Public App Logo
*309 नगरीय निकायों में आदिवासियों के लिए मात्र 11 प्रमुख पद क्यों?* आदिवासी मीणा पंच पटेल महापंचायत ने राज्यपाल से मांगा हस्तक्षेप* आदिवासी मीणा पंच पटेल महापंचायत के प्रदेश प्रवक्ता रूपसिंह गोरेहार ने प्रेस विज्ञप्ति जारी करके बताया है कि आदिवासी मीणा पंच पटेल महापंचायत के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. पुरुषोत्तम लाल मीणा ने राजस्थान के प्रस्तावित नगरीय निकाय चुनावों में महापौर/सभापति/अध्यक्ष के कुल 309 पदों में अनुसूचित जनजाति के लिए मात्र 11 पद आरक्षित किए जाने पर गंभीर आपत्ति जताते हुए महामहिम राज्यपाल को ज्ञापन भेजकर तत्काल हस्तक्षेप और आरक्षण निर्धारण के पुनरीक्षण की मांग की है। डॉ. मीणा ने कहा कि दैनिक भास्कर में प्रकाशित संभागवार आंकड़ों के अनुसार 309 नगरीय निकायों के प्रमुख पदों में ST के लिए मात्र 11 पद आरक्षित किए गए हैं, जो लगभग 3.56 प्रतिशत हैं, जबकि राजस्थान में अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण सामान्यतः 12.5 प्रतिशत है। ऐसी स्थिति में सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि मात्र 11 पद निर्धारित करने के लिए कौन-से जनसंख्या आंकड़े, कानून, नियम, फार्मूला और रोस्टर अपनाए गए तथा इन्हीं 11 निकायों को ST के लिए चुनने का आधार क्या है। महापंचायत ने ज्ञापन में कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 243T तथा राजस्थान नगरपालिका अधिनियम, 2009 की धारा 43 में अनुसूचित जनजातियों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और निकाय प्रमुखों के पदों के आरक्षण की व्यवस्था है। किसी शहर में ST आबादी कम या अधिक होना यह तय करने में प्रासंगिक हो सकता है कि ST के लिए आरक्षित पद किस निकाय को दिया जाए, लेकिन इससे यह तय नहीं होता कि पूरे राजस्थान के 309 निकाय प्रमुखों में ST के लिए कुल पद मात्र 11 ही होंगे। सरकार को 11 पदों की संख्या निर्धारित करने का वैधानिक और गणितीय आधार सार्वजनिक करना चाहिए। ज्ञापन में कहा गया है कि बताया जाता है कि राज्य सरकार की ओर से यह तर्क दिया जा रहा है कि नगरीय निकाय शहरों में स्थित हैं और शहरों में ST आबादी अपेक्षाकृत कम होने के कारण आरक्षण कम हुआ है। महापंचायत ने इसे अपर्याप्त बताते हुए कहा कि यदि वास्तव में यही आधार है तो सरकार उसका स्पष्ट संवैधानिक और वैधानिक आधार बताए। सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ के K. Krishna Murthy (Dr.) & Ors. v. Union of India & Anr. निर्णय का उल्लेख करते हुए ज्ञापन में स्थानीय स्वशासन में कमजोर वर्गों के पर्याप्त प्रतिनिधित्व और सशक्तीकरण के संवैधानिक उद्देश्य को भी रेखांकित किया गया है। डॉ. मीणा ने चेताया कि “शहरों में आदिवासी आबादी कम है, इसलिए उनका आरक्षण भी कम होगा” जैसी सोच को स्वीकार करना दूरगामी दृष्टि से अत्यंत खतरनाक होगा। यदि शहर की स्थानीय आबादी को आरक्षण घटाने का आधार मान लिया गया तो कल यही तर्क शहरों में स्थित विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों, अन्य शिक्षण संस्थानों और सरकारी कार्यालयों में भी आदिवासियों का आरक्षण कम करने के लिए दिया जा सकता है। ऐसी सोच आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों को धीरे-धीरे सीमित करने की खतरनाक राह खोल सकती है। महापंचायत ने राज्यपाल से राज्य सरकार का संपूर्ण तथ्यात्मक एवं विधिक प्रतिवेदन मंगवाकर ST के लिए मात्र 11 पद