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ग्रिज़ली विद्यालय में राष्ट्रीय पुस्तकालय दिवस पर ज्ञान, पठन और रचनात्मकता का उत्सव तिलैया डैम स्थित ग्रिज़ली विद्यालय में 12 अगस्त को राष्ट्रीय पुस्तकालय दिवस उत्साह एवं गरिमापूर्ण वातावरण में मनाया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों में पुस्तकों के प्रति रुचि विकसित करना, नियमित पठन की आदत को प्रोत्साहित करना तथा पुस्तकालय को ज्ञान, रचनात्मकता और व्यक्तित्व विकास के केंद्र के रूप में स्थापित करना था। कार्यक्रम का शुभारंभ विद्यालय के सीईओ प्रकाश गुप्ता एवं प्राचार्या अंजना कुमारी द्वारा भारत में पुस्तकालय विज्ञान के जनक डॉ. एस. आर. रंगनाथन के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित एवं दीप प्रज्वलित कर किया गया। इसके पश्चात विद्यालय की पुस्तकालयाध्यक्ष नंदिनी कपूर ने स्वागत संबोधन के माध्यम से विद्यार्थियों को पुस्तकों से मित्रता करने तथा नियमित अध्ययन की आदत विकसित करने के लिए प्रेरित किया। कार्यक्रम में विद्यार्थियों द्वारा एक आकर्षक भूमिका-निवर्तन (रोल प्ले) प्रस्तुत किया गया, जिसमें विभिन्न पुस्तकालय संसाधनों को जीवंत रूप में प्रदर्शित किया गया। छात्र मन्यु अग्रवाल ने शब्दकोश, छात्र अवनीश कुमार ने जीवनी, छात्रा एंजेल श्री ने समाचार पत्र तथा छात्रा तुष्टि मोदी ने कहानी की पुस्तक की भूमिका निभाकर सभी का मन मोह लिया। छात्रा चार्वी त्रिवेदी ने “हमारे जीवन में पुस्तकालय का महत्व” विषय पर प्रेरणादायक भाषण प्रस्तुत किया। उन्होंने पुस्तकालय को ज्ञान, संस्कार, रचनात्मकता एवं व्यक्तित्व विकास का केंद्र बताते हुए विद्यार्थियों से नियमित पठन की आदत अपनाने का आह्वान किया। कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों के लिए पाँच चरणों वाला रोचक एवं ज्ञानवर्धक खेल आयोजित किया गया। कागज़ की पर्चियों पर लिखे प्रश्नों के उत्तर देकर विद्यार्थियों ने अपनी ज्ञानवर्धक प्रतिभा का प्रदर्शन किया। इस गतिविधि ने कार्यक्रम में उत्साह एवं जिज्ञासा का वातावरण बनाए रखा। इसके उपरांत शैक्षणिक सत्र 2025–26 के सर्वश्रेष्ठ पुस्तकालय उपयोगकर्ता पुरस्कार प्रदान किए गए। नियमित पुस्तकालय उपयोग, अनुशासन एवं अध्ययन के प्रति समर्पण के लिए तनिषा नस्कर, आर्यन विश्वकर्मा एवं ससांगलिपि सोरेन को सम्मानित किया गया। पुरस्कार विद्यालय के सीईओ प्रकाश गुप्ता एवं प्राचार्या अंजना कुमारी द्वारा प्रदान किए गए। इस अवसर पर सीईओ प्रकाश गुप्ता एवं प्राचार्या अंजना कुमारी ने संयुक्त रूप से कहा कि पुस्तकालय किसी भी विद्यालय का बौद्धिक केंद्र होता है। विद्यार्थियों में नियमित पठन की आदत विकसित करना उनके शैक्षणिक विकास के साथ-साथ उनकी कल्पनाशक्ति, रचनात्मक सोच, भाषा कौशल एवं व्यक्तित्व निर्माण के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने विद्यार्थियों से डिजिटल माध्यमों के संतुलित उपयोग के साथ पुस्तकों को अपना सच्चा मित्र बनाने का आह्वान किया तथा कहा कि अच्छी पुस्तकें जीवन में सही दिशा, ज्ञान एवं प्रेरणा प्रदान करती हैं। कार्यक्रम के अंत में बिट्टू सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए सभी अतिथियों, शिक्षकों एवं विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का प्रभावी संचालन छात्रा ससांगलिपि सोरेन एवं छात्रा विदुषी ने किया। कार्यक्रम के दौरान विद्यार्थियों एवं शिक्षकों ने नियमित पठन-पाठन को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाने का संकल्प लिया। ज्ञान, रचनात्मकता और उत्साह से भरपूर यह आयोजन विद्यार्थियों को पुस्तकों के महत्व से जोड़ने तथा उनमें आजीवन सीखने की प्रवृत्ति विकसित करने की दिशा में एक सार्थक पहल सिद्ध हुआ।

