Public App Logo
Profile Picture

BNN News Benipatti

@bnn.benipatti
1111Followers
2Following
श्रावणी मेले में कांवरियों की सेवा में जुटा ठाकुर स्वर्णकार संघ, रहिका में लगाया निःशुल्क सेवा शिविर
बेनीपट्टी के स्वयंसेवकों ने की कलुआही में कांवर यात्रियों की सेवा, रात तक चलता रहा शिविर
Video 2
रौशन यादव मामले में जन सुराज के नेता मंगेश झा ने राजद को लिया निशाने पर <nis:link nis:type=tag nis:id=jansuraaj nis:value=JanSuraaj nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=madhubani nis:value=Madhubani nis:enabled=true nis:link/>
- क्या वाकई में भोगेन्द्र झा के सिर में बंदर की खोपड़ी लगी थी?

- जब भोगेन्द्र झा से रक्षा के लिए जनेऊ लेकर गांव में घूमे महंथ

- जब बौकू महतो ने भूखे भोगेन्द्र झा से कहा - ‘कामरेड अहाँ खाउ, आब गोहि मरै कि मुसहर... देख लेबै हमे सब’

- जब भोगेन्द्र झा की हत्या के लिए 100–150 हथियारबंद लोग पहुंच गए!

- भोगेन्द्र झा को बचाने वाला 3–4 साल का वह बच्चा आखिर कौन था?

- कम्युनिस्ट नेता भोगेन्द्र झा की मदद करने अस्पताल पहुंचे सोशलिस्ट नेता डॉ. बैद्यनाथ झा

- जब मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिंह ने संदेश भेजा.... ‘भाई भोगेन्द्र... मैं आ रहा हूं, बात करूंगा, तब तक अपना हाथ पैर समेट कर रहिए’

---------------------------------------------------

बेनीपट्टी की मिट्टी ने कई ऐसे किरदार पैदा किए, जिनकी कहानियां इतिहास के बड़े पन्नों में भले दब गईं, लेकिन गांवों की स्मृतियों में आज भी जिंदा हैं।

एक सिर पर बंदर की खोपड़ी… एक महंथ के हाथ में जनेऊ… मदद के लिए पहुंचा विरोधी विचारधारा का नेता… और कौन था वह 3–4 साल का बच्चा! आखिर क्या है भोगेन्द्र झा की इस कहानी का सच? जानते हैं इस कड़ी में...

----------------------------------------------------

भारत छोड़ों आंदोलन के बाद पनपा आक्रोश नियंत्रण में था, लेकिन आज़ादी की लड़ाई के साथ जमींदारी उन्मूलन का संघर्ष अंजाम की तरफ अग्रसर था। 1946 में कम्युनिस्टों ने जोरदार तरीके से भूमि–संघर्ष किया। अब तक कांग्रेस व सीपीआई की राहें अलग हो चुकी थी। कम्युनिस्टों के लिए जमीन पर चढ़ना, केवल नारा देने तक सीमित नहीं था, बल्कि चढ़ने का मतलब खेतिहर मजदूर गरीबों के द्वारा कब्जा करना था। यह लड़ाई 1946 में काफी उग्र हो गई। भारत छोड़ो आंदोलन के क्रम में दरभंगा से गिरफ्तार हुए भोगेन्द्र झा जेल से बाहर आ चुके थे। बेनीपट्टी प्रखंड के दामोदरपुर गांव से सटे अंधरी गांव में महंथाना था। महंथ आम तौर पर भूमिहार जाति के होते थे, लेकिन अंधरी महंथ ब्राह्मण थे। मूल रूप से सतलखा गांव के थे और वह परंपरागत रूप से महंथ बनने के बाद ‘झा’ से ‘दास’ बन गये थे। 1945 में हरभजन दास के बाद महंथी रामवेद दास को मिला। उनका मूल नाम वेदानंद झा था जो कि पहले से इस क्षेत्र से परिचित थे।

बात दिसंबर 1946 की है, सीपीआई कांग्रेस से अलग हो चुकी थी। अंधरी गांव के बौकू महतो, भोगेन्द्र झा के पास पहुंचे और बताया कि हमारी जोती हुई जमीन अंधरी के महंथ ने छीन ली है। गिरधारी महतो नाम के बुजुर्ग किसान की शिकायत थी कि महंथ जी रुपया में 26 सेर दूध लेते हैं और अगल–बगल में भाव 1 रुपया में 14–15 सेर है, कुछ कीजिये।

अंधरी महंथ व भोगेन्द्र झा के अच्छे संबंध थे। दोनों का आपस में कोई विद्वेष नहीं था, महंथ भोगेन्द्र झा की काफी इज्जत करते थे। 1942 में जब भोगेन्द्र झा जेल में थे तो उनके विद्यार्थी साथियों के जत्थे को महंथ हरभजन दास ने अपने यहां ठहरने का प्रबंध किया, भोजन कराया। जिसके कारण महंथ और उनके मैनेजर गिरफ्तार भी हुए थे।

अंधरी के बौकू महतो व गिरधारी महतो की बात सुन भोगेन्द्र झा जुलूस के साथ अंधरी पहुंचे, महंथ को बुलाया। महंथ व भोगेन्द्र झा एक दूसरे से परिचित थे। ऐसे में उस दिन जो जो भोगेन्द्र झा कहते,—महंथ मानते गये। जैसे कि जमीन वापस कर दीजिए, उन्होंने माना। गिरधारी महतो की शिकायत पर भोगेन्द्र झा ने कहा- ऐसा क्यों करते हैं ?

महंथ ने जबाब दिया- मेरे पोखरे में पानी पीता है, मेरे ही खेत में इसकी भैंस घास चरती है, मैं कौन कम कीमत देता हूं ? मैं तो ज्यादा देता हूं। और जगह तो महंथ जमींदार कुछ नहीं देते हैं।

भोगेन्द्र झा को यह जवाब रास नहीं आया। उन्होंने वहीं नारा दे दिया। बोले- ठीक है, ना हम आपका पोखरा रहने देंगे, ना जमीन रहने देंगे, तो दूध का भाव तय हो जायेगा।

टकराव की शुरुआत यहीं से हुई। उस समय गांव में ब्राह्मण दो–चार घर ही थे, अधिसंख्य खतबे, मलाह, मुसलमान, जोलहा, कुर्मी, दुसाध, रंगरेज, धुनियां, यादव, सूड़ी थे। इधर भोगेन्द्र झा के नेतृत्व में हुजूम बनाकर महंथ की जमीन पर चढ़ाई की कोशिश हुई, भोगेन्द्र झा के साथ जितने लोग थे, उस समय सभी बचने के लिए इधर–उधर बिखर गये। भोगेन्द्र झा अकेले पड़ गये। भिड़ंत के बीच पास में 3–4 साल का एक नन्हा बच्चा रो रहा था, भोगेन्द्र झा ने बच्चे को कंधे पर ले लिया। वह गड़ांसा–भाले को देखकर इतना घबड़ा गया कि बंदर के बच्चे की तरह उसने भोगेन्द्र झा की गर्दन पकड़ ली। नागा बाबाजी लोग महंथ की हसेड़ी में काफी संख्या में थे। नागा हाथ से बच्चे को खींचने की कोशिश करता रहा, लेकिन बच्चे ने गर्दन नहीं छोड़ी। लाठी डंडों के सामने गड़ांसा–भाले की लड़ाई में सारे मर्द असहाय होकर भाग चुके थे।—इतने में औरतों ने मर्दों को गाली देते हुए—घरों से खपड़ी, घड़ा, मिट्टी फेंकना शुरू किया। हमलावर वापस चले गए। बाद में मालूम हुआ कि वह बच्चा महंथ के मैनेजर का पोता था। इसी वजह से उस दिन भोगेन्द्र झा की जान बच गई।

बाद में जो कुछ गांव के प्रमुख लोग थे, बौकू महतो सहित और लोग, उन लोगों ने भोगेन्द्र झा से हाथ जोड़ कर कहा कि हमारे गांव की किस्मत में यही लिखा है, आपको हम लोग बचा नहीं सकते, आप चले जाइए, कुछ हो जाएगा, मार देंगे तो कलंक लग जाएगा। तब तक राजकुमार पूर्वे भी पहुंच गये, उन्होंने भी गांव वालों की हां में हां मिलाई और बोले- महंथ 50 एकड़ दे रहा हेे, तो उसी को ले लीजिये, 5–5 कट्ठा 200 परिवार में बांट दीजिए, फिर बाद में देखा जाएगा। क्योंकि आप मारे जाएंगे तो फिर पार्टी का जिला में अस्तित्व खत्म हो जाएगा। इतने में गुस्से में भोगेन्द्र झा ने राजकुमार पूर्वे से कहा- दूसरे लोग भी भागे हैं, आप भी भाग जाइए। यहां से मैं या तो जीतकर जाऊंगा या मरकर जाऊंगा।

रात में भोगेन्द्र झा बौकू महतो के आंगन में खाना खाने बैठे, 10 परिवारों का एक आंगन था। भोगेन्द्र झा के कहने पर 20–25 औरतें आ गर्इं। भोगेन्द्र झा के आंखों से ओट होकर सभी बैठी। भोगेन्द्र झा ने उन महिलाओं से उस गांव के कुछ पुराने दास्तान, संस्मरण सुनाया। कैसे अमुक औरत की साड़ी खींची गई, कैसे अमुक को मारा गया, कैसे जुर्म हुआ। उन्होंने कहा पिछले कुछ दिनों में एक बुजुर्ग मरे हैं, आप लोगों में से कोई अमर नहीं है और मुझे बुलाया गया है तो मैं आया हूं सब अत्याचार समाप्त करने के लिए। आपके सभी मर्द आज भाग गये तो ऐसी हालत में मैं भाग नहीं जाऊंगा। ये मुझे कहने गये हैं कि आप हट जाइये, तो मैं हटूंगा नहीं। हो सकता है कल मर जाऊं। जब कल मर ही जाऊंगा तो आज खाने में क्या रखा है। इसलिए मै आज़ खाना नहीं खाऊंगा।

इतने में बौकू महतो की पत्नी मैथिली में बोली-‘कामरेड आहाँ खाउ, काल्हि हम सभ हथियार लेबै, मरदाबा सभ चूड़ी पहिरतै।’ इतने में दर्जनों युवतियां भी आंगन में आ गई, युवतियों ने भी कहा- ‘हमहूं चलब अहाँ सब संग’। सबों ने कहा कि आप खाइए खाना, कल हमलोग हथियार उठा लेंगे। तब बौकू महतो ने जोश में गाली देते हुए कहा- तोरे सब खातिर हम डरा रहल छलुओ..... जखनि तू सन छे त आब हमरा की डर। आगे उसनें भोगेन्द्र झा की तरफ देखते हुए कहा- ‘कामरेड अहाँ खाउ, आब गोहि मरै कि मुसहर।’

यह सुनने के बाद भोगेन्द्र झा ने दूसरे ग्रामीणों को भी बैठाने के लिए कहा, गांव में सभी सो गये थे। उनके कहने पर बौकू महतो सभी को जगाने गये। इतने में भोगेन्द्र झा ने भोजन किया। लोग जुटे, लेकिन सभी उदास थे। दिन में महंथ पर चढ़ाई के समय सभी भाग गये थे, उस शर्म से सभी सिर झुकाए थे। भोगेन्द्र झा ने सभी को जागृत करने का प्रयास किया और जैसे ही उन्होंने अपनी बात खत्म की। पहले व्यक्ति पल्टू यादव ने शपथ लेते हुए कहा-‘काल्हि जे भागए से अपन बेटीक मूत पीअए।’ बारी–बारी से लोग कसम लेने लगे। सुबह में फिर दूसरा नजारा था। सैकड़ों लोग हथियारों के साथ जोश–खरोश में तैयार थे। सुबह में पल्टू यादव, जिसकी घराड़ी जबर्दस्ती महंथ ने ले ली थी, चढ़ गये। महंथ या पुलिस वाले कुछ नहीं कर सके।

