
बरहा के ‘बागी’ भोगेन्द्र झा से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन के नायक डॉ. बैद्यनाथ झा तक…
बेनीपट्टी की मिट्टी में पल रही थी क्रांति की एक पूरी पीढ़ी
पिछली कड़ी में आपने पढ़ा कि कैसे बरहा गांव के ‘बागी’ भोगेन्द्र झा के भीतर बचपन से ही सामाजिक असमानता, जातिगत भेदभाव, गरीबी और धार्मिक रूढ़ियों को लेकर सवाल उठने लगे थे।
लेकिन भोगेन्द्र झा की कहानी अकेली कहानी नहीं थी।
उसी दौर में बेनीपट्टी की मिट्टी में कई ऐसे युवा तैयार हो रहे थे, जिनके भीतर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह की आग धधक रही थी।
इन्हीं में एक नाम था — डॉ. बैद्यनाथ झा
भारत छोड़ो आंदोलन में बेनीपट्टी के इस डॉक्टर की भूमिका ऐसी रही कि अंग्रेजी हुकूमत ने उनका पुश्तैनी घर तक जला दिया।
लेकिन घर जल गया…
सामान जल गया…
परिवार को गांव छोड़ना पड़ा…
फिर भी उनका हौसला नहीं जला।
बेनीपट्टी की धरती के यह कहानी सिर्फ कम्युनिस्ट भोगेन्द्र झा ही नहीं बल्कि क्रांतिकारी डॉक्टर सोशलिस्ट डॉ बैद्यनाथ की भी है...
कैसे रसगुल्ले के बहाने भोगेन्द्र झा ने समाज की स्थापित व्यवस्था को चुनौती दी।
कैसे मधुबनी में सुभाष चन्द्र बोस के कार्यक्रम के आयोजन की जिम्मेदारी उन्होंने संभाली।
और कैसे रामगढ़ में उनकी मुलाकात महात्मा गांधी से हुई, जहां एक किशोर भोगेन्द्र झा ने गांधीजी से भी सवाल पूछने में संकोच नहीं किया।
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1934 में गांधीजी पहुंचे मधुबनी
15 जनवरी 1934 को नेपाल और बिहार में आए भीषण भूकंप ने भारी तबाही मचाई थी। बिहार में हजारों लोगों की जान चली गई थी।
भूकंप के बाद जब हालात धीरे-धीरे सामान्य होने लगे, तब महात्मा गांधी मधुबनी पहुंचे।
गांधीजी किसी से अपने पैर छुआने के पक्ष में नहीं थे। वे कांग्रेस के सहयोगियों के साथ मधुबनी की मुख्य सड़क पर पैदल जा रहे थे।
इसी दौरान बेनीपट्टी प्रखंड के त्योंथ गांव के गणेश चन्द्र झा उनके सामने पहुंचे।
गणेश चन्द्र झा उस समय कांग्रेस के गरम दल से जुड़े हुए थे।
उन्होंने गांधीजी के पैर छुए और हाथ जोड़कर कहा—
“बापू, हमें माफ कर दीजिए। अब हम आपके विचारों के साथ हैं। मैं अब गरम दल के साथ नहीं हूं।”
इस तरह गणेश चन्द्र झा गांधीजी के साथ हो गए।
उस समय गांधीजी अछूत उद्धार अभियान चला रहे थे। इसी क्रम में वे जगह-जगह पैदल यात्रा कर रहे थे।
मधुबनी पहुंचने पर वे अपने सहयोगियों के साथ लत्तर मेहतर के घर गए और उनके हाथों से दूध पिया।
इसके बाद सप्ता में भालसरी चौक के पास गांधीजी की सभा होनी थी।
सभा में बड़ी संख्या में लोग जुटे।
लेकिन लत्तर मेहतर के हाथों गांधीजी के दूध पीने से नाराज कुछ विरोधी उन्हें जूतों की माला पहनाने की कोशिश करते हुए सभा स्थल के पास पहुंच गए।
जब वे सफल नहीं हुए तो काले झंडे दिखाने लगे।
सभा में मौजूद लोग विरोध करने वालों के प्रतिकार के लिए आगे बढ़े और उन्हें खदेड़ने लगे।
गांधीजी ने तत्काल लोगों को रोक दिया।
उन्होंने कहा—
“वे लोग यही तो चाहते हैं कि आप हमारी बातों को नहीं सुनें। यह हमारे उद्देश्यों को भटकाने की कोशिश है। आप लोग संयम से काम लीजिए। ये लोग थक जाएंगे, चले जाएंगे।”
यह उस दौर की जटिल राजनीतिक परिस्थितियों का भी समय था।
उस समय कम्युनिस्ट पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बीच आज जैसा स्पष्ट राजनीतिक अलगाव नहीं था। कई कम्युनिस्ट कार्यकर्ता कांग्रेस के भीतर भी सक्रिय थे। आगे चलकर दोनों धाराओं के रास्ते अलग हुए।
इसी दौर में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन यानी AISF जैसे छात्र संगठनों ने भी युवाओं को राष्ट्रीय आंदोलन और राजनीतिक गतिविधियों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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रसगुल्ले के कारण भोगेन्द्र झा का बहिष्कार
गांधीजी का अछूत उद्धार अभियान करीब 1940 तक चलता रहा।
इसी क्रम में वर्ष 1939 में बेनीपट्टी में मधुबनी अनुमंडल के सत्याग्रहियों का प्रशिक्षण शिविर लगा।
भोगेन्द्र झा सत्याग्रही नहीं थे, लेकिन वे भी शिविर में पहुंच गए।
शिविर के पहले दिन गांधीजी के अछूत उद्धार कार्यक्रम की शर्त के अनुसार सत्याग्रहियों को दलित समुदाय के व्यक्ति के हाथों भोजन करना था।
वहां केश्वर राम नाम के एक दुसाध शिक्षक थे। मूल रूप से बेहटा गांव के रहने वाले केश्वर राम 1937 में अंग्रेजी शासन द्वारा कराए गए विधानसभा चुनाव में निर्वाचित भी हुए थे।
शिविर में उनके हाथों लोगों ने दो-दो रसगुल्ले खाए।
शिविर समाप्त हुआ।
लेकिन इसके बाद इलाके में हंगामा मच गया।
कहा जाने लगा—
“कांग्रेसी अछूत हो गए हैं, इन्हें समाज से निकालो।”
रसगुल्ला खाने वाले कई कांग्रेसी सामाजिक बहिष्कार के डर से बात छिपाने लगे। कुछ ही लोग खुलकर खड़े हुए।
गांव के ज्योतिषी बाबा के यहां पंचायत बैठी।
भोगेन्द्र झा को भी बुलाया गया।
बाबा ने पूछा—
“तुम कुल-कलंकी हो! रसगुल्ला खाए हो या नहीं? साफ-साफ बोलो।”
असल में रसगुल्ला खाने की घटना शिविर के पहले दिन की थी और भोगेन्द्र झा दूसरे दिन शिविर में पहुंचे थे। इसलिए उन्होंने रसगुल्ला खाया ही नहीं था।
लेकिन यहां भोगेन्द्र झा ने एक अलग ही रास्ता चुना।
बिना रसगुल्ला खाए ही वे अड़ गए—
“क्यों नहीं खाऊंगा?”