Koderma, Kodarma | Aug 12, 2026

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Koderma, Kodarma | Aug 16, 2026

झुमरी तिलैया के बाईपास रेलवे ओवरब्रिज से महाराणा प्रताप चौक तक सर्विस लेन पर गैराज और ट्रकों का कब्जा, हादसे की आशंका

झुमरी तिलैया के बाईपास रेलवे ओवरब्रिज से महाराणा प्रताप चौक तक सर्विस लेन पर गैराज संचालकों और ट्रक चालकों का कब्जा बढ़ता जा रहा है। सड़क किनारे वाहनों के खड़े रहने से सर्विस लेन में आवागमन प्रभावित हो रहा है। वाहन चालकों के साथ पैदल राहगीरों को भी दुर्घटना की आशंका बनी रहती है। पूर्व में एसडीओ द्वारा सड़क पर वाहन खड़ा करने वालों को चेतावनी देते हुए जुर्माना भी लगाया गया था। इसके बावजूद स्थिति में सुधार नहीं हुआ है। स्थानीय लोगों ने रविवार को 11 बजे बताया कि प्रशासन से सर्विस लेन को अतिक्रमणमुक्त कर सुचारू आवागमन सुनिश्चित कराने की मांग की है।

झुमरी तिलैया के बाईपास रेलवे ओवरब्रिज से महाराणा प्रताप चौक तक सर्विस लेन पर गैराज और ट्रकों का कब्जा, हादसे की आशंका झुमरी तिलैया के बाईपास रेलवे ओवरब्रिज से महाराणा प्रताप चौक तक सर्विस लेन पर गैराज संचालकों और ट्रक चालकों का कब्जा बढ़ता जा रहा है। सड़क किनारे वाहनों के खड़े रहने से सर्विस लेन में आवागमन प्रभावित हो रहा है। वाहन चालकों के साथ पैदल राहगीरों को भी दुर्घटना की आशंका बनी रहती है। पूर्व में एसडीओ द्वारा सड़क पर वाहन खड़ा करने वालों को चेतावनी देते हुए जुर्माना भी लगाया गया था। इसके बावजूद स्थिति में सुधार नहीं हुआ है। स्थानीय लोगों ने रविवार को 11 बजे बताया कि प्रशासन से सर्विस लेन को अतिक्रमणमुक्त कर सुचारू आवागमन सुनिश्चित कराने की मांग की है।

Koderma, Kodarma | Aug 16, 2026

वंदे मातरम: आजादी की लड़ाई की आवाज से लाल किले तक 150 साल का सफर

क्या आप जानते हैं कि वंदे मातरम, जो कभी आजादी की लड़ाई की सबसे बुलंद आवाज था, उसे लाल किले तक पहुंचने में करीब 80 साल लग गए?