इस तरह से 3–4 बार महंथ की जमीन पर चढ़ाई हुई, धीरे–धीरे जमीनों पर कब्ज़ा होना शुरू हुआ। इसी क्रम में एक दिन गांव में जुलूस निकला तो जुलूस पर महंथ के लठैतों ने हमला बोल दिया। जुलूस तितर–बितर हो गया। बरहा गांव के रामेश्वर झा और घूरन झा के साथ राज कुमार पूर्वे को महंथ के लठैत घसीट कर महंथ के पास ले गये। नसीहत देकर बाद में छोड़ दिया गया।

इस जमीन की लड़ाई में महंथ की तरफ से रायबहादुर सुशील कुमार राय और 3–4 वकील थे। महंथ का महंथाना 700 एकड़ का था। जिसमें 75 एकड़ जमीन ऐसी थी, जिससे महंथ ने किसानों को बेदखल कर दिया था, लेकिन कागज पर कानूनन नीलाम नहीं करा सके थे। इसलिए 75 एकड़ को उन्होंने किसानों का मान लिया, अब बाकी 625 एकड़ पर उन्होंने अपना दावा कर दिया।

भोगेन्द्र झा ने उनसे मांग रखी कि पहले यह 75 एकड़ की डिग्री दे दीजिए। महंथ का कहना था कि 75 एकड़ की डिग्री दे देंगे, लेकिन बांकी बचे 625 एकड़ जमीन पर कोई विवाद ना हो। भोगेन्द्र झा का कहना था-—बाकी तो विवाद रहा, माने जप्त हो गया। भोगेन्द्र झा के जिद के आगे महंथ अपनी महंथाना वाली जमीन पर लगी धान की एक छंटाक नहीं काट सके।

भोगेन्द्र झा की हत्या की योजना इसके बाद से बनने लगी थी। रायबहादुर सुशील कुमार राय, एक रईस बंगाली, मधुबनी के वरिष्ठतम और अंधरी महंथाना के पुस्तैनी अधिवक्ता थे। भोगेन्द्र झा की हत्या के षड्यंत्र को रोकने में विफल होने पर उन्होंने यह कह कर त्यागपत्र दे दिया कि इस युवक का जीवन मेरी वकालत और आपकी जमींदारी से ज्यादा कीमती है। और यह भी नहीं है कि सभी अधिकारी भोगेन्द्र झा की हत्या के पक्ष में थे, क्योंकि एक दिन भोगेन्द्र झा बेनीपट्टी में ठहर गये, शाम हो गई थी। सिद्धेश्वर प्रसाद, मधुबनी के एक पुलिस इंस्पेक्टर थे, उन्होंने भोगेन्द्र झा से बातचीत करते–करते बहुत देर कर दी। रात के 9–10 बजे रहे होंगे, नबंबर का महीना था। देर हो गई तो उन्होंने कहा कि अब अंधेरे में मत जाइये, आपकी जान पर खतरा है, यहीं रह जाइए।

भोगेन्द्र झा ने कहा- मैं तो जाऊंगा ही।

जब वे अड़ गये तो इंस्पेक्टर ने कहा- ठीक है। आप यहीं बैठिये, मैं आता हूं, यह कहते हुए इंस्पेक्टर उठ गये।

उसी थाने का थानेदार थे श्रीकृष्ण सिंह, जो भोगेन्द्र झा की हत्या की योजना में शामिल थे। इतने में थानेदार कई बार उनके पास आता और पूछता- कब जाएंगे अंधरी ?

भोगेन्द्र झा कहते थोड़ी देर में––—जब देर हो गयी तो भोगेन्द्र झा ने हवलदार से पूछा कि कब आयेंगे इंस्पेक्टर साहब ?—मुझे देर हो रही है।

जवाब मिला- वो अब नहीं आयेंगे, कल ही आएंगे।

यह सुन भोगेन्द्र झा ने कहा- तो मैं जाता हूं।

हवलदार ने कहा- आप गिरफ्तार हैं, आप नहीं जा सकते।

हवलदार ने उन्हें जबर्दस्ती गिरफ्तार कर लिया और सुबह होते ही छोड़ भी दिया। तब मालूम चला कि भोगेन्द्र झा बचाने ही के लिए गिरफ्तार किया गया था, ताकि रात में वह अंधरी नहीं जाएं। उनकी हत्या को लेकर बन रही योजना की बातें हवा में पहले से आ रही थी।

अब तक महंथ को इस बात की भनक लग गई थी कि जमीन पर कभी भी चढ़ाई हो सकती है, ऐसे में महंथ ने नागा बाबाओं के जत्थों को को खबर कर अंधरी बुला लिया। दरअसल महंथ अपने महंथाना क्षेत्र से गुजरने वाले नागा साधुओं की खूब आवोभगत सेवा सत्कार करते थे। उनमें धार्मिक उन्माद को जगाया गया था कि अंधरी नागा लोगों का अड्डा है, स्थान खत्म हो जाएगा तो फिर उनका एक खूंटा खत्म हो जाएगा। महंथ को इस बात का एहसास हो गया था कि यह आंदोलन उनके अस्तित्व को ख़त्म करने की शुरुआत कर चुकी है। छिटपुट झगड़े, शिकार, फसल–लूटबाजी आदि आम बात थी।

ऐसा होते–होते जब बहुत ज्यादा होने लगा तो महंथ दामोदरपुर गांव पहुंचे, आहपुर–दामोदरपुर के सभी चारों टोले में जनेऊ हाथ में लेकर हाथ जोड़ते हुए लोगों के दालान–दरबज्जा पर घुमने लगे। बोले- हमेशा से इस गांव ने हमारी रक्षा की है, वे लोग हमें उखाड़ना चाह रहे हैं, आप लोग मेरी मदद कीजिये। अगर ऐसा ही चलता रहा तो मैं यहां से चला जाऊंगा। जब महंथाना का संपत्ति ही नही रहेगी, उपर से मार–दंगा, फिर क्यों रहना यहां। रुंधे गले से निकले महंथ के स्वर ने दामोदरपुर गांव के लोगों को उद्देलित कर दिया। महंत को सदमे में देख पूरे गांव ने उनकी मदद करने का फैसला किया। गांव वाले बोलने लगे- ‘अंधरी आब अन्हेर क’ रहलैए, बहुत गलत क’ रहलैए! अरे धर्मे–कर्म पर त’ ई संसार टिकल छै। ई महंथाना हमर सभक क्षेत्रक गुमान छी!’ आदि–आदि। अब तो आर पार की लड़ाई हो गई—

# अंधरी में मरकर जिंदा हुए भोगेन्द्र झा!

भोगेन्द्र झा 3 जनवरी की शाम को मधुबनी से अंधरी गांव जाने वाले थे, लेकिन महंथ के वकील रहे रायबहादुर सुशील कुमार राय, जिन्हें भोगेन्द्र झा सुशील बाबू कहते थे। वह मधुबनी में रहते थे और ठीक 9 बजे सोने के आदी थे, लेकिन उन्होंने भोगेन्द्र झा को 1 बजे रात तक बातचीत में लगाये रखा। इस मंशा से कि भोगेन्द्र झा शाम को ही अंधरी जाने के लिए तैयार थे, उन्हें कैसे भी रोका जाय, इन्हें नींद लग जाएगी तो सो जायेंगे। लेकिन भोगेन्द्र झा पर तो अलग ही धुन सवार थी।

4 जनवरी 1947 की सुबह भोगेन्द्र झा मधुबनी से साईकिल से निकले। सूड़ी स्कूल के छात्रावास से छात्र नेता कामरेड राजकुमार पूर्वे को बुलाकर बोले- शायद यह जिंदगी की आखिरी भेंट हो। राजकुमार पूर्वे ने नाश्ता का आग्रह किया लेकिन वे नहीं रूके। उसी साईकिल से अंधरी पहुंच गये। अभी पहुंचे ही थे कि बौकू महतो की पत्नी ने कहा-—कामरेड खेने त नय हेब ? चूड़ा ध’ दय छिये पइन में फूलय लेल!—भोगेन्द्र झा बोले- हाँ, भुखले छी।

पहले भोगेन्द्र झा अंधरी की तरफ जाते थे तो कैंप पर पुलिस पार्टी के लोग इज्जत में खड़े हो जाते थे, बात करते थे। उस दिन सब तैयारी कर रहे थे कोई उनसे बात नहीं कर रहा था। अंधरी गांव के पूरब एक तालाब था और उसके चारों ओर एक जगह थी। मालूम हुआ कि हंसेड़ी आ रहा है भोगेन्द्र झा की हत्या करने के लिए। इतने में हथियारबंद लोग आते हुए दिखे। तब तक भोगेन्द्र झा के कुछ कामरेड साथी कटैया गांव के श्रीमोहन झा, माझी साह पहुंचे। ये लोग भोगेन्द्र झा को पकड़कर पीछे करना चाहे। भोगेन्द्र झा से 20–25 गज सामने 100–150 लोग हथियारबंद गंड़ासे के साथ, सैनिकों और नागाओं का समूह और उनके साथ पूरा दामोदरपुर, 22 राइफलधारी, बाकी सभी भाला वगैरह से लैस हसेड़ी आगे की तरफ बढ़ रही थी।

20–30 गज पीछे गरीबों की बस्ती थी। भोगेन्द्र झा के साथ पीछे कुछ औरत–मर्द थे। रोकने वाले भी 2–4 ही थे, वहीं दूसरी तरफ हमलावर की हसेड़ी बढ़ते ही जा रही थी। हरिदेव ठाकुर, बगल के दामोदरपुर गांव के किसान थे, जिनकी जमीन पोखरौनी महंथ से लड़कर भोगेन्द्र झा के कारण ही हासिल हुई थी, ऐसे में वह एहसानमंद थे। हालांकि उनका भतीजा उसी में सिपाही था। उन्होंने भोगेन्द्र झा का पैर पकड़कर रोकने की कोशिश की और बोले कि पीछे हो जाइए अब बचना संभव नहीं है, ये लोग कब्ज़ा रोकने नहीं, आपकी हत्या करने आ रहे हैं। यह सुन भोगेन्द्र झा बोले-—मैं दूसरों को कहता हूं तैयार होने के लिए और मैं खुद हट जाऊं ?

यह कहते हुए उन्होंने पैर झाड़ दिया, छोड़िये पैर। हरिदेव ठाकुर के नाक में चोट लग गयी, खून गिरने लंगा। वह हाथ से नाक झांपे अपने गांव भाग गये, ताकि महंथ का आदमी खून बहते हुए नहीं देख लें और आक्रोशित होकर भोगेन्द्र झा पर हमला न कर दे। एक तरफ भोगी झा के नेतृत्व में अंधरी गांव का जनसमूह दूसरी तरफ महंथ के सिपाही, नागा बाबाओं का जत्था और दामोदरपुर गांव।

अंधरी तरफ से नारेबाजी शुरू हुई-

खटतै कोइ, खयतै कोइ, नै चलतै..... नै चलतै!

हर जोर–जुलुम के टक्कर में, संघर्ष हमारा नारा है!

अब सभे भूमि गोपाल के, तखन किए महंथान के!

आने–माने नै जानै छी, हम जोतइ छी, हक माँगै छी!

दुनिया के मजदूरों, एक हो, एक हो!