बहस शुरू हो गई।
लोगों ने कहा—
“ब्राह्मण की संतान होकर रसगुल्ला खाओगे?”
भोगेन्द्र झा ने तर्क दिया—
“फलां काका की नियुक्ति टाटा, जमशेदपुर में हुई है। वहां वे लोहार का काम करने गए हैं। तो क्या वे ब्राह्मण नहीं रहेंगे?”
लोगों ने कहा—
“काम करने से कोई लोहार नहीं हो जाता।”
भोगेन्द्र झा ने अगला सवाल किया—
“बाटा में चमड़े का काम करेगा तो चमार हो जाएगा?”
लोग आगबबूला हो गए।
अंत में लोगों ने कहा—
“जो ब्राह्मण का लड़का है, वह कोई भी काम करे, ब्राह्मण ही रहेगा।”
भोगेन्द्र झा ने जवाब दिया—
“मैं भी तो यही समझाना चाहता हूं। मेरा जन्म ब्राह्मण परिवार में हुआ है। मैं रसगुल्ला खा भी लिया तो भी ब्राह्मण ही रहूंगा। फिर यह झंझट किस बात का?”
लेकिन समाज उनके तर्क को स्वीकार करने को तैयार नहीं था।
नतीजा—
भोगेन्द्र झा और उनके परिवार का सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया।
बचपन से उठ रहे सवाल अब विद्रोह में बदलने लगे थे।
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एक छात्र ने अंग्रेजों के चंदे के खिलाफ खड़ा कर दिया पूरा स्कूल
इसी समय भोगेन्द्र झा मधुबनी के सूड़ी हाई स्कूल में पढ़ रहे थे।
1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने के बाद ब्रिटिश शासन ने स्कूलों से युद्ध के नाम पर चंदा वसूलने का आदेश दिया।
सूड़ी हाई स्कूल में बेहटा गांव के तेज नारायण झा पढ़ाई में अव्वल छात्रों में थे। उन्हें छात्रों से चंदा वसूलने की जिम्मेदारी दी गई।
तब तक कटैया गांव के श्रीमोहन झा का संपर्क भोगेन्द्र झा से हो चुका था।
श्रीमोहन झा ने अपने से जूनियर तेज नारायण झा को समझाया, लेकिन वे तैयार नहीं हुए।
इसके बाद श्रीमोहन झा उन्हें भोगेन्द्र झा के पास लेकर पहुंचे।
भोगेन्द्र झा की बातों का तेज नारायण झा पर गहरा असर हुआ।
उन्होंने स्कूल में चंदा वसूलने के आदेश के खिलाफ बगावत कर दी।
नतीजा यह हुआ कि—
एक भी छात्र ने चंदा नहीं दिया।
यहीं से तेज नारायण झा ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन से जुड़ गए।
इसी वर्ष राजकुमार पूर्वे भी छात्र फेडरेशन से जुड़े।
उसी दौरान प्रतिबंधित कम्युनिस्ट पार्टी के भूमिगत नेता श्यामल किशोर झा की एक गुप्त बैठक रात में छात्रावास में हुई। वे मधुबनी में कम्युनिस्ट पार्टी का संगठन खड़ा करने आए थे।
इस बैठक में राजकुमार पूर्वे भी शामिल हुए।
यही वह मौका था, जब उन्होंने पहली बार कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया यानी CPI का नाम सुना।
1939-40 के आसपास भोगेन्द्र झा ने श्रीमोहन झा, राजकुमार पूर्वे, तेज नारायण झा, चतुरानन मिश्र, बैद्यनाथ यादव सहित अन्य साथियों के साथ पुराने दरभंगा जिले में जिला कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की दिशा में गुप्त रूप से संगठनात्मक काम शुरू किया।
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किसान सभा से लेकर कम्युनिस्ट आंदोलन तक
इससे ठीक एक साल पहले, 1938 में मधुबनी में किसान सभा का विशाल जिला सम्मेलन हुआ था।
पंडित धनराज शर्मा और सूरज नारायण सिंह के संयोजन में हुए इस सम्मेलन में सहजानंद सरस्वती, जयप्रकाश नारायण, सज्जाद जहीर और योगेंद्र शुक्ल जैसे बड़े नेता शामिल हुए थे।
इसी सम्मेलन और उसके बाद के राजनीतिक वातावरण में भोगेन्द्र झा, श्रीमोहन झा, चतुरानन मिश्र, तेज नारायण झा और बैद्यनाथ यादव जैसे युवा किसान सभा की गतिविधियों से सक्रिय रूप से जुड़े।
लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के सवाल पर इसी दौर में कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट धाराओं के बीच मतभेद भी उभरने लगे।
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मधुबनी पहुंचे सुभाष चन्द्र बोस
फरवरी 1940।
मधुबनी में सुभाष चन्द्र बोस के आगमन की तैयारी हो रही थी।
कांग्रेस से अलग हो चुके सुभाष बाबू को उस समय कांग्रेस का एक बड़ा धड़ा ‘बागी’ मान रहा था।
संगठन के अखिल भारतीय अध्यक्ष शीलभद्र याजी ने पंडित धनराज शर्मा के माध्यम से भोगेन्द्र झा को कार्यक्रम की तैयारी का संदेश भेजा।
छात्र संघ की ओर से भोगेन्द्र झा कार्यक्रम के मुख्य संयोजक बनाए गए।
लेकिन जैसे ही वे तैयारी के लिए मधुबनी पहुंचे, जिन लोगों ने मदद का आश्वासन दिया था, उनमें से कई पीछे हट गए।
कांग्रेसी नेताओं से जब वे दरी, चादर और तिरंगा मांगने पहुंचे तो जवाब मिला—
“हम कांग्रेस के बागी के लिए कुछ नहीं देंगे।”
छात्र खादी भंडार से जैसे-तैसे दरी लेकर आए, लेकिन उसे भी दूसरे खेमे के लोगों ने छीन लिया।
भोगेन्द्र झा ने श्रीमोहन झा, चतुरानन मिश्र, राजकुमार पूर्वे, माझी साह, गंगाधर दास, कृष्णचन्द्र चौधरी और अन्य साथियों के साथ मिलकर कार्यक्रम की तैयारी जारी रखी।
करीब डेढ़-दो मील तक सड़क के दोनों तरफ बांस की सीधी कर्चियों पर कागज के झंडे और नारे लगाए गए।
नारा था—
“साम्राज्यवाद की यही लड़ाई,
एक न पाई, एक न भाई।”
कार्यक्रम के लिए स्वागत गान भी तैयार होना था।
सूड़ी हाई स्कूल के शिक्षक सत्यनारायण सिंह स्वागत गान लिखने वाले थे।
लेकिन कार्यक्रम से दो घंटे पहले जब भोगेन्द्र झा गीत लेने पहुंचे तो उन्होंने साफ मना कर दिया—
“कांग्रेस के बागी के लिए हम स्वागत गान नहीं देंगे।”
भोगेन्द्र झा लौटे।
और फिर वहीं कॉपी-कलम उठाकर स्वयं स्वागत गान लिख दिया—
“ऐ क्रांतिदूत स्वागत करते हैं हम तुम्हारा,
जगमग-भूषण, भारत भविष्य तारा।
स्वागत तरुण तपस्वी, स्वतंत्रता के पुजारी,
हे क्रांतिदूत, तेरा इंकलाब एक नारा।”
यह गीत उन्होंने अपने साथी तेज नारायण झा को दिया।
तेज नारायण झा ने यदुवीर नायक के साथ श्री अजब लाल के हारमोनियम पर इसे गाया।
कार्यक्रम सफल रहा।
सुभाष चन्द्र बोस छात्र संघ के इन युवाओं से प्रभावित हुए।
उन्होंने भोगेन्द्र झा सहित सक्रिय छात्र नेताओं को तत्कालीन बिहार के रामगढ़ में होने वाले कांग्रेस के सम्मेलन में आने का निमंत्रण दिया।
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रामगढ़ में गांधीजी के सामने खड़ा था 17-18 साल का ‘बागी’
5 फरवरी 1940।
रामगढ़।
गांधीजी सहित कांग्रेस के बड़े नेताओं के लिए चटाई की झोपड़ियां बनाई जा रही थीं।
भोगेन्द्र झा इस काम में निपुण थे।
उन्होंने गांधीजी, मणिबेन पटेल और कई अन्य नेताओं के लिए चटाई की झोपड़ियां तैयार कीं।
मिथिला के नेता रूपधर झा भोगेन्द्र झा को जानते थे।
उन्होंने अपने सहयोगी से कहा—
“इसकी गांधीजी से बात कराओ। यह कम्युनिस्ट होता जा रहा है। शायद गांधीजी से बात हो जाए तो बदल जाएगा।”
भोगेन्द्र झा को गांधीजी की झोपड़ी में ले जाया गया।
रूपधर झा ने कहा—
“बापू, यह कम्युनिस्ट हो गया है।”
गांधीजी ने सामने खड़े युवक को देखा।
उम्र करीब 17-18 साल।
पैरों में जूते नहीं।
सिर मुंडा हुआ।
गांधीजी ने पूछा—
“कहां का है?”
जवाब मिला—
“मधुबनी।”
गांधीजी ने पूछा—
“क्यों जी, सचमुच?”
भोगेन्द्र झा ने कहा—
“किसी कम्युनिस्ट से मुलाकात नहीं हुई है, लेकिन विचार तो हो गया है।”
इसके बाद दोनों के बीच सवाल-जवाब शुरू हुए।
भोगेन्द्र झा ने गांधीजी से पूछा—
“आप ईश्वर की रोशनी कहते हैं। यह कैसे साबित होता है?”
