पुलिसकर्मियों पर लगाए गए मारपीट के आरोपों की निष्पक्ष जांच हुई?
क्या फरियादी की पत्नी की शिकायत पर कार्रवाई हुई?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या एक नागरिक को अपनी शिकायत लेकर वरिष्ठ अधिकारियों तक जाने के बाद सुरक्षा और न्याय का भरोसा मिला या नहीं?
इन सवालों का जवाब किसी बयान से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच और उसके परिणाम से मिलना चाहिए।
क्योंकि अब सवाल सिर्फ प्रमोद तिवारी का नहीं है।
सवाल छतरपुर की पुलिस की विश्वसनीयता का है।
सवाल जनता के पुलिस पर भरोसे का है।
और इस मामले में होने वाली कार्रवाई ही यह तय करेगी कि आने वाले समय में छतरपुर की जनता पुलिस को किस नजर से देखेगी।
*आरोप किसी को दोषी नहीं बनाते और पुलिस की वर्दी किसी को जांच से ऊपर नहीं रखती।*
*सच सामने आना चाहिए—और निष्पक्ष तरीके से सामने आना चाहिए।*
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