भोगेन्द्र झा वहीं धरने पर बैठ गये। इतने में महंथ के हमलावरों ने उन पर लाठी, फरसा, गंड़ासे से एक साथ हमला कर दिया।—लाठी सिर पर लगा, गंड़ासे को उन्होंने रोकने की कोशिश की। गंड़ासा उनके हाथ पर लगते हुए हाथ को दो भाग में चीर दिया। खून की धारा पानी की तरह बहने लगी। बाएं हाथ की दो अंगुली एक तरफ, तीन अंगुली एक तरफ लटक गई।

खून से सने हुए भोगेन्द्र झा बेसुध होकर गिर पड़े। गिरने के बाद भी हमलावरों का बड़ा गुट उन पर ताबड़तोड़ वार करता रहा। बाकी भोगेन्द्र झा के पीछे खड़े अंधरी के महिला पुरुषों पर हमला करने लगे। अंधरी वालों के पास अधिक लाठियां थी ऐसे में फरसा, गंड़ासे के सामने खून की धारा तेज हो गई। भोगेन्द्र झा जहां गिरे वहां खून से जमीन की मिट्टी लाल हो गई। फिर भी हमला जारी था। भोगेन्द्र झा को बचाने के लिए संत खतबे ने मोर्चा संभाला। भोगेन्द्र झा पर हो रहे हमले को अपने उपर लेते हुए आगे बढ़े लेकिन फरसे की वार से वह भी मरणासन्न हो गये। इधर भोगेन्द्र झा का सिर से लेकर पैर तक कोई हिस्सा नहीं बचा, जहां फरसा और लाठी से हमला नहीं हुआ। भोगेन्द्र झा होश कर उठने को कोशिश करते, खड़े होते लेकिन फिर लुढ़क जाते। जब एक बार अधिक समय तक जमीन पर पड़े रहे तो भीड़ से आवाज आई- मरि गेले भोगेन्द्र....

भोगेन्द्र झा को यह आवाज सुनाई दी। चैंक कर वह फिर से उठने की कोशिश करने लगे इतने में उनकी सांसें चलता देख फिर से हमला हुआ। पल्टू यादव, भोगेन्द्र झा को उठाने की कोशिश कर रहे थे। महंथ के तरफ से हुजूम में चुल्हाई झा नाम के एक व्यक्ति थे। जो भोगेन्द्र झा के रिश्ते में आते थे, वह यह कहते हुए भोगेन्द्र झा के तरफ बढ़े कि... हे–हे... जानसँ नै मारहक, छोड़ि दै जाहक! मरि जेतै.... मरि जेतै।

चुल्हाई झा को भोगेन्द्र झा की तरफ आता देख पल्टू यादव उन्हें दुश्मन मान उनके गर्दन पर फरसा से वार कर दिया। फरसा गर्दन पर नहीं लगके चुल्हाई झा के कंधे पर लगी। वो जमीन पर गिरे, खून का फव्वारा निकलने लगा, जिसे देख तेजू झा ने पल्टू यादव पर लकड़ी का चेरा फेंका। जब तक पल्टू यादव प्रतिकार करते तब तक नागा बाबा ने मौका देख उसके पेट में भाला घोंप दिया। पल्टू यादव की मौत मौके पर ही हो गई।

फिर भी खून खराबा मार काट जारी था। इसी बीच महंथ के हसेड़ी में से किसी ने भोगेन्द्र झा को मरा हुआ समझ उन पर गोइठा जलावन रख आग लगाने की बात कही। मार–काट मचाने के बाद महंथ के हमलावर लौटने लगे तो कुछ ही दूरी तय हुई होगी। भोगेन्द्र झा उठते, फिर गिरते। यह सिलसिला कुछ देर तक चला, जिसे दूर से देख महंथ के लोगों ने प्राण छूटने से पहले शरीर की क्रिया बताया और चलते चले गये। अंधरी के लोग भी उन्हें मृत समझ चुके थे। इधर गांव के लोग चुल्हाई झा को उठा ले गये। वहीं अंधरी के लोग पल्टू यादव व भोगेन्द्र झा को मरा हुआ समझ उठाने आये तो किसी ने देखा उनका शरीर हिल रहा था हल्ला हुआ- भोगी बाबू जिंदा हैं, सांस चल रही है, हिल रहे हैं। जिसके बाद खून से लथपथ भोगेन्द्र झा टांगकर बेनीपट्टी अस्पताल लाये गये। कई दिनों तक आंखें नहीं खुली। सिर के उपर सैकड़ों लाठियां, गंड़ासे लगे थे। सिर की हड्डी चकनाचूर हो गई थी।

इस घटना को याद करते हुए भोगेन्द्र झा ‘क्रांति योग’ में बताते हैं 4 तारीखकेँ हमला भेलै। संज्ञाशून्य भेला बाद हल्का होश सन बुझायल कि सुनलिए- मरि गेलौ, चलै चल! कि हमरा मोनमे आयल, अरे के मरि गेलै ?

से आँखि फुजल त’ देखलिऐ लोक गराँस, लाठी, भाला संग भागल जा रहल छै! त’ ई सभ कोना भ’ गेलै! हम त’ खून–खराबा नै चाहैत रही!

हम फेर उठक चेष्टा कयलौं, मुदा नै उठल भेल! लागल जे आब शरीर माटि संग बन्हा गेल अछि! माथ टिका क जमीन पर पड़ल रही। तैयो उठबाक प्रयास करिते रहलिऐ कि माथ पर तखने दू–तीन गंड़ास फेर लागल।

तैयो साहस कैलिऐ पर खूने–खून! फेर ओंघरा गेलिऐ! फेर त’ निष्प्राण सन! आ से बड़ी काल धरि!

फेर त’ जेना ओ सभ बुझि गेलै जे भोगी झा गेलौ, काल टरलौ। फेर जानि नै कोना, हमरा प्रज्ञा घुरल! हम उठी, खसी, ओंघरा जाइ—फेर।

एना होइत देखि, जे किछु लोक तखनो अंतिम खेल देख’ चाहै, कहब शुरू क’ देलकै, आब बाइ पर एना करै छौ, आब जएह घड़ी सएह घड़ी! आब एक पाँत गोरहा लेने आबै! सलाइ त’ अछिये, एखने खरड़ि दय छिये—

तखने एकटा बूढी माई राम चिचियाइत बजलीह- कते गेलय मरदवा सभ ? महंथकेँ आदमीसँ कामरेड के लाश फूंके लेल आबय हय।

कानमे ई आवाज गूंजल त’ बेसुध देहमे चेतना जागल, ककर लाश ? होशमे एबाक कोशिश केलहुँ।

कोशिश करैत–करैत, उठिक’ ठाढ़ भ’ गेलिऐ! आब त’ सभक अन्दर आदंक ध’ लेलकै! कियो कहै भूत, त’ कियो भगवान! फेर वएह सभ भगवान छौ, भोगी भगवान छौ, अनघोल करब शुरू क’ देलकै—आ फेर हमर भक् टूटल अस्पतालमे।

भोगेन्द्र झा का इलाज बेनीपट्टी अस्पताल में होना शुरू हुआ, उन्हें देख किसी को एहसास नहीं था कि यह अब बच पाएंग। आंखें बंद थी। इशारों में बातें कर रहे थे। घटना की जानकारी आम होते ही दूर–दूर से लोग इकट्ठा होने लगे। उनके गांव बरहा, नानी गांव जरैल तक खबर पहुंची। अगल बगल के गांवों के सैकड़ों लोग बेनीपट्टी में उमड़ पड़े। सभी के मन में आक्रोश था। सभी प्रतिकार में महंथ की हत्या करने व अंधरी दामोदरपुर गांव को फूंक देने की योजना बनाने लगे।

जब भोगेन्द्र झा होश में आये तो उन्हें पल्टू यादव व संत खतबे के मौत की खबर दी गई। साथ ही इस घटना के प्रतिकार में बन रही योजना के बारे में जानकारी मिली।

भोगेन्द्र झा बोले- अगर किसी ने गांव को फूंका या किसी की हत्या हुई तो मैं सिर पटक कर, जो–भी बचने की आशा है, मर जाऊंगा। भोगेन्द्र झा की जिद के आगे सभी चुप हो गये। बेनीपट्टी में भोगेन्द्र झा तीन दिनों तक रहे, लोगों का जमावड़ा लगता रहा। हर गांव चैक चैराहों पर इसी घटना की चर्चा। और चर्चा यह भी होनी शुरू हो गई थी कि अब महंथाना अधिक दिन नहीं चलने वाली है। इसी दौरान अस्पताल में दामोदरपुर के हरिदेव ठाकुर उनकी जिज्ञासा करने पहुंचते थे। उनके जरिए भोगेन्द्र झा महंथ के लिए खबर देते कि ‘अब भी महंथ से कहिए कि जो समझौते की बात पहले चल रही थी, उसको वह मान लें, तब मैं मुकदमा ही नहीं करूंगा’।

वहीं इस घटना को लेकर नालिसी 6 तारीख, यानी तीन दिन बाद हुई। भोगेन्द्र झा ‘क्रांति योग’ में बताते हैं, जब मेरी नालिसी हुई उस समय मैं लिखने लायक नहीं था। आखें देख नहीं सकती थीं, सूजन भी आ गया था और थोड़ा सा पस भी हो गया था। सोशलिस्ट नेता डॉ बैद्यनाथ झा मेरी मदद करने पहुंचे, उन्होंनें मेरा बयान लिखा और लिखने में अपने दो–तीन दुश्मनों का भी नाम घुसेड़ दिया। दस्तखत तो मेरा हो गया। उसमें जो नाम घुसेड़ दिया उसमें एक थे रामेश्वर जी। जिंदगी में उन्होंने कभी मेरा समर्थन नहीं किया। वह मेरे पास अस्पताल पहुंच गये और मेरे पास आकर बोले- भोगेन्द्र जी, आपने मुझको खून करने वालों में देखा है ? तब तो मैं आंख से देख नहीं सकता था, आवाज से पहचाना। मेरे मुंह से गलत नाम कहलाया जायेगा, यह उलझन मेरे दिमाग में थी। आदमी ये बड़े <nis:link nis:type=tag nis:id=## nis:value=## nis:enabled=true nis:link/> थे, मगर वह उसमें थे नहीं। इसलिए मैं चाहता था और स्वभाविक भी है कि झूठ नहीं कहना पड़े। नालिसी से किसी का नाम छांट दूंगा तो केस ही कमजोर हो जायेगा, यह उलझन थी।

इस बीच उन्हें इलाज के लिए बेनीपट्टी से मधुबनी अस्पताल भेजा गया, जहां कांग्रेस मिनिस्टरी बनने के बाद पंडित विनोदानंद झा, अब्दुल कयूम अंसारी, दोनों तत्कालीन मंत्री, उन्हें देखने आये। पंडित विनोदानंद झा बाद में बिहार के मुख्यमंत्री भी बनें। उन लोगों को डॉक्टरों ने बताया कि सिर में काफी चोट है, ठीक होगा भी नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं है। ऐसे में तत्काल भोगेन्द्र झा को पटना में नामी सर्जन कर्नल भार्गव के यहां भेजा गया, जहां उनका इलाज शुरू हुआ।

इधर भोगेन्द्र झा अस्पताल में थे, उधर इस घटना के विरोध में अंधरी गांव में सभा की घोषणा उनके साथियों ने कर दी। सभा पर सरकारी रोक लगा दी गई। बावजूद सभा का आयोजन हुआ, जिसके कारण आदेश उल्लंघन के आरोप में श्रीमोहन झा, तेज नारायण झा, राजकुमार पूर्वे, माझी साह, गोकुलानंद चैधरी को गिरफ्तार कर पुलिस ने बेनीपट्टी थाना हाजत में बंद कर दिया। दूसरे दिन सभी को मधुबनी जेल भेज दिया। रास्ते में कई जगहों पर रोक कर लाल झंडों के साथ लोगों ने इन सभी को जेल जाने के क्रम में स्वागत किया। बरहा गांव के गोकुलानंद चैधरी बाद के वर्षों में रघेपुरा पंचायत के मुखिया व माझी साह मधवापुर प्रखंड के प्रमुख निर्वाचित हुए।