गांधीजी ने जवाब दिया—
“मेरे लिए सत्य ही ईश्वर है…”
इस संवाद को बाद में ‘हरिजन सेवक’ में ‘एक छात्र के साथ संवाद’ शीर्षक से प्रकाशित किया गया। प्रकाशित संवाद में भोगेन्द्र झा का नाम नहीं था, लेकिन सवाल-जवाब उन्हीं से जुड़े बताए जाते हैं।
बाद में अपनी जीवनी में भोगेन्द्र झा ने इस मुलाकात के बारे में लिखा कि वे गांधीजी से मिलने आकर्षण की उम्मीद लेकर पहुंचे थे, लेकिन इस बातचीत के बाद उनके मन में गांधीजी के प्रति आकर्षण के बजाय विकर्षण पैदा हुआ।
उनका मानना था कि गांधीजी अपने तर्क के ऊपर ईश्वर को रख देते हैं।
यही वह दौर था, जब भोगेन्द्र झा की राजनीतिक सोच एक अलग दिशा में आगे बढ़ रही थी।
लेकिन इसी कहानी के समानांतर बेनीपट्टी में एक और युवा अपने भीतर आजादी की आग लेकर डॉक्टर बनने की राह पर बढ़ रहा था।
उसका नाम था—
डॉ. बैद्यनाथ झा
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भारत छोड़ो आंदोलन में बेनीपट्टी के नायक डॉ. बैद्यनाथ झा
डॉ. बैद्यनाथ झा का जन्म वर्ष 1918 में बेनीपट्टी थाना क्षेत्र के बेहटा गांव के पुरवारी टोले में हुआ था।
उनके पिता छोटे किसान थे।
परिवार में शिक्षा का वातावरण था। उनके बड़े भाई मिडिल पास थे, छोटे भाई बीए पास थे और तीसरे भाई रघुवीर झा बीए तक पढ़े थे।
बड़े भाई का निधन 1934 में और पिता का निधन 1935 में हो गया।
रघुवीर झा वर्ष 1930 से मध्य विद्यालय में प्रधानाध्यापक के रूप में काम कर रहे थे। 1942 की क्रांति में उन्होंने भी भाग लिया और प्रधानाध्यापक का पद छोड़ दिया।
बाद में वे बेनीपट्टी उच्च विद्यालय में शिक्षक रहे। वर्ष 1965 में उनका आकस्मिक निधन हो गया।
दोनों भाइयों की शिक्षकों और समाज में अच्छी ख्याति थी।
डॉ. बैद्यनाथ झा ने 1935 में सुरसंड उच्च विद्यालय से द्वितीय श्रेणी में मैट्रिक की परीक्षा पास की।
1937 में पटना साइंस कॉलेज से इंटर साइंस की परीक्षा उत्तीर्ण की और उसी वर्ष पटना मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया।
उनके दोनों बड़े भाई खादी पहनते थे।
छोटे भाई यदुवीर झा कांग्रेस के सक्रिय सदस्य थे।
बेनीपट्टी मध्य विद्यालय में हेडमास्टर रहते हुए यदुवीर झा ने धकजरी गांव के बालक राजकुमार पूर्वे को अपनी जेब से चार आना सदस्यता शुल्क देकर कांग्रेस की सदस्यता दिलाई थी।
वही राजकुमार पूर्वे आगे चलकर कम्युनिस्ट पार्टी के बड़े नेता बने और पांच बार विधायक तथा एक बार बिहार विधान परिषद के सदस्य रहे।
यदुवीर झा 1940 में कांग्रेस डेलीगेट के लिए भी चुनाव लड़े, लेकिन धकजरी के प्रभावशाली जमींदार शुभचंद्र मिश्र से हार गए।
शुभचंद्र मिश्र संपत्ति, राजनीतिक पहुंच और सामाजिक प्रभाव के मामले में जिले की प्रमुख हस्तियों में गिने जाते थे।
धकजरी स्थित उनके घर पर बड़े-बड़े नेता आते थे। बाद में भूदान आंदोलन के दौरान विनोबा भावे भी वहां ठहरे।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का बेनीपट्टी थाना कार्यालय भी काफी समय तक धकजरी में उनके दरवाजे पर ही चलता रहा।
इसी कांग्रेस कार्यालय में डॉ. बैद्यनाथ झा के भाइयों का आना-जाना लगा रहता था।
खादी और कांग्रेस के प्रति भाइयों का समर्पण देखकर बैद्यनाथ झा भी प्रभावित हुए।
मेडिकल कॉलेज की पढ़ाई के दौरान उन्होंने अंग्रेजी शैली का सूट-बूट पहनने के बजाय खादी को अपनाया।
छात्र जीवन में वे 26 जनवरी के जुलूसों में भाग लेते थे।
1936 में पंडित जवाहरलाल नेहरू का भाषण सुनने के लिए वे देर रात तक पटना के कांग्रेस मैदान में बैठे रहे। सुबह हॉस्टल सुपरिटेंडेंट की प्रताड़ना भी सहनी पड़ी।
लेकिन उनके भीतर का देशभक्त छात्र पीछे नहीं हटा।
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भारत छोड़ो आंदोलन का बेनीपट्टी में असर
1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हुआ।
ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं से बिना पूछे भारत को भी युद्ध में झोंक दिया।
देश में आक्रोश बढ़ने लगा।
भारतीय सैनिकों की भर्ती और ब्रिटिश युद्ध नीति के खिलाफ विरोध शुरू हुआ।
1940 में जब मानवेन्द्र नाथ राय पटना पहुंचे, तो उनके स्वागत जुलूस में डॉ. बैद्यनाथ झा भी शामिल हुए।
पटना के अंजुमन इस्लामिया भवन में राय का भाषण हुआ।
परमानंद और डॉ. श्यामानंद द्विवेदी के संपर्क के माध्यम से बैद्यनाथ झा को उनके राजनीतिक विचारों और जीवन के बारे में जानने का अवसर मिला।
फिर आया—
8 अगस्त 1942।
बंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पारित किया।
नारा था—
“करो या मरो”
अगले ही दिन 9 अगस्त 1942 को गांधीजी, जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आजाद सहित कांग्रेस के कई बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।
बिहार में भी गिरफ्तारी के विरोध में छात्रों और आम लोगों का आंदोलन तेज हो गया।
