
क्रूरता का अंत: श्रद्धा के हत्यारों को उम्रकैद, लेकिन क्या यह न्याय पूरा है?
सुल्तानपुर की 17 साल की मासूम छात्रा श्रद्धा सिंह को घर में अकेला पाकर हाथ-पैर बांधना, फिर केरोसिन छिड़ककर जिंदा जला देना—यह सिर्फ हत्या नहीं, बल्कि इंसानियत का कत्ल था! जब कोर्ट ने दोनों दरिंदों, सुभाष और जयकरन को उम्रकैद की सजा सुनाई, तो कानून का सीना तो चौड़ा हुआ, लेकिन पीड़ित पिता का यह दर्द हर दिल को चीर गया कि 'सजा कम है, इन्हें फांसी होनी चाहिए थी।'
कोर्ट परिसर में जब दोषी सुभाष की मां ने उसे रोते हुए ₹500 का नोट थमाया और उसकी पत्नी पति से लिपटकर फूट-फूटकर चीखने लगी कि 'मैं तुम्हें नहीं जाने दूंगी,' तो एक पल के लिए वहां सन्नाटा पसर गया। लेकिन इस ड्रामे और आंसुओं के बीच समाज को यह नहीं भूलना चाहिए कि इन हत्यारों ने एक हंसती-खेलती बेटी को तड़पा-तड़पा कर मार डाला था। आज कानून के आगे इन पापियों के सिर भले ही झुक गए हों, पर बेटियों की सुरक्षा के लिए रूह आज भी कांप उठती है।
⚠️ डिस्क्लेमर: यह पोस्ट सुल्तानपुर फास्ट ट्रैक कोर्ट के आधिकारिक फैसले और प्रकाशित मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति या परिवार की निजी भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं, बल्कि जघन्य अपराध के खिलाफ न्याय व्यवस्था और सामाजिक संवेदनाओं को प्रकट करना है।
Ambala, Ambala | Sep 22, 2026