भोगेन्द्र झा ठीक होकर पटना से अगस्त 1947 से पहले लौटे। लेकिन कई सालों तक वह ठीक से बोल नहीं पाते थे। इशारों में ही बातें करते थे। बावजूद उनकी क्रांति मंद नहीं पड़ी थी। इस घटना के बाद ठीक होकर क्षेत्र में लौटे भोगेन्द्र झा के बारे में यह चर्चाएं आम थी कि उनके सिर में बंदर की हड्डी लगी हुई है। अक्सर भोगेन्द्र झा इस घटना को याद कर अपना सर दिखाते हुए कहते थे- ‘मेरे सिर पर हाथ रखने से धड़कन सुनाई देती है। धूप में जाने से मनाही है, सिर पर बर्फ बर्दाश्त कर सकता हूं लेकिन धूप नहीं’ जिसकी वजह से वह सोलर हैट पहना करते थे।

इस घटना ने उन्हें ‘भोगी भगवान’ के नाम से अलग पहचान दिया। ‘भोगी भगवान’ ना सिर्फ उनके चाहने वाले उन्हें कहा करते थे, बल्कि विरोधियों ने भी यह चलाया। जिसमें सबसे अधिक फैलाव बिहार के प्रधानमंत्री डॉ श्रीकृष्ण सिंह के एक कार्यक्रम से हुआ। दरअसल श्रीकृष्ण सिंह पंडौल आये हुए थे, जब व्यापक आंदोलन फैल गया था तो एक खत श्रीकृष्ण सिंह ने पंडित धनराज शर्मा के जरिए भोगेन्द्र झा को भेजा था कि भाई भोगेन्द्र... मैं आ रहा हूं, बात करूंगा, तब तक अपना हाथ पैर समेट कर रहिए।

इस बीच भोगेन्द्र झा गिरफ्तार कर लिये गये। बाद में श्रीकृष्ण सिंह पंडौल आये, वहां की रैली में भोगेन्द्र झा के स्वयंसेवक लाल पैंट, लाल शर्ट, लाल टोपी पहन गये थे, इन लोगों ने नारा लगाया- भोगेन्द्र झा को रिहा करो, जमींदारी मिटाओ, वीर भोगेन्द्र जिंदाबाद।

यह सुन श्रीकृष्ण सिंह ने डीएम से पूछा, तो डीएम ने बताया- हमनें गिरफ्तार कर लिया है।

तब श्रीकृष्ण सिंह ने सभा में मंच से कहा- भोगेन्द्र झा अपने आप को मार्क्सवाद का विद्वान कहते हैं, मगर ‘भोगी भगवान’ कहलाते हैं, अंधविश्वास फैलाते हैं।—उस रैली से ‘भोगी भगवान’ बात और फैल गयी। भोगेन्द्र झा के नेतृत्व में अंधरी गांव में हुए जमींदारी विरोधी आंदोलन का असर अभूतपूर्व हुआ, जो कि बाद के दशकों तक इसकी चिंगारी आग का रूप लेती रही। अंधरी से हुआ यह आंदोलन सलेमपुर, कटैया, धकजरी होते हुए कई गांवों तक पहुंची।

भोगेन्द्र झा की जिंदगी से जुड़े ये प्रसंग जितने रोचक हैं, उतने ही सवाल छोड़ जाते हैं। इन सवालों के जवाब बेनीपट्टी के उसी स्थानीय इतिहास में छिपे हैं, जिसे धीरे-धीरे आधुनिकता के इस युग में स्थानीय इतिहास के प्रति जिज्ञासा की कमी सहित अन्यन्य कारणों से हमारी स्मृति से दूर होता जा रहा है।

मैंने ‘बेनीपट्टी 0 KM’ पुस्तक में ऐसे ही अनेक प्रसंगों, घटनाओं, संघर्षों और बेनीपट्टी के सामाजिक-राजनीतिक इतिहास को दस्तावेज के रूप में संकलित करने का प्रयास किया है।

अगर आपको लगता है कि अपने इलाके का इतिहास जानना जरूरी है, तो इस कहानी को आगे जरूर पहुंचाइए। पोस्ट को कॉपी-पेस्ट करने के बजाय शेयर करें, ताकि यह कहानी उन लोगों तक भी पहुंचे जिन्हें अपने गांव और अपनी मिट्टी के इतिहास पर गर्व है।

आपकी प्रतिक्रिया इंतजार करेगी।👇 क्या आप अगली कड़ी पढ़ना चाहेंगे? जरुर लिखें अपनी प्रतिक्रिया...
देवपुरा के श्री प्रकाश पब्लिक स्कूल में धूमधाम से मनाया गया स्वतंत्रता दिवस
अकौर में मुखिया ने अनोखे अंदाज में मनाया स्वतंत्रता दिवस, पंचायत में प्रभात फेरी निकाल किया झंडोतोलन
Video 7
Video 8
🇮🇳 स्वतंत्रता दिवस स्पेशल ऑफर🇮🇳 
🔥 𝟏𝟓 अगस्त 𝟐𝟎𝟐𝟔 को ऑफर्स की बौछार! 🔥  
••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
🏍️ 𝐇𝐄𝐑𝐎 𝐒𝐏𝐋𝐄𝐍𝐃𝐎𝐑 𝐏𝐋𝐔𝐒 
⛽ 𝟏𝟎 लीटर पेट्रोल 𝐅𝐑𝐄𝐄 
🪖 हेलमेट 𝐅𝐑𝐄𝐄  
••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
✨ 𝐇𝐄𝐑𝐎 𝐆𝐋𝐀𝐌𝐎𝐔𝐑 𝐗 
🎁 ₹𝟑,𝟎𝟎𝟎 तक 𝐂𝐀𝐒𝐇 𝐃𝐈𝐒𝐂𝐎𝐔𝐍𝐓 या 
⛽ 𝟏𝟎 लीटर पेट्रोल + 🪖 हेलमेट 
🛡️ छोटा एवं बड़ा दोनों लेग गार्ड 
💺 सीट कवर 
✋ ग्रिप कवर सब 𝐅𝐑𝐄𝐄!  
••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
🛵 चुनिंदा 𝐇𝐄𝐑𝐎 स्कूटर 
💰 ₹𝟑,𝟎𝟎𝟎 तक 𝐂𝐀𝐒𝐇 𝐃𝐈𝐒𝐂𝐎𝐔𝐍𝐓 या 
⛽ फुल टंकी पेट्रोल 𝐅𝐑𝐄𝐄 
➕ फ्रेम 𝐅𝐑𝐄𝐄  
••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
🇮🇳 इस स्वतंत्रता दिवस अपनी पसंदीदा 𝐇𝐞𝐫𝐨 लेकर जाएं और पाएं शानदार फायदे!  
••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
📍 श्री बालाजी हीरो, बेनीपट्टी 
📞 𝟗𝟐𝟑𝟒𝟓𝟐𝟒𝟓𝟎𝟕  
••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
📍 श्री बालाजी हीरो, सरिसब, बेनीपट्टी 
(जगदम्बा पेट्रोल पंप के पास) 
📞 𝟗𝟐𝟑𝟏𝟒𝟎𝟑𝟔𝟕𝟏  
••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••••
⚡𝐒𝐩𝐥𝐞𝐧𝐝𝐨𝐫 𝐏𝐥𝐮𝐬 & 𝐒𝐜𝐨𝐨𝐭𝐞𝐫 पर ऑफर केवल 𝟏𝟓 अगस्त 𝟐𝟎𝟐𝟔 के लिए! *नियम एवं शर्तें लागू।
बेनीपट्टी अनुमंडल कार्यालय में SDM शारंग पाणि पांडेय व DSP कार्यालय में प्रभारी डीएसपी अंकुर कुमार ने किया झंडोतोलन 🇮🇳
आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ। 🇮🇳

बेनीपट्टी में सार्वजनिक झंडोतोलन SDM शारंग पाणि पांडेय द्वारा संपन्न हुआ
आप सभी को 80वें स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं... 

<nis:link nis:type=tag nis:id=independenceday nis:value=IndependenceDay nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=proudindian nis:value=ProudIndian nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=bnnnews nis:value=BNNNews nis:enabled=true nis:link/>
आप सभी को 80वें स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं... 

<nis:link nis:type=tag nis:id=independenceday nis:value=IndependenceDay nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=proudindian nis:value=ProudIndian nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=bnnnews nis:value=BNNNews nis:enabled=true nis:link/>
बेनीपट्टी आ रहे प्रशांत किशोर... परकौली में रौशन यादव के परिवार व नवटोली सड़क हादसे में जान गंवाने वाली महिलाओं के परिवार से करेंगे मुलाकात
आप सभी को 80वें स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं... 

<nis:link nis:type=tag nis:id=independenceday nis:value=IndependenceDay nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=proudindian nis:value=ProudIndian nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=bnnnews nis:value=BNNNews nis:enabled=true nis:link/>
बेनीपट्टी में अंश मोबाइल का स्वतंत्रता दिवस स्पेशल धमाका ऑफर... 

संपर्क करें - 
अंश मोबाइल, बेनीपट्टी
8340347736
7370078586
बेनीपट्टी के परकौली पहुंचेंगे जन सुराज के सूत्रधार व विधायक प्रशांत किशोर

रामपट्टी मंडल कारा में बंद अरेर के 19 वर्षीय युवक रौशन कुमार यादव की मौत का मामला भी इन दिनों तूल पकड़ रहा है। जेल प्रशासन ने मौत को आत्महत्या बताया है, जबकि परिजनों ने हत्या का संदेह जताते हुए शरीर पर मारपीट के निशान होने का आरोप लगाया है।

इसी बीच जन सुराज के सूत्रधार व विधायक प्रशांत किशोर का 15 अगस्त को बेनीपट्टी के परकौली गांव आगमन होने जा रहा है। ऐसे में रौशन यादव की मौत का मामला भी स्थानीय स्तर पर चर्चा का प्रमुख विषय बन गया है।

<nis:link nis:type=tag nis:id=prashantkishor nis:value=PrashantKishor nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=jansuraaj nis:value=JanSuraaj nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=benipatti nis:value=Benipatti nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=parkouli nis:value=Parkouli nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=roshanyadav nis:value=RoshanYadav nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=rampattijail nis:value=RampattiJail nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=madhubani nis:value=Madhubani nis:enabled=true nis:link/> <nis:link nis:type=tag nis:id=bnnnews nis:value=BNNNews nis:enabled=true nis:link/>
आज़ादी के जश्न के साथ Aditya Vision दे रहा है बंपर ऑफर... 