निर्धारित करने के जनसांख्यिकीय एवं गणितीय आधार, लागू कानून-नियम एवं रोस्टर और चयनित 11 निकायों के चयन के आधार की जांच कराने तथा किसी भी संवैधानिक, वैधानिक अथवा गणनात्मक विसंगति की स्थिति में चुनाव प्रक्रिया आगे बढ़ने से पूर्व आरक्षण निर्धारण का तत्काल पुनरीक्षण करवाने की मांग की है। *ST विधायकों की चुप्पी पर भी सवाल* ज्ञापन की खुली प्रतिलिपि प्रदेश के ST आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों से निर्वाचित सभी विधायकों को भेजते हुए महापंचायत ने उनसे सार्वजनिक रूप से बताने को कहा है कि उन्होंने 309 में मात्र 11 पद निर्धारित किए जाने पर सरकार से क्या सवाल किए, कौन-सा रिकॉर्ड अथवा गणना मांगी और आदिवासी प्रतिनिधित्व की रक्षा के लिए अब तक क्या कदम उठाए हैं। महापंचायत का कहना है कि ST आरक्षित सीट से निर्वाचित विधायक की जिम्मेदारी केवल विधानसभा पहुंचने तक सीमित नहीं हो सकती; जिस आदिवासी समुदाय के प्रतिनिधित्व के लिए सीट आरक्षित है, उसके संवैधानिक अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए आवाज उठाना उसकी नैतिक जिम्मेदारी है। डॉ. मीणा ने कहा कि यदि राजस्थान सरकार अपने ST विधायकों की सामूहिक और न्यायसंगत मांग भी सुनने को तैयार नहीं होती है तो ऐसे विधायकों को विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष सशर्त इस्तीफा रखने का नैतिक साहस दिखाना चाहिए *“यदि मैं उस आदिवासी समुदाय के संवैधानिक हितों की रक्षा नहीं कर सकता, जिसकी आरक्षित सीट से निर्वाचित होकर विधानसभा पहुंचा हूं, तो मुझे विधायक पद पर बने रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।”* महापंचायत ने अंत में राज्य सरकार से सवाल किया है कि आदिवासी समुदाय के संवैधानिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे संवेदनशील मामले में पारदर्शी और समयबद्ध समाधान के बजाय यदि उसकी उचित आपत्तियों की अनदेखी की जाती रही, तो क्या सरकार स्वयं प्रदेश के आदिवासी समुदाय को अपने संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए लोकतांत्रिक जनांदोलन करने को विवश करने की परिस्थितियां पैदा नहीं कर रही है? राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. पुरुषोत्तम लाल मीणा की ओर से लिखे गए पत्र का महापंचायत के प्रदेश अध्यक्ष पृथ्वीराज मीणा, महासचिव छोटे लाल मीणा, प्रदेश उपाध्यक्ष राजपाल पटेल, श्योराम पटेल, हरकेश मीना एवं डॉ. कर्णसिंह मीना, प्रदेश सचिव ब्रजलाल मीणा, अंगद लाल मीणा, सिया राम मीना, जगमोहन मीणा एवं रमेशचंद मीणा, प्रदेश वाद पंजीयक तथा करौली जिला अध्यक्ष हीरालाल मीणा, प्रदेश कार्यालय सचिव हरिओम पटेल, भरतपुर जिला अध्यक्ष भजन लाल मीणा, अलवर जिला अध्यक्ष कमलसिंह मीणा, धोलपुर जिला अध्यक्ष रामभरोसी मीणा, दौसा जिला अध्यक्ष ओमप्रकाश मीणा, किशन सिंह मीना, नवल ठेकेदार झारेडा, कमल मीना काचैरा, शिवलाल मीना मंडावर, मानसिंह मीना बरगमा, मुन्नालाल पटेल बड़ोडा, रामहंस पटेल खंडीप, चंपूराम हिंगोट, रामदयाल पटेल महस्वा, प्रेम लाल पटेल रानोली, जसराम मीना इरनिया, भरतलाल पटेल रानोली, शीशराम पटेल महस्वा, ब्रजवासी पटेल महस्वा, श्रीराम पटेल रानोली, राम कैलाश पटेल रानोली, सहित सभी प्रदेश, जिला एवं तहसील पदाधिकारियों ने ज्ञापन का समर्थन किया है। *नोट: इसमें अन्य पदाधिकारियों के नाम जोड़े जा सकते हैं।* जारीकर्ता: रूपसिंह गोरेहार प्रदेश प्रवक्ता आदिवासी मीणा पंच पटेल महापंचायत - Gangapur News