बहुत से लोगों को लगता है कि हर 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से वंदे मातरम गाया जाता होगा। लेकिन ऐसा नहीं है। आजादी के बाद लंबे समय तक लाल किले से स्वतंत्रता दिवस समारोह में राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ ही गूंजता रहा। अब 15 अगस्त 2026 को वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर इसे विशेष रूप से समारोह का हिस्सा बनाया जा रहा है।

वंदे मातरम की कहानी सिर्फ एक गीत की कहानी नहीं है। यह उस दौर की कहानी है जब अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ाई में इसके दो शब्द—‘वंदे मातरम’—नारे बने, हौसला बने और कई क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा बने।

बंकिम से टैगोर तक

वंदे मातरम की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 19वीं सदी में की। बाद में यह उनकी प्रसिद्ध कृति ‘आनंदमठ’ का हिस्सा बना। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे गाया। इसके बाद यह गीत धीरे-धीरे स्वतंत्रता आंदोलन की पहचान बनता चला गया।

1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में जब स्वदेशी आंदोलन तेज हुआ, तब ‘वंदे मातरम’ हर जुलूस और सभा की आवाज बन गया। अंग्रेजी सरकार ने इसे दबाने की कोशिश की, लेकिन जिस गीत पर रोक लगाई गई, वही और अधिक लोगों की जुबान पर चढ़ गया।

क्रांतिकारी जेल जाते, आंदोलनकारी लाठियां खाते, फिर भी ‘वंदे मातरम’ की गूंज सुनाई देती रही। इस तरह यह गीत महज गीत नहीं रहा, बल्कि आजादी की लड़ाई का प्रतीक बन गया।

विवाद की वजह क्या थी?

वंदे मातरम को लेकर विवाद इसके पूरे मूल पाठ को लेकर रहा है। गीत के आगे के हिस्सों में मातृभूमि की तुलना देवी दुर्गा से की गई है। इसी कारण कुछ मुस्लिम नेताओं और संगठनों ने इसके पूरे पाठ को लेकर धार्मिक आपत्ति जताई।

वहीं, इसके समर्थकों का तर्क रहा कि इसमें मातृभूमि को मां के रूप में सम्मान दिया गया है और स्वतंत्रता आंदोलन में बड़ी संख्या में मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों ने भी ‘वंदे मातरम’ के नारे लगाए थे।

इसी संवेदनशीलता को देखते हुए 1937 में कांग्रेस ने निर्णय लिया कि सार्वजनिक अवसरों पर वंदे मातरम के शुरुआती हिस्से का ही इस्तेमाल किया जाएगा, ताकि किसी समुदाय की धार्मिक भावनाएं आहत न हों।

राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत में अंतर

आज भी कई लोग ‘जन गण मन’ और ‘वंदे मातरम’ को लेकर भ्रमित रहते हैं।

24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अंतिम चरण में यह स्पष्ट किया गया कि ‘जन गण मन’ भारत का राष्ट्रगान है, जबकि ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगीत का सम्मान प्राप्त है।

दोनों का अपना ऐतिहासिक महत्व है। राष्ट्रगान को सरकारी और संवैधानिक समारोहों में निर्धारित स्थान मिला, जबकि वंदे मातरम स्वतंत्रता आंदोलन की ऐतिहासिक विरासत और राष्ट्रीय भावना का प्रतीक बना रहा।

150 साल बाद फिर इतिहास के केंद्र में

अब वंदे मातरम की रचना के 150 वर्ष पूरे हो चुके हैं। 15 अगस्त 2026 को इसके सम्मान में विशेष आयोजन हो रहे हैं और लाल किले के स्वतंत्रता दिवस समारोह में भी इसे प्रमुखता दी जा रही है।

यह सिर्फ एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि उस गीत की 150 साल लंबी यात्रा को याद करने का अवसर है—एक ऐसा गीत जिसे बंकिम चंद्र ने लिखा, रवींद्रनाथ टैगोर ने स्वर दिया और जिसने स्वतंत्रता आंदोलन में लाखों भारतीयों के भीतर देशभक्ति की भावना को मजबूत किया।

बाद के दौर में ए.आर. रहमान ने ‘मां तुझे सलाम’ के जरिए वंदे मातरम की भावना को नई पीढ़ी तक पहुंचाया।