Tv, फ्रिज, वाशिंग मशीन, मोबाइल, AC समेत तमाम पर शानदार ऑफर... छूट भी
बेनीपट्टी में भाकपा की राष्ट्रीय पदयात्रा का आठवां दिन, नुक्कड़ सभा में केंद्र सरकार पर जमकर निशाना
🚨 लापता होने की सूचना — कृपया शेयर करें

मधुबनी जिले के बेनीपट्टी प्रखंड के जगत गांव से दो बच्चियां 11 अगस्त 2026 से लापता हैं। परिजनों के अनुसार दोनों को आखिरी बार मंगरौनी गांव से जगत के लिए ऑटो में बैठाया गया था, लेकिन वे अब तक घर नहीं पहुंची हैं।

1. रुबी कुमारी
- पिता: भगवानि यादव
- उम्र: 19 वर्ष
- पता: जगत गांव, वार्ड नंबर-3, प्रखंड बेनीपट्टी, जिला मधुबनी

2. रागिनी कुमारी
- पिता: अनिल यादव
- उम्र: लगभग 5 वर्ष
- पता: जगत गांव, वार्ड नंबर-3, प्रखंड बेनीपट्टी, जिला मधुबनी

परिजनों के अनुसार दोनों जगत गांव से मंगरौनी गांव अपनी दीदी के यहां गई थीं। वहां से करीब दोपहर 1 बजे दीदी ने दोनों को ऑटो से जगत गांव के लिए रवाना किया था, लेकिन दोनों अभी तक घर नहीं पहुंची हैं।

परिजन दोनों की तलाश में परेशान हैं। यदि किसी व्यक्ति को दोनों के बारे में कोई जानकारी मिले या वे कहीं दिखाई दें, तो कृपया तुरंत नीचे दिए गए नंबरों पर संपर्क करें।

📞 संपर्क नंबर:
6239522914
7226927361

🙏 कृपया इस पोस्ट को अधिक से अधिक शेयर करें, ताकि दोनों बच्चियों को जल्द से जल्द खोजकर सुरक्षित घर पहुंचाया जा सके।
लंबे अरसे बाद मधुबनी रेलवे स्टेशन के समीप जनता दल यूनाइटेड (JDU) को अपना नया जिला कार्यालय मिलने जा रहा है। निर्माणाधीन कार्यालय को अंतिम रूप देने का कार्य तेजी से जारी है। इसी क्रम में आज कार्यालय का निरीक्षण कर निर्माण कार्यों की प्रगति का जायजा लिया गया।

नया जिला कार्यालय सिर्फ संगठनात्मक गतिविधियों का केंद्र नहीं, बल्कि पार्टी कार्यकर्ताओं और आम जनता के बीच संवाद, सहयोग एवं सेवा का सशक्त माध्यम बनेगा। अब कार्यकर्ताओं को संगठनात्मक गतिविधियों के लिए इधर-उधर भटकना नहीं पड़ेगा। साथ ही, कार्यकर्ताओं की समस्याओं के साथ आम नागरिकों से जुड़े जनहित के मुद्दों के समाधान के लिए बेहतर समन्वय स्थापित होने की उम्मीद है।

नए कार्यालय को लेकर कार्यकर्ताओं में उत्साह है और इससे मधुबनी जिले में संगठन को नई मजबूती मिलने की उम्मीद है।
Video 22
बरहा के ‘बागी’ भोगेन्द्र झा से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन के नायक डॉ. बैद्यनाथ झा तक…

बेनीपट्टी की मिट्टी में पल रही थी क्रांति की एक पूरी पीढ़ी

पिछली कड़ी में आपने पढ़ा कि कैसे बरहा गांव के ‘बागी’ भोगेन्द्र झा के भीतर बचपन से ही सामाजिक असमानता, जातिगत भेदभाव, गरीबी और धार्मिक रूढ़ियों को लेकर सवाल उठने लगे थे।

लेकिन भोगेन्द्र झा की कहानी अकेली कहानी नहीं थी।

उसी दौर में बेनीपट्टी की मिट्टी में कई ऐसे युवा तैयार हो रहे थे, जिनके भीतर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ विद्रोह की आग धधक रही थी।

इन्हीं में एक नाम था — डॉ. बैद्यनाथ झा

भारत छोड़ो आंदोलन में बेनीपट्टी के इस डॉक्टर की भूमिका ऐसी रही कि अंग्रेजी हुकूमत ने उनका पुश्तैनी घर तक जला दिया।

लेकिन घर जल गया…

सामान जल गया…

परिवार को गांव छोड़ना पड़ा…

फिर भी उनका हौसला नहीं जला।

बेनीपट्टी की धरती के यह कहानी सिर्फ कम्युनिस्ट भोगेन्द्र झा ही नहीं बल्कि क्रांतिकारी डॉक्टर सोशलिस्ट डॉ बैद्यनाथ की भी है... 

कैसे रसगुल्ले के बहाने भोगेन्द्र झा ने समाज की स्थापित व्यवस्था को चुनौती दी।

कैसे मधुबनी में सुभाष चन्द्र बोस के कार्यक्रम के आयोजन की जिम्मेदारी उन्होंने संभाली।

और कैसे रामगढ़ में उनकी मुलाकात महात्मा गांधी से हुई, जहां एक किशोर भोगेन्द्र झा ने गांधीजी से भी सवाल पूछने में संकोच नहीं किया।

---

1934 में गांधीजी पहुंचे मधुबनी

15 जनवरी 1934 को नेपाल और बिहार में आए भीषण भूकंप ने भारी तबाही मचाई थी। बिहार में हजारों लोगों की जान चली गई थी।

भूकंप के बाद जब हालात धीरे-धीरे सामान्य होने लगे, तब महात्मा गांधी मधुबनी पहुंचे।

गांधीजी किसी से अपने पैर छुआने के पक्ष में नहीं थे। वे कांग्रेस के सहयोगियों के साथ मधुबनी की मुख्य सड़क पर पैदल जा रहे थे।

इसी दौरान बेनीपट्टी प्रखंड के त्योंथ गांव के गणेश चन्द्र झा उनके सामने पहुंचे।

गणेश चन्द्र झा उस समय कांग्रेस के गरम दल से जुड़े हुए थे।

उन्होंने गांधीजी के पैर छुए और हाथ जोड़कर कहा—

“बापू, हमें माफ कर दीजिए। अब हम आपके विचारों के साथ हैं। मैं अब गरम दल के साथ नहीं हूं।”

इस तरह गणेश चन्द्र झा गांधीजी के साथ हो गए।

उस समय गांधीजी अछूत उद्धार अभियान चला रहे थे। इसी क्रम में वे जगह-जगह पैदल यात्रा कर रहे थे।

मधुबनी पहुंचने पर वे अपने सहयोगियों के साथ लत्तर मेहतर के घर गए और उनके हाथों से दूध पिया।

इसके बाद सप्ता में भालसरी चौक के पास गांधीजी की सभा होनी थी।

सभा में बड़ी संख्या में लोग जुटे।

लेकिन लत्तर मेहतर के हाथों गांधीजी के दूध पीने से नाराज कुछ विरोधी उन्हें जूतों की माला पहनाने की कोशिश करते हुए सभा स्थल के पास पहुंच गए।

जब वे सफल नहीं हुए तो काले झंडे दिखाने लगे।

सभा में मौजूद लोग विरोध करने वालों के प्रतिकार के लिए आगे बढ़े और उन्हें खदेड़ने लगे।

गांधीजी ने तत्काल लोगों को रोक दिया।

उन्होंने कहा—

“वे लोग यही तो चाहते हैं कि आप हमारी बातों को नहीं सुनें। यह हमारे उद्देश्यों को भटकाने की कोशिश है। आप लोग संयम से काम लीजिए। ये लोग थक जाएंगे, चले जाएंगे।”

यह उस दौर की जटिल राजनीतिक परिस्थितियों का भी समय था।

उस समय कम्युनिस्ट पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बीच आज जैसा स्पष्ट राजनीतिक अलगाव नहीं था। कई कम्युनिस्ट कार्यकर्ता कांग्रेस के भीतर भी सक्रिय थे। आगे चलकर दोनों धाराओं के रास्ते अलग हुए।

इसी दौर में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन यानी AISF जैसे छात्र संगठनों ने भी युवाओं को राष्ट्रीय आंदोलन और राजनीतिक गतिविधियों से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

---

रसगुल्ले के कारण भोगेन्द्र झा का बहिष्कार

गांधीजी का अछूत उद्धार अभियान करीब 1940 तक चलता रहा।

इसी क्रम में वर्ष 1939 में बेनीपट्टी में मधुबनी अनुमंडल के सत्याग्रहियों का प्रशिक्षण शिविर लगा।

भोगेन्द्र झा सत्याग्रही नहीं थे, लेकिन वे भी शिविर में पहुंच गए।

शिविर के पहले दिन गांधीजी के अछूत उद्धार कार्यक्रम की शर्त के अनुसार सत्याग्रहियों को दलित समुदाय के व्यक्ति के हाथों भोजन करना था।

वहां केश्वर राम नाम के एक दुसाध शिक्षक थे। मूल रूप से बेहटा गांव के रहने वाले केश्वर राम 1937 में अंग्रेजी शासन द्वारा कराए गए विधानसभा चुनाव में निर्वाचित भी हुए थे।

शिविर में उनके हाथों लोगों ने दो-दो रसगुल्ले खाए।

शिविर समाप्त हुआ।

लेकिन इसके बाद इलाके में हंगामा मच गया।

कहा जाने लगा—

“कांग्रेसी अछूत हो गए हैं, इन्हें समाज से निकालो।”

रसगुल्ला खाने वाले कई कांग्रेसी सामाजिक बहिष्कार के डर से बात छिपाने लगे। कुछ ही लोग खुलकर खड़े हुए।

गांव के ज्योतिषी बाबा के यहां पंचायत बैठी।

भोगेन्द्र झा को भी बुलाया गया।

बाबा ने पूछा—

“तुम कुल-कलंकी हो! रसगुल्ला खाए हो या नहीं? साफ-साफ बोलो।”

असल में रसगुल्ला खाने की घटना शिविर के पहले दिन की थी और भोगेन्द्र झा दूसरे दिन शिविर में पहुंचे थे। इसलिए उन्होंने रसगुल्ला खाया ही नहीं था।

लेकिन यहां भोगेन्द्र झा ने एक अलग ही रास्ता चुना।

बिना रसगुल्ला खाए ही वे अड़ गए—

“क्यों नहीं खाऊंगा?”

बहस शुरू हो गई।

लोगों ने कहा—

“ब्राह्मण की संतान होकर रसगुल्ला खाओगे?”

भोगेन्द्र झा ने तर्क दिया—

“फलां काका की नियुक्ति टाटा, जमशेदपुर में हुई है। वहां वे लोहार का काम करने गए हैं। तो क्या वे ब्राह्मण नहीं रहेंगे?”

लोगों ने कहा—

“काम करने से कोई लोहार नहीं हो जाता।”

भोगेन्द्र झा ने अगला सवाल किया—

“बाटा में चमड़े का काम करेगा तो चमार हो जाएगा?”

लोग आगबबूला हो गए।

अंत में लोगों ने कहा—

“जो ब्राह्मण का लड़का है, वह कोई भी काम करे, ब्राह्मण ही रहेगा।”

भोगेन्द्र झा ने जवाब दिया—

“मैं भी तो यही समझाना चाहता हूं। मेरा जन्म ब्राह्मण परिवार में हुआ है। मैं रसगुल्ला खा भी लिया तो भी ब्राह्मण ही रहूंगा। फिर यह झंझट किस बात का?”

