एक दल से अचानक दूसरे दल में पलटी मारकर टिकट हासिल कर लेना और फिर चुनाव जीत जाना इतना आसान नहीं होता। क्योंकि राजनीति में सिर्फ पार्टी बदलने से जनता का भरोसा ट्रांसफर नहीं होता!
सबसे बड़ी बात यह है कि जिस नेता का टिकट काटकर बाहर से आए हुए नेता को उम्मीदवार बनाया जाता है,वह भी उसी पार्टी का पुराना कार्यकर्ता होता है। उसके समर्थक, उसकी मेहनत और उसका अपना जनाधार होता है।
ऐसे में नए नेता को सिर्फ विपक्ष से नहीं,बल्कि कई बार अपनी ही पार्टी के नाराज कार्यकर्ताओं और टिकट से वंचित नेताओं के समर्थकों से भी मुकाबला करना पड़ता है।
स्वामी प्रसाद मौर्य भाजपा छोड़कर सपा में आए और फाजिलनगर से चुनाव लड़े, लेकिन हार गए।
धर्म सिंह सैनी भाजपा छोड़कर सपा में आए और नकुड़ से चुनाव लड़े,लेकिन हार गए।
अवतार सिंह भड़ाना भाजपा छोड़कर रालोद में गए और जेवर से चुनाव लड़े,लेकिन जीत नहीं पाए।
रोशन लाल वर्मा भाजपा छोड़कर सपा में आए और तिलहर से चुनाव लड़े,लेकिन हार गए।
बृजेश प्रजापति भाजपा छोड़कर सपा में आए और तिंदवारी से चुनाव लड़े, लेकिन जीत नहीं सके।
भगवती प्रसाद सागर भाजपा छोड़कर सपा में आए और घाटमपुर से चुनाव लड़े, लेकिन हार गए।
हरिओम यादव सपा छोड़कर भाजपा में गए और सिरसागंज से चुनाव लड़े, लेकिन हार गए।
शत्रुघ्न सिन्हा भाजपा छोड़कर कांग्रेस में गए और 2019 में पटना साहिब से चुनाव लड़े, लेकिन हार गए।
कीर्ति आजाद भाजपा छोड़कर कांग्रेस में गए और 2019 में धनबाद से चुनाव लड़े, लेकिन हार गए।
ज्योति मिर्धा कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आईं और 2024 में नागौर से चुनाव लड़ीं, लेकिन हार गईं।
कृपाशंकर सिंह कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए और 2024 में जौनपुर से चुनाव लड़े, लेकिन जीत नहीं पाए।
रवनीत सिंह बिट्टू कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए और 2024 में लुधियाना से चुनाव लड़े, लेकिन हार गए।
गीता कोड़ा कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आईं और 2024 में सिंहभूम से चुनाव लड़ीं, लेकिन हार गईं।
प्रणीत कौर कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आईं और 2024 में पटियाला से चुनाव लड़ीं,लेकिन जीत नहीं सकीं।
हालांकि,यह भी सच है कि हर दल-बदलू नेता चुनाव नहीं हारता। लेकिन इन उदाहरणों से एक बात साफ होती है कि पार्टी बदलने के बाद पुराने समर्थकों का भरोसा और नए संगठन का साथ मिलना अपने आप में बड़ी चुनौती होती है।
सियासत में टिकट मिलना किसी नेता की व्यक्तिगत उपलब्धि हो सकती है,लेकिन जीत सिर्फ टिकट से नहीं मिलती। जिस कार्यकर्ता का टिकट काटकर बाहर से आए नेता को उम्मीदवार बनाया जाता है, उसकी नाराजगी भी चुनावी समीकरण बदल सकती है।
आखिरकार, चुनाव में नेता का नाम ही नहीं, संगठन की जमीन, कार्यकर्ताओं की मेहनत और जनता का भरोसा भी मायने रखता है।