कब तक असुरक्षित रज्जु मार्ग ट्रॉली पर टिकी रहेगी फलाचन घाटी की जिंदगी? झूला बना हादसों का रास्ता।
आजादी के दिन भी सुरक्षित रास्ते से महरूम दूर दराज क्षेत्र के लोग, 15 को अगस्त को स्कूल से लौट रही छात्रा की दो उंगलियां कटीं।
बेली ब्रिज बहने के एक साल बाद भी सुरक्षित अस्थाई पुल का इंतजार, स्थायी पुल अब भी दूर।
Kullu Times
जहां एक ओर पूरा देश 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस का उत्सव मना रहा था और आजादी की खुशियां बांट रहा था, वहीं बंजार उपमंडल की दूरदराज फलाचन घाटी में ग्रामीण आज भी अपनी बुनियादी सुविधाओं और सुरक्षित आवाजाही के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ग्राम पंचायत मशियार के अंतर्गत फलाचन नदी पर सुरक्षित पुल न होने के कारण ग्रामीणों को जिस रज्जू मार्ग और लोहे की ट्रॉली के सहारे नदी पार करनी पड़ रही है, वह अब खुद हादसों का कारण बनता जा रहा है।
15 अगस्त को स्कूल से घर लौट रही बारहवीं कक्षा की छात्रा सलोचना ठाकुर की इस ट्रॉली से हाथ की दो उंगलियां बुरी तरह कटकर घायल हो गईं। बताया जा रहा है कि छात्रा स्कूल से घर लौटते समय रज्जू मार्ग से नदी पार कर रही थी, इसी दौरान उसके हाथ की दो उंगलियां रस्सी/ट्रॉली गरारी की व्यवस्था में फंस गईं और गंभीर रूप से घायल हो गईं। इससे पहले भी इसी स्थान पर एक महिला की उंगली रस्सी में फंसकर कटने की घटना सामने आ चुकी है।
बेली ब्रिज बहने के बाद रज्जू मार्ग बना मजबूरी.
ग्रामीणों के अनुसार दोगड़ा के पास फलाचन नदी पर बना बेली ब्रिज वर्ष 2025 की आपदा में बह गया था। इसके बाद ग्रामीणों की आवाजाही के लिए प्रशासन की ओर से वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर रज्जू मार्ग और लोहे की ट्रॉली लगाई गई। शुरुआत में यह व्यवस्था लोगों के लिए मजबूरी में सहारा बनी, लेकिन अब यही व्यवस्था उनके लिए खतरे का कारण बनती जा रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि नदी के एक छोर से दूसरे छोर तक जाने के लिए ट्रॉली को रस्सी के सहारे हाथों से खींचना पड़ता है। कई बार दूसरी तरफ ट्रॉली खींचने के लिए कोई व्यक्ति मौजूद नहीं होता। ऐसे में अकेले महिला, बच्चे, बुजुर्ग या मरीज के लिए नदी पार करना बेहद कठिन और जोखिम भरा हो जाता है।
हर दिन जान हथेली पर रखकर नदी पार कर रहे ग्रामीण.
फलाचन घाटी के कमेडा, मझली और मशियार सहित आसपास के गांवों के लोग रोजमर्रा की जरूरतों के लिए इसी रास्ते पर निर्भर हैं। स्कूली बच्चे पढ़ाई के लिए, महिलाएं दूध बेचने के लिए, किसान अपनी उपज लेकर और बुजुर्ग व मरीज इलाज के लिए इसी खतरनाक रास्ते से नदी पार करने को मजबूर हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि एक तरफ उफनती फलाचन नदी है और दूसरी तरफ डगमगाती लोहे की ट्रॉली। ऐसे में किसी भी समय बड़ा हादसा हो सकता है। अब छात्रा की दो उंगलियां कटने की घटना ने इस व्यवस्था की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कुछ दिन पहले ही युवक मंडल ने डीसी को सौंपा था ज्ञापन.