लेकिन समाज उनके तर्क को स्वीकार करने को तैयार नहीं था।

नतीजा—

भोगेन्द्र झा और उनके परिवार का सामाजिक बहिष्कार कर दिया गया।

बचपन से उठ रहे सवाल अब विद्रोह में बदलने लगे थे।

---

एक छात्र ने अंग्रेजों के चंदे के खिलाफ खड़ा कर दिया पूरा स्कूल

इसी समय भोगेन्द्र झा मधुबनी के सूड़ी हाई स्कूल में पढ़ रहे थे।

1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू होने के बाद ब्रिटिश शासन ने स्कूलों से युद्ध के नाम पर चंदा वसूलने का आदेश दिया।

सूड़ी हाई स्कूल में बेहटा गांव के तेज नारायण झा पढ़ाई में अव्वल छात्रों में थे। उन्हें छात्रों से चंदा वसूलने की जिम्मेदारी दी गई।

तब तक कटैया गांव के श्रीमोहन झा का संपर्क भोगेन्द्र झा से हो चुका था।

श्रीमोहन झा ने अपने से जूनियर तेज नारायण झा को समझाया, लेकिन वे तैयार नहीं हुए।

इसके बाद श्रीमोहन झा उन्हें भोगेन्द्र झा के पास लेकर पहुंचे।

भोगेन्द्र झा की बातों का तेज नारायण झा पर गहरा असर हुआ।

उन्होंने स्कूल में चंदा वसूलने के आदेश के खिलाफ बगावत कर दी।

नतीजा यह हुआ कि—

एक भी छात्र ने चंदा नहीं दिया।

यहीं से तेज नारायण झा ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन से जुड़ गए।

इसी वर्ष राजकुमार पूर्वे भी छात्र फेडरेशन से जुड़े।

उसी दौरान प्रतिबंधित कम्युनिस्ट पार्टी के भूमिगत नेता श्यामल किशोर झा की एक गुप्त बैठक रात में छात्रावास में हुई। वे मधुबनी में कम्युनिस्ट पार्टी का संगठन खड़ा करने आए थे।

इस बैठक में राजकुमार पूर्वे भी शामिल हुए।

यही वह मौका था, जब उन्होंने पहली बार कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया यानी CPI का नाम सुना।

1939-40 के आसपास भोगेन्द्र झा ने श्रीमोहन झा, राजकुमार पूर्वे, तेज नारायण झा, चतुरानन मिश्र, बैद्यनाथ यादव सहित अन्य साथियों के साथ पुराने दरभंगा जिले में जिला कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की दिशा में गुप्त रूप से संगठनात्मक काम शुरू किया।

---

किसान सभा से लेकर कम्युनिस्ट आंदोलन तक

इससे ठीक एक साल पहले, 1938 में मधुबनी में किसान सभा का विशाल जिला सम्मेलन हुआ था।

पंडित धनराज शर्मा और सूरज नारायण सिंह के संयोजन में हुए इस सम्मेलन में सहजानंद सरस्वती, जयप्रकाश नारायण, सज्जाद जहीर और योगेंद्र शुक्ल जैसे बड़े नेता शामिल हुए थे।

इसी सम्मेलन और उसके बाद के राजनीतिक वातावरण में भोगेन्द्र झा, श्रीमोहन झा, चतुरानन मिश्र, तेज नारायण झा और बैद्यनाथ यादव जैसे युवा किसान सभा की गतिविधियों से सक्रिय रूप से जुड़े।

लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध के सवाल पर इसी दौर में कम्युनिस्ट और सोशलिस्ट धाराओं के बीच मतभेद भी उभरने लगे।

---

मधुबनी पहुंचे सुभाष चन्द्र बोस

फरवरी 1940।

मधुबनी में सुभाष चन्द्र बोस के आगमन की तैयारी हो रही थी।

कांग्रेस से अलग हो चुके सुभाष बाबू को उस समय कांग्रेस का एक बड़ा धड़ा ‘बागी’ मान रहा था।

संगठन के अखिल भारतीय अध्यक्ष शीलभद्र याजी ने पंडित धनराज शर्मा के माध्यम से भोगेन्द्र झा को कार्यक्रम की तैयारी का संदेश भेजा।

छात्र संघ की ओर से भोगेन्द्र झा कार्यक्रम के मुख्य संयोजक बनाए गए।

लेकिन जैसे ही वे तैयारी के लिए मधुबनी पहुंचे, जिन लोगों ने मदद का आश्वासन दिया था, उनमें से कई पीछे हट गए।

कांग्रेसी नेताओं से जब वे दरी, चादर और तिरंगा मांगने पहुंचे तो जवाब मिला—

“हम कांग्रेस के बागी के लिए कुछ नहीं देंगे।”

छात्र खादी भंडार से जैसे-तैसे दरी लेकर आए, लेकिन उसे भी दूसरे खेमे के लोगों ने छीन लिया।

भोगेन्द्र झा ने श्रीमोहन झा, चतुरानन मिश्र, राजकुमार पूर्वे, माझी साह, गंगाधर दास, कृष्णचन्द्र चौधरी और अन्य साथियों के साथ मिलकर कार्यक्रम की तैयारी जारी रखी।

करीब डेढ़-दो मील तक सड़क के दोनों तरफ बांस की सीधी कर्चियों पर कागज के झंडे और नारे लगाए गए।

नारा था—

“साम्राज्यवाद की यही लड़ाई,
एक न पाई, एक न भाई।”

कार्यक्रम के लिए स्वागत गान भी तैयार होना था।

सूड़ी हाई स्कूल के शिक्षक सत्यनारायण सिंह स्वागत गान लिखने वाले थे।

लेकिन कार्यक्रम से दो घंटे पहले जब भोगेन्द्र झा गीत लेने पहुंचे तो उन्होंने साफ मना कर दिया—

“कांग्रेस के बागी के लिए हम स्वागत गान नहीं देंगे।”

भोगेन्द्र झा लौटे।

और फिर वहीं कॉपी-कलम उठाकर स्वयं स्वागत गान लिख दिया—

“ऐ क्रांतिदूत स्वागत करते हैं हम तुम्हारा,
जगमग-भूषण, भारत भविष्य तारा।
स्वागत तरुण तपस्वी, स्वतंत्रता के पुजारी,
हे क्रांतिदूत, तेरा इंकलाब एक नारा।”

यह गीत उन्होंने अपने साथी तेज नारायण झा को दिया।

तेज नारायण झा ने यदुवीर नायक के साथ श्री अजब लाल के हारमोनियम पर इसे गाया।

कार्यक्रम सफल रहा।

सुभाष चन्द्र बोस छात्र संघ के इन युवाओं से प्रभावित हुए।

उन्होंने भोगेन्द्र झा सहित सक्रिय छात्र नेताओं को तत्कालीन बिहार के रामगढ़ में होने वाले कांग्रेस के सम्मेलन में आने का निमंत्रण दिया।

---

रामगढ़ में गांधीजी के सामने खड़ा था 17-18 साल का ‘बागी’

5 फरवरी 1940।

रामगढ़।

गांधीजी सहित कांग्रेस के बड़े नेताओं के लिए चटाई की झोपड़ियां बनाई जा रही थीं।

भोगेन्द्र झा इस काम में निपुण थे।

उन्होंने गांधीजी, मणिबेन पटेल और कई अन्य नेताओं के लिए चटाई की झोपड़ियां तैयार कीं।

मिथिला के नेता रूपधर झा भोगेन्द्र झा को जानते थे।

उन्होंने अपने सहयोगी से कहा—

“इसकी गांधीजी से बात कराओ। यह कम्युनिस्ट होता जा रहा है। शायद गांधीजी से बात हो जाए तो बदल जाएगा।”

भोगेन्द्र झा को गांधीजी की झोपड़ी में ले जाया गया।

रूपधर झा ने कहा—

“बापू, यह कम्युनिस्ट हो गया है।”

गांधीजी ने सामने खड़े युवक को देखा।

उम्र करीब 17-18 साल।

पैरों में जूते नहीं।

सिर मुंडा हुआ।

गांधीजी ने पूछा—

“कहां का है?”

जवाब मिला—

“मधुबनी।”

गांधीजी ने पूछा—

“क्यों जी, सचमुच?”

भोगेन्द्र झा ने कहा—

“किसी कम्युनिस्ट से मुलाकात नहीं हुई है, लेकिन विचार तो हो गया है।”

इसके बाद दोनों के बीच सवाल-जवाब शुरू हुए।

भोगेन्द्र झा ने गांधीजी से पूछा—

“आप ईश्वर की रोशनी कहते हैं। यह कैसे साबित होता है?”

गांधीजी ने जवाब दिया—

“मेरे लिए सत्य ही ईश्वर है…”

इस संवाद को बाद में ‘हरिजन सेवक’ में ‘एक छात्र के साथ संवाद’ शीर्षक से प्रकाशित किया गया। प्रकाशित संवाद में भोगेन्द्र झा का नाम नहीं था, लेकिन सवाल-जवाब उन्हीं से जुड़े बताए जाते हैं।

बाद में अपनी जीवनी में भोगेन्द्र झा ने इस मुलाकात के बारे में लिखा कि वे गांधीजी से मिलने आकर्षण की उम्मीद लेकर पहुंचे थे, लेकिन इस बातचीत के बाद उनके मन में गांधीजी के प्रति आकर्षण के बजाय विकर्षण पैदा हुआ।

उनका मानना था कि गांधीजी अपने तर्क के ऊपर ईश्वर को रख देते हैं।

यही वह दौर था, जब भोगेन्द्र झा की राजनीतिक सोच एक अलग दिशा में आगे बढ़ रही थी।

लेकिन इसी कहानी के समानांतर बेनीपट्टी में एक और युवा अपने भीतर आजादी की आग लेकर डॉक्टर बनने की राह पर बढ़ रहा था।

उसका नाम था—

डॉ. बैद्यनाथ झा

---

भारत छोड़ो आंदोलन में बेनीपट्टी के नायक डॉ. बैद्यनाथ झा

डॉ. बैद्यनाथ झा का जन्म वर्ष 1918 में बेनीपट्टी थाना क्षेत्र के बेहटा गांव के पुरवारी टोले में हुआ था।

उनके पिता छोटे किसान थे।

परिवार में शिक्षा का वातावरण था। उनके बड़े भाई मिडिल पास थे, छोटे भाई बीए पास थे और तीसरे भाई रघुवीर झा बीए तक पढ़े थे।

बड़े भाई का निधन 1934 में और पिता का निधन 1935 में हो गया।

रघुवीर झा वर्ष 1930 से मध्य विद्यालय में प्रधानाध्यापक के रूप में काम कर रहे थे। 1942 की क्रांति में उन्होंने भी भाग लिया और प्रधानाध्यापक का पद छोड़ दिया।

बाद में वे बेनीपट्टी उच्च विद्यालय में शिक्षक रहे। वर्ष 1965 में उनका आकस्मिक निधन हो गया।

दोनों भाइयों की शिक्षकों और समाज में अच्छी ख्याति थी।

डॉ. बैद्यनाथ झा ने 1935 में सुरसंड उच्च विद्यालय से द्वितीय श्रेणी में मैट्रिक की परीक्षा पास की।

1937 में पटना साइंस कॉलेज से इंटर साइंस की परीक्षा उत्तीर्ण की और उसी वर्ष पटना मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया।

उनके दोनों बड़े भाई खादी पहनते थे।

छोटे भाई यदुवीर झा कांग्रेस के सक्रिय सदस्य थे।

बेनीपट्टी मध्य विद्यालय में हेडमास्टर रहते हुए यदुवीर झा ने धकजरी गांव के बालक राजकुमार पूर्वे को अपनी जेब से चार आना सदस्यता शुल्क देकर कांग्रेस की सदस्यता दिलाई थी।

वही राजकुमार पूर्वे आगे चलकर कम्युनिस्ट पार्टी के बड़े नेता बने और पांच बार विधायक तथा एक बार बिहार विधान परिषद के सदस्य रहे।

यदुवीर झा 1940 में कांग्रेस डेलीगेट के लिए भी चुनाव लड़े, लेकिन धकजरी के प्रभावशाली जमींदार शुभचंद्र मिश्र से हार गए।

शुभचंद्र मिश्र संपत्ति, राजनीतिक पहुंच और सामाजिक प्रभाव के मामले में जिले की प्रमुख हस्तियों में गिने जाते थे।

धकजरी स्थित उनके घर पर बड़े-बड़े नेता आते थे। बाद में भूदान आंदोलन के दौरान विनोबा भावे भी वहां ठहरे।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का बेनीपट्टी थाना कार्यालय भी काफी समय तक धकजरी में उनके दरवाजे पर ही चलता रहा।

इसी कांग्रेस कार्यालय में डॉ. बैद्यनाथ झा के भाइयों का आना-जाना लगा रहता था।

खादी और कांग्रेस के प्रति भाइयों का समर्पण देखकर बैद्यनाथ झा भी प्रभावित हुए।

मेडिकल कॉलेज की पढ़ाई के दौरान उन्होंने अंग्रेजी शैली का सूट-बूट पहनने के बजाय खादी को अपनाया।

छात्र जीवन में वे 26 जनवरी के जुलूसों में भाग लेते थे।

1936 में पंडित जवाहरलाल नेहरू का भाषण सुनने के लिए वे देर रात तक पटना के कांग्रेस मैदान में बैठे रहे। सुबह हॉस्टल सुपरिटेंडेंट की प्रताड़ना भी सहनी पड़ी।

