सेवल मंदिर की पवित्र पहाड़ियों की 500 विद्यार्थियों ने की परिक्रमा
सीकरी, गोपालगढ़ और गोविंदगढ़ से पहुंचे विद्यार्थी, आध्यात्मिक विरासत और प्राकृतिक संपदा से हुए रूबरू
सीकरी। किताबों और कक्षाओं से बाहर निकलकर करीब 500 विद्यार्थियों ने रविवार को सेवल मंदिर की पवित्र पहाड़ियों की परिक्रमा कर आध्यात्मिक विरासत, प्रकृति और भारतीय परंपराओं को करीब से जाना। सीकरी, गोपालगढ़ और गोविंदगढ़ के विभिन्न विद्यालयों से पहुंचे विद्यार्थियों ने हरिनाम संकीर्तन के बीच पहाड़ियों की परिक्रमा की।
परिक्रमा के दौरान विद्यार्थियों को सेवल मंदिर क्षेत्र की करीब 400 वर्ष पुरानी साधना परंपरा, प्राकृतिक गुफाओं और भजन कुटीरों के बारे में जानकारी दी गई। मान्यता के अनुसार खाकदर महाराज ने करीब 400 वर्ष पूर्व यहां तपस्या की थी। वहीं स्थानीय लोक मान्यताओं में भगवान श्रीकृष्ण के इस वन क्षेत्र में गोचारण के लिए आने का उल्लेख मिलता है, जिसके चलते यहां विराजमान आराध्य देव को वन विहारी जी महाराज के नाम से जाना जाता है।
पहाड़ियां बनीं बच्चों की प्राकृतिक पाठशाला
विद्यार्थियों को क्षेत्र में पाई जाने वाली विभिन्न औषधीय वनस्पतियों और जड़ी-बूटियों की पहचान एवं उनके महत्व के बारे में बताया गया। बच्चों ने सेवल मंदिर तालाब, गौशाला और आसपास के प्राकृतिक क्षेत्र का भी भ्रमण किया। पहाड़ियों का शांत वातावरण और प्राकृतिक सौंदर्य विद्यार्थियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा।
पारंपरिक खेलों में दिखा उत्साह
कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों के लिए विभिन्न देशी एवं पारंपरिक खेल भी आयोजित किए गए। बच्चों ने उत्साह के साथ भाग लेकर टीम भावना, एकाग्रता और आपसी सहयोग का परिचय दिया। हरिनाम संकीर्तन से पूरा पहाड़ी क्षेत्र भक्तिमय हो उठा। कार्यक्रम के अंत में विद्यार्थियों के लिए प्रसाद की व्यवस्था की गई।
‘विरासत को किताबों में नहीं, जीवन में महसूस करें’
सेवल मंदिर के जमुना जीवन कृष्ण दास जी ने कहा कि आयोजन का उद्देश्य बच्चों को केवल धार्मिक स्थल का भ्रमण कराना नहीं, बल्कि उन्हें अपनी संस्कृति, प्रकृति और जड़ों से जोड़ना है। उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी तेजी से डिजिटल दुनिया से जुड़ रही है, ऐसे में उसे अपनी आध्यात्मिक और प्राकृतिक विरासत से परिचित कराना भी जरूरी है।
उन्होंने कहा कि सेवल मंदिर अध्यात्म, प्रकृति, संस्कृति और पर्यावरण का जीवंत संगम है। यहां बच्चे खेलते हुए स्वास्थ्य, प्रकृति से पर्यावरण संरक्षण, गौशाला से करुणा और आध्यात्मिक वातावरण से संस्कार सीख सकते हैं। उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ी अपनी विरासत को केवल किताबों में न पढ़े, बल्कि उसे देखे, महसूस करे और उसके संरक्षण की जिम्मेदारी भी समझे।
Weir, Bharatpur | Oct 4, 2026