इस समस्या को लेकर फलाचन वैली युवक मंडल, मशियार ने 1 अगस्त को उपायुक्त कुल्लू को ज्ञापन सौंपकर डोगड़ा स्थान पर जर्जर अस्थायी डिफी के स्थान पर तत्काल सुरक्षित वैकल्पिक व्यवस्था करने तथा फलाचन नदी पर स्थायी पुल बनाने की मांग की थी।
युवक मंडल ने प्रशासन को चेताया था कि जर्जर व्यवस्था के कारण कभी भी बड़ा हादसा हो सकता है। इसके बाद इस समस्या को लेकर समाचार भी प्रकाशित हुआ। लेकिन कुछ ही दिनों बाद क्षेत्र में हुई भारी बारिश के कारण एक पुल और दो अस्थायी पुलिया भी बह गईं तथा ग्रामीणों की परेशानी और बढ़ गई।
नए पुल की प्रक्रिया अभी भी टेंडर तक नहीं पहुंची.
लोक निर्माण विभाग बंजार की ओर से पहले ही बताया गया है कि दोगड़ा में फलाचन नदी पर वाहन योग्य पुल के निर्माण को प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना चरण-4 के तहत स्वीकृति मिल चुकी है। विभाग के अनुसार टेंडर प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही स्थायी पुल का निर्माण शुरू हो सकेगा। नदी का जलस्तर कम होने पर अस्थायी पुल और अन्य सुरक्षा उपाय करने की बात भी कही गई थी।
ग्रामीणों का कहना है कि जब तक स्थायी पुल का निर्माण शुरू नहीं होता, तब तक प्रशासन को लोगों की जान जोखिम में नहीं डालनी चाहिए और कम से कम सुरक्षित अस्थायी पैदल पुल की व्यवस्था करनी चाहिए।
ग्रामीणों ने उठाई तत्काल अस्थायी पुल की मांग.
स्थानीय निवासी मोती राम, पूर्ण चंद, भाग सिंह, तेजस्वी ठाकुर, अमर भारती, रुपेंद्र ठाकुर, नील चंद और हरीश ठाकुर सहित अन्य ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि तीनों गांवों के सैकड़ों लोगों की सुरक्षित आवाजाही के लिए फलाचन नदी पर तत्काल मजबूत अस्थायी पैदल पुल बनाया जाए।
ग्रामीणों का कहना है कि स्थायी पुल बनने में समय लग सकता है, लेकिन तब तक लोगों को इसी तरह जोखिम में छोड़ना उचित नहीं है। खासकर स्कूली बच्चों, महिलाओं, बुजुर्गों और मरीजों की सुरक्षा को देखते हुए तत्काल वैकल्पिक व्यवस्था करना बेहद जरूरी है।
आजादी के अमृतकाल में सुरक्षित रास्ते की आस.
ग्रामीणों का कहना है कि स्वतंत्रता दिवस पर देश विकास और तरक्की की बात करता है, लेकिन फलाचन घाटी के लोग आज भी एक सुरक्षित पुल जैसी मूलभूत सुविधा के लिए तरस रहे हैं। बच्चों को स्कूल जाने के लिए, महिलाओं को रोजी-रोटी के लिए और मरीजों को उपचार के लिए जान जोखिम में डालकर नदी पार करनी पड़ रही है।
छात्रा की दो उंगलियां कटने की घटना को ग्रामीण केवल एक हादसा नहीं, बल्कि लंबे समय से चली आ रही असुरक्षित व्यवस्था का परिणाम मान रहे हैं। उनका कहना है कि किसी बड़े हादसे या जनहानि का इंतजार करने के बजाय प्रशासन को अभी जागना होगा।
ग्रामीणों ने जिला प्रशासन, लोक निर्माण विभाग और क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों से मांग की है कि मामले को गंभीरता से लेते हुए तत्काल सुरक्षित अस्थायी पैदल पुल की व्यवस्था की जाए और स्थायी पुल का निर्माण कार्य प्राथमिकता के आधार पर जल्द शुरू कराया जाए, ताकि फलाचन घाटी के लोगों को सुरक्षित आवाजाही का मूलभूत अधिकार मिल सके।
Kullu, Kullu | Aug 16, 2026