इसलिए जब 15 अगस्त को वंदे मातरम की गूंज सुनाई दे, तो इसे सिर्फ दो शब्द समझकर नजरअंदाज मत कीजिएगा। इन दो शब्दों के पीछे डेढ़ सौ साल का इतिहास है—आंदोलन है, संघर्ष है, विवाद है और सबसे बढ़कर उन अनगिनत भारतीयों की स्मृति है, जिन्होंने आजादी के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया।

वंदे मातरम।
जय हिंद।
जय भारत।

वंदे मातरम: आजादी की लड़ाई की आवाज से लाल किले तक 150 साल का सफर क्या आप जानते हैं कि वंदे मातरम, जो कभी आजादी की लड़ाई की सबसे बुलंद आवाज था, उसे लाल किले तक पहुंचने में करीब 80 साल लग गए? बहुत से लोगों को लगता है कि हर 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से वंदे मातरम गाया जाता होगा। लेकिन ऐसा नहीं है। आजादी के बाद लंबे समय तक लाल किले से स्वतंत्रता दिवस समारोह में राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ ही गूंजता रहा। अब 15 अगस्त 2026 को वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर इसे विशेष रूप से समारोह का हिस्सा बनाया जा रहा है। वंदे मातरम की कहानी सिर्फ एक गीत की कहानी नहीं है। यह उस दौर की कहानी है जब अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ाई में इसके दो शब्द—‘वंदे मातरम’—नारे बने, हौसला बने और कई क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा बने। बंकिम से टैगोर तक वंदे मातरम की रचना बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 19वीं सदी में की। बाद में यह उनकी प्रसिद्ध कृति ‘आनंदमठ’ का हिस्सा बना। 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे गाया। इसके बाद यह गीत धीरे-धीरे स्वतंत्रता आंदोलन की पहचान बनता चला गया। 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में जब स्वदेशी आंदोलन तेज हुआ, तब ‘वंदे मातरम’ हर जुलूस और सभा की आवाज बन गया। अंग्रेजी सरकार ने इसे दबाने की कोशिश की, लेकिन जिस गीत पर रोक लगाई गई, वही और अधिक लोगों की जुबान पर चढ़ गया। क्रांतिकारी जेल जाते, आंदोलनकारी लाठियां खाते, फिर भी ‘वंदे मातरम’ की गूंज सुनाई देती रही। इस तरह यह गीत महज गीत नहीं रहा, बल्कि आजादी की लड़ाई का प्रतीक बन गया। विवाद की वजह क्या थी? वंदे मातरम को लेकर विवाद इसके पूरे मूल पाठ को लेकर रहा है। गीत के आगे के हिस्सों में मातृभूमि की तुलना देवी दुर्गा से की गई है। इसी कारण कुछ मुस्लिम नेताओं और संगठनों ने इसके पूरे पाठ को लेकर धार्मिक आपत्ति जताई। वहीं, इसके समर्थकों का तर्क रहा कि इसमें मातृभूमि को मां के रूप में सम्मान दिया गया है और स्वतंत्रता आंदोलन में बड़ी संख्या में मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों ने भी ‘वंदे मातरम’ के नारे लगाए थे। इसी संवेदनशीलता को देखते हुए 1937 में कांग्रेस ने निर्णय लिया कि सार्वजनिक अवसरों पर वंदे मातरम के शुरुआती हिस्से का ही इस्तेमाल किया जाएगा, ताकि किसी समुदाय की धार्मिक भावनाएं आहत न हों। राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत में अंतर आज भी कई लोग ‘जन गण मन’ और ‘वंदे मातरम’ को लेकर भ्रमित रहते हैं। 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अंतिम चरण में यह स्पष्ट किया गया कि ‘जन गण मन’ भारत का राष्ट्रगान है, जबकि ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगीत का सम्मान प्राप्त है। दोनों का अपना ऐतिहासिक महत्व है। राष्ट्रगान को सरकारी और संवैधानिक समारोहों में निर्धारित स्थान मिला, जबकि वंदे मातरम स्वतंत्रता आंदोलन की ऐतिहासिक विरासत और राष्ट्रीय भावना का प्रतीक बना रहा। 150 साल बाद फिर इतिहास के केंद्र में अब वंदे मातरम की रचना के 150 वर्ष पूरे हो चुके हैं। 15 अगस्त 2026 को इसके सम्मान में विशेष आयोजन हो रहे हैं और लाल किले के स्वतंत्रता दिवस समारोह में भी इसे प्रमुखता दी जा रही है। यह सिर्फ एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि उस गीत की 150 साल लंबी यात्रा को याद करने का अवसर है—एक ऐसा गीत जिसे बंकिम चंद्र ने लिखा, रवींद्रनाथ टैगोर ने स्वर दिया और जिसने स्वतंत्रता आंदोलन में लाखों भारतीयों के भीतर देशभक्ति की भावना को मजबूत किया। बाद के दौर में ए.आर. रहमान ने ‘मां तुझे सलाम’ के जरिए वंदे मातरम की भावना को नई पीढ़ी तक पहुंचाया। इसलिए जब 15 अगस्त को वंदे मातरम की गूंज सुनाई दे, तो इसे सिर्फ दो शब्द समझकर नजरअंदाज मत कीजिएगा। इन दो शब्दों के पीछे डेढ़ सौ साल का इतिहास है—आंदोलन है, संघर्ष है, विवाद है और सबसे बढ़कर उन अनगिनत भारतीयों की स्मृति है, जिन्होंने आजादी के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। वंदे मातरम। जय हिंद। जय भारत।