भारत छोड़ो आंदोलन का असर बेनीपट्टी के क्रांतिकारियों पर भी व्यापक पड़ा।
बेनीपट्टी के—
डॉ. बैद्यनाथ झा,
बरहा के भोगेन्द्र झा,
बेहटा के तेज नारायण झा,
त्योंथ के गणेश चन्द्र झा,
कटैया के श्रीमोहन झा
और धकजरी के राजकुमार पूर्वे
उन अग्रणी युवाओं में थे, जिन्होंने 1942 में तत्कालीन दरभंगा जिले के अलग-अलग हिस्सों में अंग्रेजी शासन की नींव हिला दी।
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गणेश चन्द्र झा के शहीद होने की फैली अफवाह
धू-धूकर जल उठा बेनीपट्टी थाना और पोस्ट ऑफिस
ब्रिटिश पुलिस गणेश चन्द्र झा के रुख से परिचित थी।
उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
लेकिन वे अधिक दिनों तक जेल में नहीं रहे।
10 अगस्त 1942 को दिन में करीब 11 बजे उन्होंने जेल का फाटक तोड़ा और 88 बंदियों को मुक्त कराते हुए स्वयं भी जेल से फरार हो गए।
इसके बाद वे भूमिगत हो गए और मधुबनी थाना व कचहरी पर तिरंगा फहराने की योजना बनाने लगे।
पुलिस उन्हें भूखे शेर की तरह खोज रही थी।
उधर गणेश चन्द्र झा के जेल से भागने की खबर गांव-गांव पहुंच गई।
लोगों में उत्साह बढ़ता गया।
लोग गीत गाने लगे—
“चलल गणेश तिरंगा लएक,
दहकैत सूरज तेज प्रताप,
अंग्रेजक छक्का छुटैत छैक,
हेतैक भारत आब आजाद…”
10 अगस्त की रात दरभंगा में संघर्ष समिति का गठन हुआ।
पुराने दरभंगा जिले के दरभंगा, समस्तीपुर, मधुबनी और मुजफ्फरपुर के सीतामढ़ी अनुमंडल को मिलाकर संघर्ष समिति बनाई गई।
कमलेश्वरी चरण सिन्हा अध्यक्ष बने।
कर्पूरी ठाकुर भी समिति के सदस्य थे।
और भोगेन्द्र झा को सचिव बनाया गया।
अगले दिन प्रदर्शन हुआ।
भोगेन्द्र झा, उनके सहपाठी कृष्ण चन्द्र चौधरी, कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी और जयप्रकाश नारायण के समर्थक राम सेवक ठाकुर, रामाशीष शुक्ल सहित दर्जनों लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया।
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पटना सचिवालय पर चली गोलियां
11 अगस्त 1942 को पटना सचिवालय भवन के सामने छात्रों ने तिरंगा फहराने का प्रयास किया।
तत्कालीन जिलाधिकारी डब्ल्यू. जी. आर्थर ने पुलिस को गोली चलाने का आदेश दिया।
पुलिस ने गोलियां चलाईं।
सात छात्र शहीद हो गए—
उमाकान्त सिन्हा,
रामानन्द सिंह,
संतोष प्रसाद झा,
देवीपद चौधरी,
राजेन्द्र सिंह,
रामगोविन्द सिंह
और जगपति कुमार।
करीब 25 लोग गंभीर रूप से घायल हुए।
डॉ. बैद्यनाथ झा अपने मेडिकल कॉलेज के साथियों के साथ यूनिवर्सिटी मैदान पहुंचे।
उनके रूममेट गोपाल शरण हक्का-बक्का दौड़ते हुए आए—
“पटना सचिवालय पर फायरिंग हो गई है। घायल लोग अस्पताल पहुंच रहे हैं। चलो, उनकी चिकित्सा में भाग लेना है।”
डॉ. बैद्यनाथ झा तुरंत अस्पताल पहुंचे।
उन्हें उम्मीद थी कि घायल छात्र आएंगे।
लेकिन सामने का दृश्य कुछ और था।
सात शहीद छात्रों की अर्थियां सामने थीं।
एक साथ सात अर्थियां निकलीं।
हर तरफ मातम था।
आंखों में आंसू थे।
लेकिन इस घटना ने आंदोलन की आग को और भड़का दिया।
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डॉक्टर ने इलाज के साथ आंदोलन का भी मोर्चा संभाला
12 अगस्त को डॉ. बैद्यनाथ झा अपने कॉलेज के साथियों और शहर के लोगों के साथ सड़क पर उतर गए।
डाक-तार व्यवस्था को बाधित किया गया।
सड़कों पर ईंट और रोड़े डालकर अंग्रेजी पुलिस के आवागमन को रोकने की कोशिश की गई।
आंदोलन को संगठित करने के लिए विभिन्न कॉलेजों से दो-दो छात्रों को लेकर स्टूडेंट काउंसिल बनाई गई।
13 अगस्त को कांग्रेस नेता सिद्धेश्वर बाबू के यहां इसकी बैठक हुई।
इसी बैठक में डॉ. बैद्यनाथ झा की मुलाकात लक्ष्मण झा उर्फ लखन जी से हुई, जो पटना कॉलेज के प्रतिनिधि थे और आगे चलकर मिथिला विश्वविद्यालय के चर्चित कुलपति बने।
उधर अंग्रेजी सरकार ने हॉस्टलों को खाली कराना शुरू कर दिया।
13 अगस्त की शाम तक कई हॉस्टल खाली हो चुके थे।
14 अगस्त को प्रिंसिपल डॉ. टी. एन. बनर्जी के आग्रह पर डॉ. बैद्यनाथ झा और उनके साथियों ने भी हॉस्टल छोड़ दिया।
रेल यातायात बंद था।
इसलिए उन्होंने रात पहलेजा घाट पर गुजारी।
सुबह नाव से गंडक नदी पार कर हाजीपुर पहुंचे।
हाजीपुर स्टेशन पर पहले से बड़ी भीड़ जमा थी।
माल गोदाम से मिट्टी के तेल के कंटेनर निकाले जा रहे थे।
आंदोलनकारी तेल प्लेटफॉर्म पर बहा रहे थे।
डॉ. बैद्यनाथ झा ने भीड़ से पूछा—
“आप लोग यह क्या कर रहे हैं?”
लोगों ने पूछा—
“आप लोग कौन हैं?”
उन्होंने जवाब दिया—
“हम पटना के छात्र हैं।”
इतना सुनते ही लोगों का व्यवहार बदल गया।
उन्होंने डॉ. बैद्यनाथ झा से आगे की रणनीति के बारे में सलाह मांगी।
इसके बाद घटनाक्रम और उग्र हो गया।
ट्रेनों को आग के हवाले कर दिया गया।
दूर तक उठती लपटें दिखाई देती रहीं।
उनके साथी के मुंह से अनायास निकला—
“यह तो फ्रेंच रिवॉल्यूशन हो गया!”
