
शिमला में वामपंथी पार्टियों का प्रदर्शन, मुख्य चुनाव आयुक्त को बर्खास्त करने की मांग
एसआईआर प्रक्रिया पर रोक लगाने और हटाए गए पात्र मतदाताओं के नाम बहाल करने की उठाई मांग
शिमला। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) तथा वामपंथी पार्टियों के देशव्यापी आह्वान के तहत गुरुवार को शिमला में डीसी कार्यालय के बाहर जोरदार प्रदर्शन किया गया। प्रदर्शनकारियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से बर्खास्त करने, मतदाता सूचियों में चल रही एसआईआर प्रक्रिया पर रोक लगाने, एसआईआर के दौरान हटाए गए पात्र मतदाताओं के नाम पुनः मतदाता सूची में शामिल करने तथा चुनाव आयोग की संवैधानिक और स्वायत्त भूमिका को बहाल करने की मांग उठाई।
प्रदर्शन में माकपा हिमाचल प्रदेश राज्य सचिव कॉमरेड संजय चौहान, राज्य सचिव मंडल सदस्य प्रेम गौतम, जिला सचिव विजेंद्र मेहरा, शिमला लोकल कमेटी सचिव जगत राम, फाल्मा चौहान, जगमोहन ठाकुर, इंजीनियर आरपी सिंह, तमिलनाडु भाकपा नेता ए. भास्कर, बालक राम, विवेक कश्यप, महेश वर्मा, डॉ. राजेंद्र चौहान, डॉ. विजय कौशल, गोबिंद चितरांटा, भूपेंद्र सिंह, रंजीव कुठियाला, मुकेश, योगी सिंघानिया, पवन, विवेक नेहरा, प्रवेश, तिलक, विवेक बिरसांटा सहित सैकड़ों कार्यकर्ताओं एवं नागरिकों ने भाग लिया।
प्रदर्शन को संजय चौहान, विजेंद्र मेहरा, जगत राम, आरपी सिंह, ए. भास्कर और मुकेश कुमार ने संबोधित किया। वक्ताओं ने कहा कि भारत के लोकतंत्र की बुनियाद सार्वभौमिक मताधिकार पर टिकी है। प्रत्येक पात्र नागरिक को बिना किसी भेदभाव के मतदाता सूची में शामिल करना और उसे मतदान का अधिकार सुनिश्चित करना चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि मतदाता सूचियों में व्यापक स्तर पर बदलाव और एसआईआर प्रक्रिया को लेकर देशभर में गंभीर सवाल उठ रहे हैं। वामपंथी पार्टियों का कहना है कि ऐसी किसी भी प्रक्रिया को तब तक आगे नहीं बढ़ाया जाना चाहिए, जब तक यह सुनिश्चित न हो कि एक भी पात्र नागरिक का नाम गलत तरीके से मतदाता सूची से बाहर न हो।
वक्ताओं ने कहा कि चुनाव आयोग को किसी भी राजनीतिक दल अथवा सरकार के प्रभाव से स्वतंत्र होकर कार्य करना चाहिए। आयोग की विश्वसनीयता लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि एसआईआर को लेकर सबसे बड़ी चिंता पात्र नागरिकों के नाम मतदाता सूची से गलत तरीके से हटाए जाने की है। यदि किसी नागरिक का नाम मतदाता सूची से हटाया जाता है तो पूरी प्रक्रिया पारदर्शी, कानूनी, सत्यापन योग्य और नागरिक को पर्याप्त अवसर देने वाली होनी चाहिए।
प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि मतदाता सूची से हटाए गए सभी पात्र मतदाताओं के नाम तत्काल बहाल किए जाएं। साथ ही, चुनाव आयोग यह सुनिश्चित करे कि किसी भी नागरिक को प्रशासनिक प्रक्रिया, दस्तावेजों की जटिलता अथवा अन्य कारणों से उसके संवैधानिक मताधिकार से वंचित न होना पड़े।
वक्ताओं ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता और स्वायत्तता को लोकतंत्र की आधारभूत आवश्यकता बताया। उन्होंने कहा कि आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर उठ रहे सवालों का समाधान पारदर्शिता, जवाबदेही और सार्वजनिक विश्वास को मजबूत करने के माध्यम से किया जाना चाहिए। प्रदर्शन में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की वर्तमान व्यवस्था को लेकर भी चिंता जताई गई। वक्ताओं ने कहा कि वर्ष 2023 में संसद द्वारा बनाए गए कानून को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती लंबित है और 23 सितंबर 2026 को इस मामले में दो सदस्यीय पीठ का विभाजित फैसला आया, जिसके बाद मामला बड़ी पीठ के समक्ष जाने की स्थिति बनी है।
वामपंथी पार्टियों ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए ऐसी पारदर्शी और स्वतंत्र व्यवस्था की मांग दोहराई, जिसमें कार्यपालिका के साथ विपक्ष और न्यायपालिका की भूमिका भी सुनिश्चित हो। उन्होंने प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश वाली चयन व्यवस्था की मांग रखी।
प्रदर्शनकारियों ने कहा कि निर्वाचन आयोग भारत का संवैधानिक निकाय है और उसका दायित्व स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराना तथा मतदाता सूची की शुचिता सुनिश्चित करना है। वक्ताओं के अनुसार, यदि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लेकर जनता का विश्वास कमजोर होता है तो इसका असर लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर पड़ता है। ऐसे में आयोग की स्वायत्तता को मजबूत करना और उसकी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता सुनिश्चित करना आवश्यक है।
प्रदर्शन में वक्ताओं ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए उनकी बर्खास्तगी की मांग की। उन्होंने कहा कि निर्वाचन आयोग के भीतर मतदाता पंजीकरण, नाम हटाने, नाम बहाल करने और एसआईआर से संबंधित निर्णयों को लेकर दो निर्वाचन आयुक्तों द्वारा आपत्तियां दर्ज किए जाने की रिपोर्ट सामने आई है। पार्टी ने इन घटनाक्रमों को आयोग की कार्यप्रणाली और जवाबदेही से जुड़े गंभीर सवालों के रूप में उठाया।
वक्ताओं ने कहा कि यह आंदोलन केवल किसी एक व्यक्ति को पद से हटाने का सवाल नहीं है, बल्कि देश के लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक ढांचे, स्वतंत्र निर्वाचन प्रक्रिया और प्रत्येक नागरिक के मताधिकार की रक्षा से जुड़ा मुद्दा है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सरकारें और संस्थाएं जनता के प्रति जवाबदेह होती हैं तथा चुनाव प्रक्रिया में जनता का विश्वास सर्वोपरि है। इसलिए चुनाव आयोग को निष्पक्ष, स्वतंत्र, पारदर्शी और जवाबदेह तरीके से कार्य करना चाहिए।