लेकिन उनके भीतर का देशभक्त छात्र पीछे नहीं हटा।

---

भारत छोड़ो आंदोलन का बेनीपट्टी में असर

1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हुआ।

ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नेताओं से बिना पूछे भारत को भी युद्ध में झोंक दिया।

देश में आक्रोश बढ़ने लगा।

भारतीय सैनिकों की भर्ती और ब्रिटिश युद्ध नीति के खिलाफ विरोध शुरू हुआ।

1940 में जब मानवेन्द्र नाथ राय पटना पहुंचे, तो उनके स्वागत जुलूस में डॉ. बैद्यनाथ झा भी शामिल हुए।

पटना के अंजुमन इस्लामिया भवन में राय का भाषण हुआ।

परमानंद और डॉ. श्यामानंद द्विवेदी के संपर्क के माध्यम से बैद्यनाथ झा को उनके राजनीतिक विचारों और जीवन के बारे में जानने का अवसर मिला।

फिर आया—

8 अगस्त 1942।

बंबई में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने भारत छोड़ो आंदोलन का प्रस्ताव पारित किया।

नारा था—

“करो या मरो”

अगले ही दिन 9 अगस्त 1942 को गांधीजी, जवाहरलाल नेहरू, मौलाना अबुल कलाम आजाद सहित कांग्रेस के कई बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया।

बिहार में भी गिरफ्तारी के विरोध में छात्रों और आम लोगों का आंदोलन तेज हो गया।

भारत छोड़ो आंदोलन का असर बेनीपट्टी के क्रांतिकारियों पर भी व्यापक पड़ा।

बेनीपट्टी के—

डॉ. बैद्यनाथ झा,
बरहा के भोगेन्द्र झा,
बेहटा के तेज नारायण झा,
त्योंथ के गणेश चन्द्र झा,
कटैया के श्रीमोहन झा
और धकजरी के राजकुमार पूर्वे

उन अग्रणी युवाओं में थे, जिन्होंने 1942 में तत्कालीन दरभंगा जिले के अलग-अलग हिस्सों में अंग्रेजी शासन की नींव हिला दी।

---

गणेश चन्द्र झा के शहीद होने की फैली अफवाह

धू-धूकर जल उठा बेनीपट्टी थाना और पोस्ट ऑफिस

ब्रिटिश पुलिस गणेश चन्द्र झा के रुख से परिचित थी।

उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

लेकिन वे अधिक दिनों तक जेल में नहीं रहे।

10 अगस्त 1942 को दिन में करीब 11 बजे उन्होंने जेल का फाटक तोड़ा और 88 बंदियों को मुक्त कराते हुए स्वयं भी जेल से फरार हो गए।

इसके बाद वे भूमिगत हो गए और मधुबनी थाना व कचहरी पर तिरंगा फहराने की योजना बनाने लगे।

पुलिस उन्हें भूखे शेर की तरह खोज रही थी।

उधर गणेश चन्द्र झा के जेल से भागने की खबर गांव-गांव पहुंच गई।

लोगों में उत्साह बढ़ता गया।

लोग गीत गाने लगे—

“चलल गणेश तिरंगा लएक,
दहकैत सूरज तेज प्रताप,
अंग्रेजक छक्का छुटैत छैक,
हेतैक भारत आब आजाद…”

10 अगस्त की रात दरभंगा में संघर्ष समिति का गठन हुआ।

पुराने दरभंगा जिले के दरभंगा, समस्तीपुर, मधुबनी और मुजफ्फरपुर के सीतामढ़ी अनुमंडल को मिलाकर संघर्ष समिति बनाई गई।

कमलेश्वरी चरण सिन्हा अध्यक्ष बने।

कर्पूरी ठाकुर भी समिति के सदस्य थे।

और भोगेन्द्र झा को सचिव बनाया गया।

अगले दिन प्रदर्शन हुआ।

भोगेन्द्र झा, उनके सहपाठी कृष्ण चन्द्र चौधरी, कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी और जयप्रकाश नारायण के समर्थक राम सेवक ठाकुर, रामाशीष शुक्ल सहित दर्जनों लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया।

---

पटना सचिवालय पर चली गोलियां

11 अगस्त 1942 को पटना सचिवालय भवन के सामने छात्रों ने तिरंगा फहराने का प्रयास किया।

तत्कालीन जिलाधिकारी डब्ल्यू. जी. आर्थर ने पुलिस को गोली चलाने का आदेश दिया।

पुलिस ने गोलियां चलाईं।

सात छात्र शहीद हो गए—

उमाकान्त सिन्हा,
रामानन्द सिंह,
संतोष प्रसाद झा,
देवीपद चौधरी,
राजेन्द्र सिंह,
रामगोविन्द सिंह
और जगपति कुमार।

करीब 25 लोग गंभीर रूप से घायल हुए।

डॉ. बैद्यनाथ झा अपने मेडिकल कॉलेज के साथियों के साथ यूनिवर्सिटी मैदान पहुंचे।

उनके रूममेट गोपाल शरण हक्का-बक्का दौड़ते हुए आए—

“पटना सचिवालय पर फायरिंग हो गई है। घायल लोग अस्पताल पहुंच रहे हैं। चलो, उनकी चिकित्सा में भाग लेना है।”

डॉ. बैद्यनाथ झा तुरंत अस्पताल पहुंचे।

उन्हें उम्मीद थी कि घायल छात्र आएंगे।

लेकिन सामने का दृश्य कुछ और था।

सात शहीद छात्रों की अर्थियां सामने थीं।

एक साथ सात अर्थियां निकलीं।

हर तरफ मातम था।

आंखों में आंसू थे।

लेकिन इस घटना ने आंदोलन की आग को और भड़का दिया।

---

डॉक्टर ने इलाज के साथ आंदोलन का भी मोर्चा संभाला

12 अगस्त को डॉ. बैद्यनाथ झा अपने कॉलेज के साथियों और शहर के लोगों के साथ सड़क पर उतर गए।

डाक-तार व्यवस्था को बाधित किया गया।

सड़कों पर ईंट और रोड़े डालकर अंग्रेजी पुलिस के आवागमन को रोकने की कोशिश की गई।

आंदोलन को संगठित करने के लिए विभिन्न कॉलेजों से दो-दो छात्रों को लेकर स्टूडेंट काउंसिल बनाई गई।

13 अगस्त को कांग्रेस नेता सिद्धेश्वर बाबू के यहां इसकी बैठक हुई।

इसी बैठक में डॉ. बैद्यनाथ झा की मुलाकात लक्ष्मण झा उर्फ लखन जी से हुई, जो पटना कॉलेज के प्रतिनिधि थे और आगे चलकर मिथिला विश्वविद्यालय के चर्चित कुलपति बने।

उधर अंग्रेजी सरकार ने हॉस्टलों को खाली कराना शुरू कर दिया।

13 अगस्त की शाम तक कई हॉस्टल खाली हो चुके थे।

14 अगस्त को प्रिंसिपल डॉ. टी. एन. बनर्जी के आग्रह पर डॉ. बैद्यनाथ झा और उनके साथियों ने भी हॉस्टल छोड़ दिया।

रेल यातायात बंद था।

इसलिए उन्होंने रात पहलेजा घाट पर गुजारी।

सुबह नाव से गंडक नदी पार कर हाजीपुर पहुंचे।

हाजीपुर स्टेशन पर पहले से बड़ी भीड़ जमा थी।

माल गोदाम से मिट्टी के तेल के कंटेनर निकाले जा रहे थे।

आंदोलनकारी तेल प्लेटफॉर्म पर बहा रहे थे।

डॉ. बैद्यनाथ झा ने भीड़ से पूछा—

“आप लोग यह क्या कर रहे हैं?”

लोगों ने पूछा—

“आप लोग कौन हैं?”

उन्होंने जवाब दिया—

“हम पटना के छात्र हैं।”

इतना सुनते ही लोगों का व्यवहार बदल गया।

उन्होंने डॉ. बैद्यनाथ झा से आगे की रणनीति के बारे में सलाह मांगी।

इसके बाद घटनाक्रम और उग्र हो गया।

ट्रेनों को आग के हवाले कर दिया गया।

दूर तक उठती लपटें दिखाई देती रहीं।

उनके साथी के मुंह से अनायास निकला—

“यह तो फ्रेंच रिवॉल्यूशन हो गया!”

इसके बाद वे लोग बैलगाड़ी से मुजफ्फरपुर की ओर निकल गए।

---

मधुबनी में भी भड़क उठी क्रांति

उधर मधुबनी का सूड़ी हाई स्कूल स्वतंत्रता आंदोलन का केंद्र बना हुआ था।

गणेश चन्द्र झा युवाओं को भूमिगत आंदोलन के गुर सिखा रहे थे।

पकड़े जाने पर झाड़ियों में छिपना, पेड़ों पर चढ़कर बचना, नदी में सांस रोककर छिपना और दुश्मन से मुकाबला करना—इन सबकी तैयारी कराई जा रही थी।

राजकुमार पूर्वे, चतुरानन मिश्र, तेज नारायण झा, श्रीमोहन झा, विश्वनाथ मल्लिक, ध्रुव कुमार दत्त सहित सैकड़ों छात्र आंदोलन के लिए तैयार हो रहे थे।

14 अगस्त को मधुबनी में करीब पांच हजार किसान, मजदूर, छात्र और बच्चे तिरंगा लेकर सूड़ी हाई स्कूल से थाना और कचहरी की ओर निकल पड़े।

नारे गूंज रहे थे—

“हमारे खून से बने हैं गोरे,
हमीं को काला बता रहे हैं।
हमीं से पैसा वसूल कर,
हमीं को जालिम सता रहे हैं।”

जुलूस में गणेश चन्द्र झा, श्रीमोहन झा, चतुरानन मिश्र, तेज नारायण झा, राजकुमार पूर्वे सहित कई क्रांतिकारी आगे चल रहे थे।

नीलम सिनेमा चौक के पास पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया।

इसके बाद गोली चली।

गणेश ठाकुर और अकलू महतो शहीद हो गए।

गणेश चन्द्र झा पर भी पुलिस ने बेरहमी से हमला किया।

लाठी और बंदूक के कुंदे से पीटा गया।

लहूलुहान गणेश चन्द्र झा जमीन पर गिर पड़े।

पुलिस उन्हें घसीटते हुए थाने ले जा रही थी।

इसी दौरान दरभंगा के एसपी सेल्सबरी मधुबनी पहुंचे और दारोगा राजबली ठाकुर को फटकार लगाकर शांत किया।

कई लोगों को गिरफ्तार कर मोतिहारी जेल भेज दिया गया।

---

हरिपुर के दो बच्चों ने भी अंग्रेजों को चुनौती दी

कलुआही चौक से दक्षिण हरिपुर गांव के डीहटोल में भी पुलिस ने गोली चलाई।

इसी दौरान हरिपुर के दो बच्चों—शिव और नारायण—ने अंग्रेजी पुलिस के सामने भी भय नहीं दिखाया।

दोनों की उम्र करीब 10 से 12 वर्ष बताई जाती है।

पुलिस की गाड़ी वहां पहुंची।

शिव को गोली मार दी गई।

अपने साथी को गोली लगते देख नारायण ने जोर से आवाज लगाई—

“इंकलाब जिंदाबाद!”