इसके बाद वे लोग बैलगाड़ी से मुजफ्फरपुर की ओर निकल गए।
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मधुबनी में भी भड़क उठी क्रांति
उधर मधुबनी का सूड़ी हाई स्कूल स्वतंत्रता आंदोलन का केंद्र बना हुआ था।
गणेश चन्द्र झा युवाओं को भूमिगत आंदोलन के गुर सिखा रहे थे।
पकड़े जाने पर झाड़ियों में छिपना, पेड़ों पर चढ़कर बचना, नदी में सांस रोककर छिपना और दुश्मन से मुकाबला करना—इन सबकी तैयारी कराई जा रही थी।
राजकुमार पूर्वे, चतुरानन मिश्र, तेज नारायण झा, श्रीमोहन झा, विश्वनाथ मल्लिक, ध्रुव कुमार दत्त सहित सैकड़ों छात्र आंदोलन के लिए तैयार हो रहे थे।
14 अगस्त को मधुबनी में करीब पांच हजार किसान, मजदूर, छात्र और बच्चे तिरंगा लेकर सूड़ी हाई स्कूल से थाना और कचहरी की ओर निकल पड़े।
नारे गूंज रहे थे—
“हमारे खून से बने हैं गोरे,
हमीं को काला बता रहे हैं।
हमीं से पैसा वसूल कर,
हमीं को जालिम सता रहे हैं।”
जुलूस में गणेश चन्द्र झा, श्रीमोहन झा, चतुरानन मिश्र, तेज नारायण झा, राजकुमार पूर्वे सहित कई क्रांतिकारी आगे चल रहे थे।
नीलम सिनेमा चौक के पास पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया।
इसके बाद गोली चली।
गणेश ठाकुर और अकलू महतो शहीद हो गए।
गणेश चन्द्र झा पर भी पुलिस ने बेरहमी से हमला किया।
लाठी और बंदूक के कुंदे से पीटा गया।
लहूलुहान गणेश चन्द्र झा जमीन पर गिर पड़े।
पुलिस उन्हें घसीटते हुए थाने ले जा रही थी।
इसी दौरान दरभंगा के एसपी सेल्सबरी मधुबनी पहुंचे और दारोगा राजबली ठाकुर को फटकार लगाकर शांत किया।
कई लोगों को गिरफ्तार कर मोतिहारी जेल भेज दिया गया।
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हरिपुर के दो बच्चों ने भी अंग्रेजों को चुनौती दी
कलुआही चौक से दक्षिण हरिपुर गांव के डीहटोल में भी पुलिस ने गोली चलाई।
इसी दौरान हरिपुर के दो बच्चों—शिव और नारायण—ने अंग्रेजी पुलिस के सामने भी भय नहीं दिखाया।
दोनों की उम्र करीब 10 से 12 वर्ष बताई जाती है।
पुलिस की गाड़ी वहां पहुंची।
शिव को गोली मार दी गई।
अपने साथी को गोली लगते देख नारायण ने जोर से आवाज लगाई—
“इंकलाब जिंदाबाद!”
उसे भी गोली मार दी गई।
आज भी कलुआही स्थित शिव नारायण क्लब उस दौर की स्मृति से जुड़ा हुआ है।
क्रांति की लपटें मधुबनी, जयनगर, खजौली, बेनीपट्टी, हरलाखी, लदनियां, जाले, बिरौल, फुलपरास, मधेपुर, झंझारपुर, बहेड़ा और सिंघिया तक फैलती गईं।
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गणेश चन्द्र झा के शहीद होने की अफवाह और बेनीपट्टी में विस्फोट
मधुबनी के जुलूस में गणेश ठाकुर की गोली लगने से मौत हो गई थी।
लेकिन खबर फैल गई—
“त्योंथ वाले गणेश चन्द्र झा शहीद हो गए।”
संचार के साधन सीमित थे।
अफवाह फैलती चली गई।
बेनीपट्टी में क्रांतिकारियों ने परसौनी गांव के एक स्कूल में डेरा डाला।
मधुबनी में गणेश बाबू की हत्या, गिरफ्तारियों और दरभंगा में भोगेन्द्र झा की गिरफ्तारी की खबरों ने लोगों के भीतर गुस्सा भर दिया।
बेनीपट्टी में स्वतःस्फूर्त भीड़ जुटने लगी।
परसौनी कैंप से भी लोग बेनीपट्टी पहुंचे।
और फिर—
बेनीपट्टी थाना और पोस्ट ऑफिस को आग के हवाले कर दिया गया।
अंग्रेजी शासन के खिलाफ बेनीपट्टी में यह एक बड़ा विस्फोट था।
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अंग्रेजी सिपाहियों ने जला दिया डॉ. बैद्यनाथ झा का घर
भारत छोड़ो आंदोलन की लहर में डॉ. बैद्यनाथ झा पटना से दरभंगा पहुंचे।
19 अगस्त 1942 को वे साइकिल से शाम करीब चार बजे बेनीपट्टी पहुंचे।
बेनीपट्टी थाना और डाकघर पहले ही जल चुके थे।
अब बेनीपट्टी मध्य विद्यालय के मैदान में हजारों लोग जमा थे।
सवाल था—
क्या रजिस्ट्री ऑफिस भी जला दिया जाए?
