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स्व-सहायता समूह से जुड़कर खुशबू ने बदली अपनी राह, अब राशन दुकान का भी कर रहीं संचालन
नर्मदा स्व-सहायता समूह से मिली आर्थिक मजबूती और ऋण सुविधा ने बढ़ाया आत्मविश्वास, रोजगार के साथ बनी नई पहचान
बुधारा गांव की खुशबू तोमर के जीवन में स्व-सहायता समूह से जुड़ना एक ऐसे बदलाव की शुरुआत बना, जिसने उन्हें आत्मनिर्भरता की राह पर आगे बढ़ने का अवसर दिया। कभी आय के किसी स्थायी साधन से जुड़ी नहीं रहने वाली खुशबू आज नर्मदा स्व-सहायता समूह की सचिव के रूप में जिम्मेदारी निभाने के साथ-साथ राशन दुकान का संचालन भी कर रही हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के मार्गदर्शन और समूह से मिली आर्थिक गतिविधियों ने उनके भीतर आत्मविश्वास जगाया और उन्हें अपनी अलग पहचान बनाने का अवसर दिया।
खुशबू बताती हैं कि वर्ष 2018 में उन्होंने नर्मदा स्व-सहायता समूह का गठन किया। समूह से जुड़ने से पहले उन्हें न तो किसी आजीविका गतिविधि की जानकारी थी और न ही आय का कोई निश्चित साधन। मिशन से जुड़े तपन सर के माध्यम से उन्हें स्व-सहायता समूह की गतिविधियों, बचत की प्रक्रिया और इससे मिलने वाले अवसरों की जानकारी मिली। इसके बाद उन्होंने समूह के साथ जुड़कर नियमित बचत और विभिन्न गतिविधियों में सहभागिता शुरू की।
समूह के लिए आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में पहला कदम आरएफ की राशि से बढ़ा। इसके बाद समूह को सामुदायिक ऋण सीमा की सुविधा प्राप्त हुई। शुरुआत में 50 हजार रुपये की ऋण सीमा से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे डेढ़ लाख रुपये तक पहुंचा। वर्तमान में सामुदायिक ऋण सीमा में पुनः वृद्धि की गई है। समूह के माध्यम से उपलब्ध हुई इस आर्थिक सुविधा ने खुशबू और समूह की अन्य महिलाओं को अपनी आजीविका गतिविधियों को आगे बढ़ाने का हौसला दिया।
खुशबू के जीवन में वर्ष 2021 एक महत्वपूर्ण पड़ाव बनकर आया, जब उन्हें राशन दुकान के संचालन का अवसर मिला। आज वे राशन विक्रेता के रूप में अपनी जिम्मेदारी पूरी निष्ठा से निभा रही हैं। यह अवसर उनके लिए केवल रोजगार का माध्यम नहीं बना, बल्कि इससे ग्रामीणों के साथ उनका जुड़ाव भी बढ़ा और समाज में उनकी एक नई पहचान बनी।
अपने अनुभव साझा करते हुए खुशबू कहती हैं, “समूह से जुड़ने से पहले मुझे किसी गतिविधि की जानकारी नहीं थी और मैं बहुत कम लोगों को जानती थी। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के सहयोग और मार्गदर्शन से मुझे आगे बढ़ने का अवसर मिला। आज मैं अपने काम के साथ लोगों से जुड़ रही हूं और उन्हें भी जानती हूं। इसके लिए मैं राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन और सहयोग करने वाले सभी लोगों का हृदय से धन्यवाद करती हूं।”
खुशबू की कहानी यह दर्शाती है कि स्व-सहायता समूह ग्रामीण महिलाओं के जीवन में बदलाव का माध्यम बन रहे हैं। समूह के माध्यम से महिलाओं को केवल बचत और ऋण की सुविधा ही नहीं मिल रही, बल्कि उन्हें अपनी क्षमताओं को पहचानने, आजीविका के नए अवसर तलाशने, जिम्मेदारियां संभालने और समाज में अपनी पहचान स्थापित करने का अवसर भी मिल रहा है। खुशबू की बदली हुई राह इस विश्वास को मजबूत करती है कि अवसर और सहयोग मिले तो ग्रामीण महिलाएं आत्मनिर्भरता की दिशा में मजबूत कदम बढ़ा सकती हैं।
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