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अगर आज हम एक सामान्य रॉकेट में बैठकर सौर मंडल की सैर पर निकलें, तो सबसे पहले एक बात जान लीजिए... अंतरिक्ष फिल्मों की तरह कुछ घंटों में ग्रहों तक पहुँचना संभव नहीं है। असलियत इससे कहीं ज़्यादा दिलचस्प है। मान लीजिए हमारा रॉकेट औसतन 40,000 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से उड़ रहा है। सबसे पहले सामने आएगा चंद्रमा, और वहाँ पहुँचने में लगेंगे करीब 3 दिन। इसके बाद बारी आएगी शुक्र की। पृथ्वी का सबसे नज़दीकी ग्रह होने के बावजूद वहाँ पहुँचने में लगभग 5 महीने लग सकते हैं। और अगर लक्ष्य मंगल हो, तो सफर करीब 6 महीने का हो सकता है। यही वजह है कि मंगल मिशन इतने लंबे और चुनौतीपूर्ण होते हैं। अब ज़रा और आगे बढ़ते हैं। बृहस्पति, सौर मंडल का सबसे बड़ा ग्रह, वहाँ पहुँचने में करीब 5 साल लग सकते हैं। उसके बाद शनि, जिसकी खूबसूरत रिंग्स दुनिया भर में मशहूर हैं, वहाँ तक पहुँचने में लगभग 7 साल का समय लग सकता है। लेकिन असली धैर्य की परीक्षा तो इसके बाद शुरू होती है। अरुण (यूरेनस) तक पहुँचने में करीब 8.5 साल, जबकि सबसे दूर के प्रमुख ग्रह वरुण (नेपच्यून) तक पहुँचने में लगभग 12.5 साल लग सकते हैं। दिलचस्प बात यह है कि बुध सूर्य के सबसे पास होने के बावजूद वहाँ पहुँचना हमेशा सबसे आसान नहीं होता। सूर्य के बेहद शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण और जटिल कक्षीय मार्गों की वजह से कई मिशनों को वहाँ पहुँचने में करीब 7–8 साल तक लग चुके हैं। हालाँकि, ये सभी समय अनुमानित हैं। वास्तविक यात्रा मिशन की तकनीक, रॉकेट की गति, ग्रहों की उस समय की स्थिति और चुने गए उड़ान मार्ग पर निर्भर करती है। यानी अंतरिक्ष में दूरी सिर्फ़ किलोमीटर से नहीं, बल्कि सालों के धैर्य से भी मापी जाती है। #Space #SolarSystem #Rocket #Astronomy #AmazingFacts - Bihar News