🚨देहरादून मालदेवता की सास-बहू की जोड़ी ने राखी कारोबार में बनाई खास पहचान
देहरादून। रक्षाबंधन का पर्व नजदीक आते ही देहरादून की ग्रामीण महिलाओं द्वारा तैयार की जा रही हस्तनिर्मित राखियों की मांग बढ़ने लगी है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) से जुड़ी रायपुर, सहसपुर और डोईवाला विकासखंड की महिलाएं राखी निर्माण को स्वरोजगार का माध्यम बनाकर अपनी आय बढ़ाने के साथ आत्मनिर्भरता की ओर कदम बढ़ा रही हैं।
रायपुर विकासखंड के मालदेवता क्षेत्र की सास-बहू लीला रावत और अलका रावत इस पहल की खास मिसाल बनकर सामने आई हैं। दोनों महिलाएं नई दिशा महिला क्लस्टर लेवल फेडरेशन के अंतर्गत आशा किरण स्वयं सहायता समूह से जुड़ी हैं और मिलकर अलग-अलग डिजाइनों की हस्तनिर्मित राखियां तैयार कर रही हैं। इस वर्ष उन्होंने 2,000 से अधिक राखियां तैयार करने का लक्ष्य रखा है, जिसमें करीब 1,500 राखियां तैयार हो चुकी हैं।
पिछले साल 1,200 राखियों से कमाया 25 हजार रुपये मुनाफा
लीला और अलका ने बताया कि पिछले वर्ष प्रशासन के सहयोग से उन्हें बेहतर बाजार मिला। दोनों ने करीब 1,200 राखियां तैयार कर बाजार में बेचीं, जिससे लगभग 25 हजार रुपये का मुनाफा हुआ। इसके बाद उनका उत्साह बढ़ा और इस वर्ष उन्होंने कारोबार को और विस्तार देने का फैसला किया।
प्राइवेट नौकरी छोड़ सास के साथ शुरू किया कारोबार
अलका रावत ने पिछले वर्ष प्राइवेट नौकरी छोड़कर अपनी सास लीला के साथ स्वरोजगार शुरू किया। दोनों ने मालदेवता में ‘विनी वंडर्स क्रिएशन’ नाम से दुकान शुरू की, जहां राखियों के अलावा अन्य हस्तनिर्मित और स्थानीय उत्पाद भी तैयार कर बेचे जाते हैं।
अलका के मुताबिक स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद उन्हें आय के नए अवसर मिले और सरकारी योजनाओं का लाभ लेकर कारोबार को आगे बढ़ाने में मदद मिली।
सोशल मीडिया से भी मिल रहे ऑर्डर
अब इन महिलाओं का कारोबार केवल स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं है। ‘विनी वंडर्स क्रिएशन’ के इंस्टाग्राम प्लेटफॉर्म के जरिए भी ग्राहकों से राखियों के ऑर्डर मिल रहे हैं। ऑनलाइन माध्यम से मिले ऑर्डर तैयार कर ग्राहकों तक पहुंचाए जा रहे हैं, जिससे उनके कारोबार को डिजिटल बाजार में भी विस्तार मिल रहा है।
पारंपरिक से आधुनिक डिजाइनों तक राखियां
महिलाएं ऊन, क्रोशिया, मौली के धागे, रिबन सहित विभिन्न सामग्रियों का इस्तेमाल कर आकर्षक राखियां तैयार कर रही हैं। इनमें रुद्राक्ष, महाकाल, नजरबट्टू सहित कई पारंपरिक और आधुनिक डिजाइन शामिल हैं। राखियों की डिजाइनिंग से लेकर पैकेजिंग और प्रचार-प्रसार तक का काम महिलाएं स्वयं संभाल रही हैं।
2016 से एनआरएलएम से जुड़ी हैं लीला
आशा किरण स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष लीला रावत वर्ष 2016 से राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन से जुड़ी हैं। उनका कहना है कि समूह के माध्यम से उन्हें विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ मिला, जिससे स्वरोजगार को आगे बढ़ाने में मदद मिली।
सहसपुर और डोईवाला की महिलाएं भी तैयार कर रहीं राखियां
रायपुर के अलावा सहसपुर और डोईवाला विकासखंड की स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं भी बड़े स्तर पर राखियां तैयार कर रही हैं। डोईवाला में करीब 100 महिलाएं विभिन्न संगठनों के माध्यम से राखियां बना रही हैं, जिनकी बिक्री रायवाला और श्यामपुर समेत अलग-अलग बाजारों में स्टॉल लगाकर की जा रही है।
सहसपुर विकासखंड की महिलाएं भी राखियां तैयार कर रही हैं। उनकी राखियों को ब्लॉक स्तर पर प्रदर्शित करने के साथ सेलाकुई, सहसपुर और विकासनगर क्षेत्र में बिक्री के लिए बाजार उपलब्ध कराया जा रहा है।
मॉल और सचिवालय में लगेंगे स्टॉल
मुख्य विकास अधिकारी अभिनव शाह ने बताया कि स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को राखियों की बिक्री के लिए बेहतर बाजार उपलब्ध कराने के प्रयास किए जा रहे हैं। देहरादून के तीन से चार प्रमुख मॉल में भी राखियों के स्टॉल लगाए जाएंगे।
वहीं, 24 से 27 अगस्त तक उत्तराखंड सचिवालय में पांच स्टॉल लगाए जाएंगे। इन स्टॉलों पर स्वयं सहायता समूहों की महिलाएं राखियों के साथ विभिन्न पहाड़ी और स्थानीय उत्पादों की प्रदर्शनी एवं बिक्री करेंगी।
राखी निर्माण से जुड़ी ग्रामीण महिलाओं की यह पहल न केवल स्थानीय हस्तकला को बढ़ावा दे रही है, बल्कि महिलाओं को स्वरोजगार के जरिए आर्थिक रूप से मजबूत बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम साबित हो रही है।