रजिस्ट्री ऑफिस में किसानों के जमीन संबंधी दस्तावेज थे।
लोगों ने कहा कि कार्यालय जलाने से किसानों का नुकसान हो सकता है।
डॉ. बैद्यनाथ झा ने सुझाव दिया—
“पहले नए दस्तावेज निकालकर उनके हकदारों को बांट दिए जाएं। उसके बाद कार्यालय जलाया जाए।”
लोग सहमत हुए।
20 अगस्त को नए दस्तावेज संबंधित लोगों को बांटे गए।
और शाम करीब पांच बजे—
बेनीपट्टी रजिस्ट्री ऑफिस में आग लगा दी गई।
इसमें डॉ. बैद्यनाथ झा के भाई यदुवीर झा की भी सक्रिय भूमिका रही।
इसके बाद डॉ. बैद्यनाथ झा सड़कों को काटने, पेड़ गिराकर यातायात रोकने और चौकीदारों की वर्दी जलाने जैसी गतिविधियों में जुटे रहे।
लेकिन अब अंग्रेजी सरकार ने दमन का चक्र तेज कर दिया था।
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27 अगस्त 1942: बेहटा में अंग्रेजों ने जला दिया क्रांतिकारी डॉक्टर का घर
अंग्रेजी प्रशासन ने प्रमुख क्रांतिकारियों की सूची तैयार कर ली थी।
बेनीपट्टी में पहले खादी भंडार जलाया गया।
फिर आया—
27 अगस्त 1942।
सुबह होते ही दर्जनों घुड़सवार अंग्रेजी पुलिस बेहटा गांव पहुंची।
उनका निशाना था—
डॉ. बैद्यनाथ झा का पुश्तैनी घर।
दालान जलाया गया।
मवेशियों का घर जलाया गया।
निवास के दूसरे फूस के घरों में भी आग लगा दी गई।
अंग्रेजी पुलिस ने घर को इस तरह जलाया कि वहां रहना मुश्किल हो गया।
कहा जाता है कि हाल के वर्षों तक उस जले हुए घर की लकड़ियां देखी जा सकती थीं।
आग की लपटें इतनी ऊंची उठ रही थीं कि करीब दो मील दूर खुटौना में छिपे डॉ. बैद्यनाथ झा भी उन्हें देख रहे थे।
कल्पना कीजिए—
एक बेटा दूर खड़ा अपने पुश्तैनी घर को जलते हुए देख रहा था।
घर में उसकी बूढ़ी मां थी।
परिवार था।
सामान था।
यादें थीं।
और सब कुछ अंग्रेजी हुकूमत की आग में जल रहा था।
लेकिन वह लौट नहीं सकता था।
क्योंकि लौटने का मतलब था—
गिरफ्तारी।
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15 वर्षीय तेज नारायण झा को 15 बेंत की सजा
घर जलाने के बाद पुलिस ने गांव में कई लोगों पर बर्बरता की।
बेहटा में बंगली नाम का एक बैसार स्थल था, जहां गांव के लोग जुटते थे।
वहां रामकृष्ण झा, रामेश्वर झा, तेज नारायण झा सहित कई लोग मौजूद थे।
पुलिस को शक हुआ कि ये लोग संगठन कर रहे हैं।
पुलिस ने बर्बरता शुरू कर दी।
15 वर्षीय तेज नारायण झा ने इसका विरोध किया।
उन्हें उनके पिता रामकृष्ण झा, रामेश्वर झा, घुट्टूर झा, सत्यनारायण झा सहित कई लोगों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया।
अंग्रेज कमिश्नर के आदेश पर तेज नारायण झा को जेल में 15 बेंत की कठोर सजा दी गई।
पूरा शरीर लहूलुहान हो गया।
इस क्रूरता के विरोध में जेल के कैदी सामूहिक अनशन पर चले गए।
यही तेज नारायण झा आगे चलकर सीपीआई के टिकट पर बेनीपट्टी विधानसभा से 1962, 1967, 1972 और 1977 में विधायक बने और मंत्री भी रहे।
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घर जला, परिवार उजड़ा… फिर शुरू हुआ पलायन
डॉ. बैद्यनाथ झा का घर जल चुका था।
परिवार के पास न रहने के लिए घर था, न खाने का पर्याप्त सामान।
परिवार में करीब 20 लोग थे।
बूढ़ी मां भी साथ थीं।
इलाके के गणमान्य लोगों और संबंधियों ने पुलिस से बचते-बचाते परिवार के सदस्यों को खुटौना पहुंचाया।
वहां से परिवार मधवापुर होते हुए नेपाल के जलेश्वर पहुंचा।
लेकिन जलेश्वर भी शरणार्थियों से भरा था।
एक भी घर खाली नहीं मिला।
परिवार को पांच दिन और पांच रात एक पोखर के भिंडे पर गुजारने पड़े।
बाद में एक वरिष्ठ नेपाली अधिकारी के परिवार की पोती की सफल चिकित्सा करने के बाद डॉ. बैद्यनाथ झा को जलेश्वर से उत्तर रतवारा गांव की एक सरकारी धर्मशाला में परिवार सहित रहने की व्यवस्था मिल गई।
कुछ समय बाद जब खबर मिली कि परिवार बेनीपट्टी लौट सकता है, तो परिवार के लोगों को वापस भेज दिया गया।
लेकिन डॉ. बैद्यनाथ झा स्वयं भूमिगत जीवन में थे।
वे अपने भाई यदुवीर झा और रत्नकांत झा आदि के साथ अलवर की ओर निकल पड़े।
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भूमिगत जीवन: बेनीपट्टी से अलवर, दिल्ली और फिर नेपाल
अलवर में उनके ससुराल पक्ष के रिश्तेदार रामभद्र झा रहते थे।
वे विशिष्ट विद्वान और प्रभावशाली व्यक्ति थे तथा राजदरबार में भी उनकी अच्छी पहुंच थी।
डॉ. बैद्यनाथ झा सुरसंड, पुपरी और औराई होते हुए मुजफ्फरपुर पहुंचे।
वहां उनके साले महेश्वर झा ने साथ दिया।
फिर वे लोग पटना होते हुए अलवर पहुंचे।
लेकिन परिवार एक साथ चार लोगों को रखने में भयभीत था।
इसलिए दिल्ली की एक धर्मशाला में रहने की व्यवस्था कराई गई।
दिल्ली में कुछ दिन रहने के बाद उन्होंने दो-दो लोगों के समूह बनाए।
रत्नकांत झा और डॉ. बैद्यनाथ झा के भाई जनकपुर की ओर चले गए।
डॉ. बैद्यनाथ झा अपने साले महेश्वर झा के साथ मुजफ्फरपुर लौटे।
फिर मुजफ्फरपुर से दरभंगा होते हुए सहरसा जिले के पड़री गांव पहुंचे।
यह डॉ. बैद्यनाथ झा का ससुराल था।
यहां भी पहचान छिपाने के लिए उन्होंने बताया—
“मुझे सहरसा में बनने वाले हवाई अड्डे का डॉक्टर नियुक्त किया गया है। जल्द ही वहां सेना की छावनी बनने वाली है।”
आम लोगों को तो विश्वास हो गया।
लेकिन वहां मौजूद एक व्यक्ति को शक हुआ।
वे थे—
सूर्य नारायण झा।
वे स्वयं 1930 के क्रांतिकारी आंदोलन में भाग ले चुके थे।
एक दिन उन्होंने डॉ. बैद्यनाथ झा को एकांत में बुलाया और पूछा—
“क्या आप भी आंदोलन में शामिल रहे हैं?”
