धर्म के लक्षण ही है वास्तविक धर्म की पहचानः साध्वी भावना भारती जी
जगाधरी, हनुमान गेट स्थित दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान आश्रम में साप्ताहिक सत्संग का आयोजन किया गया जिसके दौरान परम पूजनीय दिव्य गुरु आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी सुश्री भावना भारती जी ने आध्यात्म से जुड़े गूढ़ सूत्रों को उजागर करते हुए मनुस्मृति में वर्णित धर्म के दस लक्षणों का उल्लेख किया और कहा कि धर्म वह जीवन-पद्धति है जो मनुष्य के विचारों, व्यवहार और आचरण में सकारात्मक गुणों के रूप में दिखाई देती है। उन्होंने विस्तार पूर्वक व्याख्या करते हुए कहा कि धृति अर्थात धैर्य एवं दृढ़ता धर्म का प्रथम लक्षण है। जीवन में परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, मनुष्य को अपने कर्तव्य और सत्य के मार्ग से विचलित नहीं होना चाहिए। दूसरा लक्षण क्षमा है और क्षमा केवल दूसरों की भूल को माफ कर देना नहीं अपितु अपने भीतर द्वेष, प्रतिशोध और कटुता को समाप्त करना है। क्षमाशील व्यक्ति स्वयं भी मानसिक शांति प्राप्त करता है और समाज में प्रेम एवं सद्भाव का वातावरण स्थापित करता है। तीसरा लक्षण दम अर्थात मन पर नियंत्रण है जिसमें मन को आध्यात्मिक ज्ञान के द्वारा संयमित करना आवश्यक है। अस्तेय को धर्म का चौथा लक्षण बताते हुए उन्होंने कहा कि जो वस्तु हमें अधिकारपूर्वक प्राप्त नहीं हुई है, उसे ग्रहण न करना ही अस्तेय है। किसी के अधिकार, श्रेय, अवसर या विश्वास का अनुचित रूप से हरण न करना भी अस्तेय की भावना है। पाँचवां लक्षण शौच, जिसका अर्थ केवल शरीर की स्वच्छता नहीं है अपितु मन, विचार और भावनाओं की पवित्रता भी धर्म का अभिन्न अंग है। साध्वी जी ने छठा लक्षण इन्द्रिय निग्रह को बताया और कहा कि धर्म का मार्ग इन्द्रियों का दमन नहीं अपितु उन पर विवेकपूर्ण नियंत्रण सिखाता है।जो व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को अपने विवेक के अधीन रखता है, वही अपने जीवन को सही दिशा दे सकता है। सातवाँ लक्षण धी अर्थात विवेक, बुद्धि और सही निर्णय लेने की क्षमता है। उन्होंने कहा कि अर्जित किए हुए ज्ञान का उचित समय और उचित परिस्थिति में सही प्रयोग करना आवश्यक है। आठवाँ लक्षण विद्या जो मनुष्य के जीवन में ज्ञान के प्रचण्ड सूर्य को उदित कर अज्ञानता के अंधकार को समूल विनष्ट कर देती है। साध्वी जी ने कहा कि वास्तविक विद्या वही है जो मनुष्य को विनम्र बनाए, उसके चरित्र का निर्माण करे और उसे अपने वास्तविक स्वरूप को जानने की दिशा में अग्रसर करे। नौवां लक्षण सत्य केवल वाणी से सच बोलने का नाम नहीं अपितु मन,वचन और कर्म में एकरूपता स्थापित करना भी सत्य का ही स्वरूप है।अक्रोध धर्म का दसवाँ लक्षण है। अक्रोध का अर्थ यह नहीं कि मनुष्य अन्याय के प्रति मौन रहे अपितु इसका अर्थ है कि वह क्रोध और आवेश के स्थान पर विवेक, संयम और शांत चित्त से उचित निर्णय ले। साध्वी सुश्री भावना भारती जी ने कहा कि यदि आज हम सभी इन गुणों को धारण कर लें तो हम अपने व्यक्तिगत जीवन को शांत एवं संतुलित बनाने के साथ अपने परिवार और समाज में भी प्रेम, सद्भाव और नैतिक मूल्यों की स्थापना कर सकते हैं और ऐसा केवल एक पूर्ण ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु एवं ब्रह्मज्ञान से ही संभव हो सकता है। इस अवसर पर साध्वी बहनों द्वारा सुमधुर भजनों का गायन भी किया गया, जिससे वातावरण भक्तिमय हो उठा। विश्व शांति हेतु सामूहिक ध्यान साधना के साथ कार्यक्रम का समापन किया गया।