एक बार फिर चर्चा में कदौरा ब्लॉक क्षेत्र की ग्राम पंचायतें
परोसा के बाद अब निस्वा, एकौना और उकुरुआ की बारी—मनरेगा के रिकॉर्ड, श्रमिक डिमांड और धरातल की हकीकत पर उठेंगे सवाल
कागजों में दौड़ रहे मजदूर, जमीन पर पसरा सन्नाटा!
परोसा में तीन महीने से काम बंद होने के आरोप के बावजूद 27 से 29 सितंबर तक 115-115 श्रमिकों की डिमांड का मामला, जांच के भरोसे पर टिकी निगाहें
कदौरा/जालौन
कागजों में कुदाल चली, फाइलों में मिट्टी ढोई गई,
धरती पर नजर पड़ी तो काम की जगह खामोशी मिली।
कदौरा विकासखंड क्षेत्र की ग्राम पंचायतों में मनरेगा कार्यों को लेकर एक बार फिर सवालों का दौर शुरू हो गया है। परोसा ग्राम पंचायत से सामने आए मामले के बाद अब निस्वा, एकौना और उकुरुआ ग्राम पंचायतों में मनरेगा कार्यों के रिकॉर्ड, श्रमिक डिमांड और मौके की वास्तविक स्थिति को लेकर भी सवाल सामने रखे जाएंगे।
परोसा में सामने आए मामले ने मनरेगा की उस व्यवस्था पर सवाल खड़ा कर दिया है, जिसमें पोर्टल पर श्रमिकों की डिमांड दर्ज होती है और धरातल पर काम होना अपेक्षित है। ग्रामीणों का आरोप है कि रामकरण के खेत से गोपी के खेत तक संपर्क मार्ग निर्माण कार्य करीब तीन महीने से बंद पड़ा है, लेकिन इसके बावजूद 27, 28 और 29 सितंबर को लगातार 115-115 श्रमिकों की डिमांड दर्ज की गई।
काम बंद तो 115 मजदूरों की डिमांड किसलिए?
मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि ग्रामीणों के दावे के अनुसार कार्यस्थल पर लंबे समय से काम नहीं हो रहा था, तो फिर लगातार तीन दिनों तक 115 श्रमिकों की डिमांड किस आधार पर दर्ज की गई?
क्या मौके पर वास्तव में इतने मजदूर काम कर रहे थे?
क्या मस्टर रोल में दर्ज श्रमिकों ने काम किया?
क्या जियो-टैग फोटो और कार्यस्थल की वास्तविक स्थिति एक-दूसरे से मेल खाती है?
क्या श्रमिकों की डिमांड के अनुरूप धरातल पर कार्य हुआ?
इन सवालों का जवाब जांच के बाद ही सामने आएगा।
अदृश्य मजदूरों का सच जांचेगी व्यवस्था?
मनरेगा में मजदूरों को रोजगार देने और उनके खाते में मजदूरी पहुंचाने की व्यवस्था को पारदर्शिता के लिए डिजिटल बनाया गया है।
ऐसे में यदि किसी कार्यस्थल पर काम नहीं होने के बावजूद श्रमिकों की डिमांड दर्ज होने का आरोप सामने आता है, तो यह केवल एक पंचायत का मामला नहीं बल्कि रिकॉर्ड और धरातल के बीच अंतर की गंभीर जांच का विषय बन जाता है।
मस्टर में मजदूरों की कतार, मौके पर खाली मैदान,
कागज पूछे—काम हुआ, गांव पूछे—कहां है निशान?
अधिकारियों ने जांच और कार्रवाई का दिया भरोसा
मामले में कदौरा के एपीओ मनरेगा सुशील कुमार से बात की गई तो उन्होंने मामले की जांच कराने और गड़बड़ी मिलने पर कार्रवाई की बात कही।
वहीं श्रम उपायुक्त मनरेगा रामेंद्र सिंह कुशवाह ने भी कहा कि यदि मामला शिकायत के अनुरूप पाया जाता है तो जांच कर तत्काल कार्रवाई की जाएगी।
अब देखना यह होगा कि जांच केवल कागजी रिकॉर्ड तक सीमित रहती है या फिर कार्यस्थल पर पहुंचकर श्रमिकों, मस्टर रोल, जियो-टैग फोटो, डिमांड और भुगतान रिकॉर्ड का मिलान कराया जाता है।
सवाल सिर्फ परोसा का नहीं, अगली कड़ियों में सामने आएगी तस्वीर
परोसा के बाद अब निस्वा, एकौना और उकुरुआ ग्राम पंचायतों में भी मनरेगा कार्यों से जुड़े रिकॉर्ड और धरातलीय स्थिति को लेकर सवाल सामने रखे जाएंगे।
कितने श्रमिकों की डिमांड लगी?
कितने दिन तक लगी?
किस कार्य के नाम पर लगी?
मौके पर वास्तव में कितना काम हुआ?
और रिकॉर्ड में दर्ज काम की तस्वीर धरातल से कितनी मेल खाती है?
इन सभी बिंदुओं को सामने रखकर यह देखने की कोशिश होगी कि सरकारी रिकॉर्ड और गांव की जमीन पर दिखाई देने वाली हकीकत में कितना अंतर है।
सरकारी कागज बोल रहा—मजदूरों ने काम किया,
गांव की सूनी पगडंडी पूछे—फिर किसने काम किया?
डिमांड में मजदूर सैकड़ों, मौके पर सन्नाटा भारी,
अब जांच बताएगी आखिर किसकी थी ये जिम्मेदारी।
कुदाल चली या कलम चली, अब जांच से होगा फैसला,
गरीब के हक की मजदूरी पर नहीं चलना चाहिए कोई खेला।
फाइलों से निकलकर साहब, जरा जमीन पर भी आइए,
मनरेगा की असली तस्वीर अपनी आंखों से देख जाइए।
महत्वपूर्ण: परोसा में फर्जी डिमांड, फर्जी हाजिरी या सरकारी धन के गबन की पुष्टि अभी जांच के अधीन है।
इसलिए इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि जांच रिपोर्ट और संबंधित रिकॉर्ड के परीक्षण के बाद ही मानी जाएगी।
अगली कड़ी में—निस्वा, एकौना और उकुरुआ:
कब से चल रहा काम?
कितने श्रमिकों की लगी डिमांड?
और रिकॉर्ड में दर्ज काम की मौके पर क्या है हकीकत?
Jalaun, Jalaun | Oct 1, 2026