
दिल्ली में इंटरनेशनल वाटर वीक में उमा शंकर पांडेय ने जल संरक्षण पर रखे विचार
दिल्ली। जल शक्ति मंत्रालय, भारत सरकार के 9वें इंटरनेशनल वाटर वीक कार्यक्रम में जल संरक्षण एवं पर्यावरण के क्षेत्र में कार्य कर रहे पद्मश्री उमा शंकर पांडेय वक्ता के रूप में शामिल हुए। कार्यक्रम में देश-विदेश से आए जल एवं पर्यावरण क्षेत्र के विशेषज्ञों ने जल संकट और उसके समाधान से जुड़े विभिन्न विषयों पर विचार साझा किए।
उमा शंकर पांडेय ने अपने संबोधन में दुनिया में बढ़ते जल संकट से निपटने और जल संरक्षण के लिए समाज को सामुदायिक प्रयासों से जोड़ने की आवश्यकता पर अपने अनुभव एवं विचार रखे। जखनी में सामुदायिक भागीदारी के माध्यम से जल संरक्षण के उनके कार्यों को जल संरक्षण के क्षेत्र में एक उदाहरण के रूप में भी उल्लेखित किया गया है।
कार्यक्रम में पद्म विभूषण प्रो. मुरली मनोहर जोशी, पद्मश्री मोहन नगर, डॉ. शिप्रा पाठक, डॉ. बिना खंडूरी, डॉ. अनिल मेहता, डॉ. विवेक कुमार सहित अनेक विषय विशेषज्ञों एवं वरिष्ठ अधिकारियों को सुनने और उनसे संवाद करने का अवसर मिला।
कार्यक्रम के संयोजक बालेश्वर ठाकुर, केन-बेतवा परियोजना के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. शशिकांत दीक्षित तथा जल शक्ति मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों एवं विशेषज्ञों से भी उमा शंकर पांडेय ने संवाद किया।
वक्तव्य के बाद प्रो. मुरली मनोहर जोशी ने दिया आशीर्वाद
उमा शंकर पांडेय ने बताया कि अपने वक्तव्य के समाप्त होने के बाद कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पद्म विभूषण प्रो. मुरली मनोहर जोशी ने उन्हें गले लगाया और सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया। उन्होंने इसे अपने लिए विशेष और भावुक क्षण बताया।
उन्होंने कहा कि लगभग 90 वर्ष की उम्र में भी प्रो. मुरली मनोहर जोशी ने बिना कागज देखे जल एवं पर्यावरण से जुड़े विषयों पर विस्तार से अपने विचार साझा किए।
“जल : सभ्यता की स्मृति और भविष्य का संकल्प”
अपने संबोधन में उमा शंकर पांडेय ने कहा कि भारत में नदी केवल नदी नहीं रही, बल्कि उसे माता का दर्जा दिया गया। सरोवर ग्राम-जीवन के केंद्र रहे और कुएँ केवल पानी के स्रोत नहीं बल्कि सामुदायिक जीवन और स्मृति का हिस्सा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि आज जल का सवाल केवल पर्यावरण का विषय नहीं है, बल्कि कृषि, अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य, ग्राम-जीवन, संस्कृति और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य से जुड़ा हुआ प्रश्न है।
उन्होंने भूजल के गिरते स्तर, सूखते तालाब, प्रदूषित नदियों और जल के असमान वितरण जैसी चुनौतियों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि जल संरक्षण के लिए सरकार के प्रयासों के साथ समाज की सक्रिय भागीदारी भी जरूरी है।
अपने संबोधन में उन्होंने कहा—
“जल है तो जीवन की कथा है, जल नहीं है तो राष्ट्र की व्यथा है।”
उन्होंने भारतीय परंपराओं में जल के महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि मनुष्य का जल से संबंध जन्म से पहले शुरू होता है और जीवन के अंतिम संस्कार तक बना रहता है। उनके अनुसार गर्भ में शिशु के विकास से लेकर कृषि, भोजन, घर-निर्माण और अंतिम संस्कार तक मानव जीवन जल से गहराई से जुड़ा हुआ है।
उन्होंने कहा कि—
“गर्भाशय के जल से शुरू हुई यह यात्रा, नदी के जल में विसर्जन पर जाकर पूरी होती है।”
युवाओं और समाज से जल संरक्षण की अपील
उमा शंकर पांडेय ने कहा कि यदि युवा पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ना और आने वाले भविष्य को सुरक्षित करना चाहती है तो उसे जल के पारंपरिक और वैज्ञानिक महत्व को समझना होगा।
उन्होंने कहा कि जल संरक्षण केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। तालाब, कुएँ, नदियां और अन्य जल स्रोतों को बचाने के लिए स्थानीय समुदायों को आगे आना होगा।
उन्होंने गंगा और यमुना सहित देश की नदियों के संदर्भ में पानी के बढ़ते व्यावसायीकरण पर भी चिंता व्यक्त की और कहा कि इस विषय पर समाज को गंभीरता से विचार करना होगा।
उमा शंकर पांडेय ने कार्यक्रम में आमंत्रित करने के लिए पर्यावरण गतिविधियों की केंद्रीय समिति के सदस्य संतोष गुप्ता एवं उनकी टीम का आभार व्यक्त किया।
उन्होंने कहा कि जल केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता की स्मृति और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का संकल्प है। जल बचेगा तो जीवन और सृष्टि बचेगी।
Banda, Banda | Oct 1, 2026