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यह दृश्य, सतना नदी का है।
जिस गणेश के आगे सिर झुकाया, विसर्जन के बाद उन्हें कूड़े में छोड़ दिया, क्या यही हमारी श्रद्धा है?
सतना. शहर में 14 सितंबर से 25 सितंबर तक गणेशोत्सव मनाया गया। गणेश प्रतिमाओं की स्थापना की गई। पंडाल सजाए गए। पूजा और आरती की गई। श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रही। लेकिन जब इन प्रतिमाओं का विसर्जन किया गया तो उन्हें ऐसे फेंक दिया गया, जैसे वे कबाड़ हो गए हों। यह भी नहीं देखा कि जहां प्रतिमा विसर्जित की गई है वहां पर्याप्त पानी है भी या नहीं। सतना नदी में विसर्जित प्रतिमाओं के आसपास कूड़ा करकट जमा है। श्रद्धा का उपहास उड़ रहा है।
यदि गणेशजी बोल पाते, तो अपनी इस दुर्दशा पर भक्तों से क्या कहते....
मुझे इतने धूमधाम से लाए थे, मेरे लिए पंडाल सजाए, फूल चढ़ाए, आरती की, मेरे सामने सिर झुकाकर सुख-समृद्धि मांगी।
विसर्जन के नाम पर मुझे यहां गंदे पानी और कचरे में क्यों छोड़ दिया? क्या मेरी विदाई इतनी बेबस होनी थी? अगर मिट्टी की प्रतिमा होती तो मैं इसी धरती में फिर मिल जाता,
लेकिन तुमने मुझे ऐसी सामग्री से बनाया जो पानी में भी नहीं घुलती। अरे भक्तजनों, मैं विघ्नहर्ता हूं, कूड़ा नहीं। मेरी पूजा तभी पूरी होगी, जब मेरी विदाई भी श्रद्धा और सम्मान से होगी।
और अगली बार मेरी प्रतिमा छोटी बनाना, मिट्टी की बनाना, विसर्जन ऐसी जगह करना जहां जल भी हो और सम्मान भी।
मेरी आरती के साथ-साथ प्रकृति की भी आरती करना।
पत्रिका छह दिन में भी प्रतिमा नॉलेज पानी में क्यों नहीं घुली?
पीओपी से बनी प्रतिमाः यह सबसे महत्वपूर्ण संभावना है। पीओपी पानी में मिट्टी की तरह घुलकर खत्म नहीं होती। पानी लगने पर इसकी बाहरी सतह कमजोर हो सकती है, लेकिन पूरी तरह नहीं घुलती।
पानी की पर्याप्त गहराई नहीं: विसर्जन स्थल पर पानी कम था तो प्रतिमा पूरी तरह डूब ही नहीं पाई होगी। पानी में प्रवाह भी नहीं है। इसलिए विघटन धीमा होगा।
पेंट और रासायनिक कोटिंगः मूर्तियों पर इस्तेमाल होने वाले रंग, वार्निश, प्राइमर या अन्य कोटिंग पानी के संपर्क को कम करते हैं। खासकर गैर-जैविक/सिंथेटिक रंग पर्यावरण में आसानी से नहीं टूटते।
मिट्टी की प्रतिमा भी तुरंत नहीं गलतीः मिट्टी की मूर्ति भी पानी में डालते ही नहीं गलती। गलने की प्रक्रिया मिट्टी की मोटाई, संरचना, पानी का बहाव पर निर्भर करती है।