डॉ. बैद्यनाथ झा समझ गए कि सामने वाला व्यक्ति अपना ही है।
उन्होंने पूरी कहानी बता दी।
इसके बाद सूर्य नारायण झा उन्हें करिहो के महंत के पास ले गए।
वह महंत रामपट्टी, मधुबनी के भी महंत थे और आंदोलनकारियों को गुप्त रूप से शरण देते थे।
वहां से डॉ. बैद्यनाथ झा को नेपाल के सप्तरी जिले के कोईलारी गांव ले जाया गया।
यहीं उनकी मुलाकात हुई—
सूरज नारायण सिंह से।
वे हजारीबाग जेल से फरार होकर भूमिगत रूप से आंदोलन की गतिविधियां चला रहे थे।
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एक डॉक्टर… जिसने देश के लिए अपना घर तक गंवा दिया
डॉ. बैद्यनाथ झा की कहानी सिर्फ एक डॉक्टर के स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने की कहानी नहीं है।
यह उस दौर की कहानी है जब बेनीपट्टी के गांवों में बैठे युवा अपने सामने दो रास्ते देखते थे—
एक तरफ सुरक्षित भविष्य।
दूसरी तरफ आजादी की लड़ाई।
डॉ. बैद्यनाथ झा ने दूसरा रास्ता चुना।
उन्होंने मेडिकल कॉलेज की पढ़ाई की।
डॉक्टर बने।
लेकिन जब देश को जरूरत पड़ी तो मरीजों का इलाज करने वाला यह डॉक्टर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलनकारी बन गया।
पटना सचिवालय के शहीद छात्रों की अर्थियां देखीं।
सड़कों पर आंदोलन किया।
हाजीपुर में क्रांतिकारी भीड़ के बीच पहुंचे।
बेनीपट्टी आए।
रजिस्ट्री ऑफिस जलाने से पहले किसानों के दस्तावेज बचाने की चिंता की।
और फिर अंग्रेजों ने उनका घर जला दिया।
परिवार को नेपाल भागना पड़ा।
खुद महीनों भूमिगत रहना पड़ा।
फिर भी संघर्ष जारी रहा।
घर राख हो गया, लेकिन संकल्प नहीं।
सामान जल गया, लेकिन सपना नहीं।
गांव छूट गया, लेकिन देश नहीं।
और यही वह दौर था, जिसने बेनीपट्टी की मिट्टी से निकले इन युवाओं को इतिहास में दर्ज कर दिया।
भोगेन्द्र झा…
गणेश चन्द्र झा…
श्रीमोहन झा…
तेज नारायण झा…
राजकुमार पूर्वे…
और डॉ. बैद्यनाथ झा…
ये केवल अलग-अलग नाम नहीं थे।
ये बेनीपट्टी की उस पीढ़ी का नाम थे, जिसने अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी।
कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।
अगली कड़ी में जानेंगे—भूमिगत जीवन के बाद डॉ. बैद्यनाथ झा और उनके साथियों ने आंदोलन को कैसे आगे बढ़ाया, नेपाल की धरती से क्या गतिविधियां चलीं और आजादी के बाद इन क्रांतिकारियों का जीवन किस दिशा में गया।
यहीं से भोगेन्द्र झा के जीवन की वह राजनीतिक यात्रा शुरू होती है, जिसने आगे चलकर जमींदारों को चुनौती दी, किसान आंदोलन को धार दी, जेल और यातनाएं झेलीं और अंततः उन्हें संसद तक पहुंचाया।
जिस लड़के को समाज ने कभी ‘कुल-कलंकी’ कहा था…
जिसे रसगुल्ले के नाम पर समाज से बाहर कर दिया गया था…
जिसने गांधीजी के सामने भी सवाल पूछने से परहेज नहीं किया…
वही आगे चलकर ‘भोगी भगवान’ कैसे बना?
जमींदारों के खिलाफ उसकी लड़ाई कितनी खतरनाक हुई?
अंधरी के महंत को उससे डर क्यों लगने लगा?
और आखिर वह कौन-सा दौर था, जब भोगेन्द्र झा को मृत समझकर फेंक दिया गया था?
यह कहानी अभी बहुत बाकी है…
अगर आपको अपनी मिट्टी के इन भूले-बिसरे नायकों की कहानी महत्वपूर्ण लगती है, तो अपनी प्रतिक्रिया कमेंट में जरूर लिखिए।
क्योंकि इतिहास केवल दिल्ली, पटना और बड़े नेताओं का नहीं होता।
इतिहास उन गांवों का भी होता है, जहां से निकलकर कुछ लोग अपनी पूरी जिंदगी देश के नाम कर देते हैं।
बेनीपट्टी के इन बागी सपूतों की कहानी अभी बाकी है…
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यह तमाम जानकारी सहित बेनीपट्टी से जुड़ी इतिहास से लेकर वर्तमान तक की तमाम जानकारी मैंने अपनी पुस्तक 'बेनीपट्टी 0 KM' में संकलित की हुई है, इच्छुक व्यक्ति पुस्तक भी प्राप्त कर सकते हैं।