Koderma, Kodarma | Aug 15, 2026

चंदवारा थाना प्रभारी पुलिस अवर निरीक्षक श्री शशि भूषण कुमार को सर्वश्रेष्ठ थाना प्रभारी का सम्मान मिलने पर बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं🌹

चंदवारा थाना प्रभारी पुलिस अवर निरीक्षक श्री शशि भूषण कुमार को सर्वश्रेष्ठ थाना प्रभारी का सम्मान मिलने पर बहुत-बहुत बधाई एवं शुभकामनाएं🌹

Koderma, Kodarma | Aug 15, 2026

देश के टॉप-100 पुलिस कप्तानों में झारखंड के पांच अफसर, लिस्ट में बनाई खास जगह। 
झारखंड के पुलिस प्रशासन के लिए बड़ी उपलब्धि सामने आई है। फेम इंडिया–एशिया पोस्ट की ओर से जारी देश के 100 सर्वश्रेष्ठ पुलिस कप्तानों की सूची में झारखंड के पांच आइपीएस अधिकारियों ने जगह बनाई है। कानून-व्यवस्था, अपराध नियंत्रण, नेतृत्व और जनविश्वास जैसे मानकों के आधार पर तैयार इस सूची में राज्य के इन अधिकारियों का चयन हुआ है।
सूची में कोडरमा के निवर्तमान एसपी एवं वर्तमान में पाकुड़ के एसपी श्री अनुदीप सिंह के नाम शामिल हैं। सर को बहुत-बहुत बधाई🌹
#PakurPolice #anudipsingh #ips

देश के टॉप-100 पुलिस कप्तानों में झारखंड के पांच अफसर, लिस्ट में बनाई खास जगह। झारखंड के पुलिस प्रशासन के लिए बड़ी उपलब्धि सामने आई है। फेम इंडिया–एशिया पोस्ट की ओर से जारी देश के 100 सर्वश्रेष्ठ पुलिस कप्तानों की सूची में झारखंड के पांच आइपीएस अधिकारियों ने जगह बनाई है। कानून-व्यवस्था, अपराध नियंत्रण, नेतृत्व और जनविश्वास जैसे मानकों के आधार पर तैयार इस सूची में राज्य के इन अधिकारियों का चयन हुआ है। सूची में कोडरमा के निवर्तमान एसपी एवं वर्तमान में पाकुड़ के एसपी श्री अनुदीप सिंह के नाम शामिल हैं। सर को बहुत-बहुत बधाई🌹 #PakurPolice #anudipsingh #ips

Koderma, Kodarma | Aug 15, 2026