उसे भी गोली मार दी गई।

आज भी कलुआही स्थित शिव नारायण क्लब उस दौर की स्मृति से जुड़ा हुआ है।

क्रांति की लपटें मधुबनी, जयनगर, खजौली, बेनीपट्टी, हरलाखी, लदनियां, जाले, बिरौल, फुलपरास, मधेपुर, झंझारपुर, बहेड़ा और सिंघिया तक फैलती गईं।

---

गणेश चन्द्र झा के शहीद होने की अफवाह और बेनीपट्टी में विस्फोट

मधुबनी के जुलूस में गणेश ठाकुर की गोली लगने से मौत हो गई थी।

लेकिन खबर फैल गई—

“त्योंथ वाले गणेश चन्द्र झा शहीद हो गए।”

संचार के साधन सीमित थे।

अफवाह फैलती चली गई।

बेनीपट्टी में क्रांतिकारियों ने परसौनी गांव के एक स्कूल में डेरा डाला।

मधुबनी में गणेश बाबू की हत्या, गिरफ्तारियों और दरभंगा में भोगेन्द्र झा की गिरफ्तारी की खबरों ने लोगों के भीतर गुस्सा भर दिया।

बेनीपट्टी में स्वतःस्फूर्त भीड़ जुटने लगी।

परसौनी कैंप से भी लोग बेनीपट्टी पहुंचे।

और फिर—

बेनीपट्टी थाना और पोस्ट ऑफिस को आग के हवाले कर दिया गया।

अंग्रेजी शासन के खिलाफ बेनीपट्टी में यह एक बड़ा विस्फोट था।

---

अंग्रेजी सिपाहियों ने जला दिया डॉ. बैद्यनाथ झा का घर

भारत छोड़ो आंदोलन की लहर में डॉ. बैद्यनाथ झा पटना से दरभंगा पहुंचे।

19 अगस्त 1942 को वे साइकिल से शाम करीब चार बजे बेनीपट्टी पहुंचे।

बेनीपट्टी थाना और डाकघर पहले ही जल चुके थे।

अब बेनीपट्टी मध्य विद्यालय के मैदान में हजारों लोग जमा थे।

सवाल था—

क्या रजिस्ट्री ऑफिस भी जला दिया जाए?

रजिस्ट्री ऑफिस में किसानों के जमीन संबंधी दस्तावेज थे।

लोगों ने कहा कि कार्यालय जलाने से किसानों का नुकसान हो सकता है।

डॉ. बैद्यनाथ झा ने सुझाव दिया—

“पहले नए दस्तावेज निकालकर उनके हकदारों को बांट दिए जाएं। उसके बाद कार्यालय जलाया जाए।”

लोग सहमत हुए।

20 अगस्त को नए दस्तावेज संबंधित लोगों को बांटे गए।

और शाम करीब पांच बजे—

बेनीपट्टी रजिस्ट्री ऑफिस में आग लगा दी गई।

इसमें डॉ. बैद्यनाथ झा के भाई यदुवीर झा की भी सक्रिय भूमिका रही।

इसके बाद डॉ. बैद्यनाथ झा सड़कों को काटने, पेड़ गिराकर यातायात रोकने और चौकीदारों की वर्दी जलाने जैसी गतिविधियों में जुटे रहे।

लेकिन अब अंग्रेजी सरकार ने दमन का चक्र तेज कर दिया था।

---

27 अगस्त 1942: बेहटा में अंग्रेजों ने जला दिया क्रांतिकारी डॉक्टर का घर

अंग्रेजी प्रशासन ने प्रमुख क्रांतिकारियों की सूची तैयार कर ली थी।

बेनीपट्टी में पहले खादी भंडार जलाया गया।

फिर आया—

27 अगस्त 1942।

सुबह होते ही दर्जनों घुड़सवार अंग्रेजी पुलिस बेहटा गांव पहुंची।

उनका निशाना था—

डॉ. बैद्यनाथ झा का पुश्तैनी घर।

दालान जलाया गया।

मवेशियों का घर जलाया गया।

निवास के दूसरे फूस के घरों में भी आग लगा दी गई।

अंग्रेजी पुलिस ने घर को इस तरह जलाया कि वहां रहना मुश्किल हो गया।

कहा जाता है कि हाल के वर्षों तक उस जले हुए घर की लकड़ियां देखी जा सकती थीं।

आग की लपटें इतनी ऊंची उठ रही थीं कि करीब दो मील दूर खुटौना में छिपे डॉ. बैद्यनाथ झा भी उन्हें देख रहे थे।

कल्पना कीजिए—

एक बेटा दूर खड़ा अपने पुश्तैनी घर को जलते हुए देख रहा था।

घर में उसकी बूढ़ी मां थी।

परिवार था।

सामान था।

यादें थीं।

और सब कुछ अंग्रेजी हुकूमत की आग में जल रहा था।

लेकिन वह लौट नहीं सकता था।

क्योंकि लौटने का मतलब था—

गिरफ्तारी।

---

15 वर्षीय तेज नारायण झा को 15 बेंत की सजा

घर जलाने के बाद पुलिस ने गांव में कई लोगों पर बर्बरता की।

बेहटा में बंगली नाम का एक बैसार स्थल था, जहां गांव के लोग जुटते थे।

वहां रामकृष्ण झा, रामेश्वर झा, तेज नारायण झा सहित कई लोग मौजूद थे।

पुलिस को शक हुआ कि ये लोग संगठन कर रहे हैं।

पुलिस ने बर्बरता शुरू कर दी।

15 वर्षीय तेज नारायण झा ने इसका विरोध किया।

उन्हें उनके पिता रामकृष्ण झा, रामेश्वर झा, घुट्टूर झा, सत्यनारायण झा सहित कई लोगों के साथ गिरफ्तार कर लिया गया।

अंग्रेज कमिश्नर के आदेश पर तेज नारायण झा को जेल में 15 बेंत की कठोर सजा दी गई।

पूरा शरीर लहूलुहान हो गया।

इस क्रूरता के विरोध में जेल के कैदी सामूहिक अनशन पर चले गए।

यही तेज नारायण झा आगे चलकर सीपीआई के टिकट पर बेनीपट्टी विधानसभा से 1962, 1967, 1972 और 1977 में विधायक बने और मंत्री भी रहे।

---

घर जला, परिवार उजड़ा… फिर शुरू हुआ पलायन

डॉ. बैद्यनाथ झा का घर जल चुका था।

परिवार के पास न रहने के लिए घर था, न खाने का पर्याप्त सामान।

परिवार में करीब 20 लोग थे।

बूढ़ी मां भी साथ थीं।

इलाके के गणमान्य लोगों और संबंधियों ने पुलिस से बचते-बचाते परिवार के सदस्यों को खुटौना पहुंचाया।

वहां से परिवार मधवापुर होते हुए नेपाल के जलेश्वर पहुंचा।

लेकिन जलेश्वर भी शरणार्थियों से भरा था।

एक भी घर खाली नहीं मिला।

परिवार को पांच दिन और पांच रात एक पोखर के भिंडे पर गुजारने पड़े।

बाद में एक वरिष्ठ नेपाली अधिकारी के परिवार की पोती की सफल चिकित्सा करने के बाद डॉ. बैद्यनाथ झा को जलेश्वर से उत्तर रतवारा गांव की एक सरकारी धर्मशाला में परिवार सहित रहने की व्यवस्था मिल गई।

कुछ समय बाद जब खबर मिली कि परिवार बेनीपट्टी लौट सकता है, तो परिवार के लोगों को वापस भेज दिया गया।

लेकिन डॉ. बैद्यनाथ झा स्वयं भूमिगत जीवन में थे।

वे अपने भाई यदुवीर झा और रत्नकांत झा आदि के साथ अलवर की ओर निकल पड़े।

---

भूमिगत जीवन: बेनीपट्टी से अलवर, दिल्ली और फिर नेपाल

अलवर में उनके ससुराल पक्ष के रिश्तेदार रामभद्र झा रहते थे।

वे विशिष्ट विद्वान और प्रभावशाली व्यक्ति थे तथा राजदरबार में भी उनकी अच्छी पहुंच थी।

डॉ. बैद्यनाथ झा सुरसंड, पुपरी और औराई होते हुए मुजफ्फरपुर पहुंचे।

वहां उनके साले महेश्वर झा ने साथ दिया।

फिर वे लोग पटना होते हुए अलवर पहुंचे।

लेकिन परिवार एक साथ चार लोगों को रखने में भयभीत था।

इसलिए दिल्ली की एक धर्मशाला में रहने की व्यवस्था कराई गई।

दिल्ली में कुछ दिन रहने के बाद उन्होंने दो-दो लोगों के समूह बनाए।

रत्नकांत झा और डॉ. बैद्यनाथ झा के भाई जनकपुर की ओर चले गए।

डॉ. बैद्यनाथ झा अपने साले महेश्वर झा के साथ मुजफ्फरपुर लौटे।

फिर मुजफ्फरपुर से दरभंगा होते हुए सहरसा जिले के पड़री गांव पहुंचे।

यह डॉ. बैद्यनाथ झा का ससुराल था।

यहां भी पहचान छिपाने के लिए उन्होंने बताया—

“मुझे सहरसा में बनने वाले हवाई अड्डे का डॉक्टर नियुक्त किया गया है। जल्द ही वहां सेना की छावनी बनने वाली है।”

आम लोगों को तो विश्वास हो गया।

लेकिन वहां मौजूद एक व्यक्ति को शक हुआ।

वे थे—

सूर्य नारायण झा।

वे स्वयं 1930 के क्रांतिकारी आंदोलन में भाग ले चुके थे।

एक दिन उन्होंने डॉ. बैद्यनाथ झा को एकांत में बुलाया और पूछा—

“क्या आप भी आंदोलन में शामिल रहे हैं?”

डॉ. बैद्यनाथ झा समझ गए कि सामने वाला व्यक्ति अपना ही है।

उन्होंने पूरी कहानी बता दी।

इसके बाद सूर्य नारायण झा उन्हें करिहो के महंत के पास ले गए।

वह महंत रामपट्टी, मधुबनी के भी महंत थे और आंदोलनकारियों को गुप्त रूप से शरण देते थे।

वहां से डॉ. बैद्यनाथ झा को नेपाल के सप्तरी जिले के कोईलारी गांव ले जाया गया।

यहीं उनकी मुलाकात हुई—

सूरज नारायण सिंह से।

वे हजारीबाग जेल से फरार होकर भूमिगत रूप से आंदोलन की गतिविधियां चला रहे थे।

---

एक डॉक्टर… जिसने देश के लिए अपना घर तक गंवा दिया

डॉ. बैद्यनाथ झा की कहानी सिर्फ एक डॉक्टर के स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने की कहानी नहीं है।

यह उस दौर की कहानी है जब बेनीपट्टी के गांवों में बैठे युवा अपने सामने दो रास्ते देखते थे—

एक तरफ सुरक्षित भविष्य।

दूसरी तरफ आजादी की लड़ाई।

डॉ. बैद्यनाथ झा ने दूसरा रास्ता चुना।

उन्होंने मेडिकल कॉलेज की पढ़ाई की।

डॉक्टर बने।

लेकिन जब देश को जरूरत पड़ी तो मरीजों का इलाज करने वाला यह डॉक्टर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलनकारी बन गया।

पटना सचिवालय के शहीद छात्रों की अर्थियां देखीं।

सड़कों पर आंदोलन किया।

हाजीपुर में क्रांतिकारी भीड़ के बीच पहुंचे।

बेनीपट्टी आए।

रजिस्ट्री ऑफिस जलाने से पहले किसानों के दस्तावेज बचाने की चिंता की।

और फिर अंग्रेजों ने उनका घर जला दिया।

परिवार को नेपाल भागना पड़ा।

खुद महीनों भूमिगत रहना पड़ा।

फिर भी संघर्ष जारी रहा।

घर राख हो गया, लेकिन संकल्प नहीं।

सामान जल गया, लेकिन सपना नहीं।

गांव छूट गया, लेकिन देश नहीं।

और यही वह दौर था, जिसने बेनीपट्टी की मिट्टी से निकले इन युवाओं को इतिहास में दर्ज कर दिया।

भोगेन्द्र झा…

गणेश चन्द्र झा…

श्रीमोहन झा…

तेज नारायण झा…

राजकुमार पूर्वे…

और डॉ. बैद्यनाथ झा…

ये केवल अलग-अलग नाम नहीं थे।

ये बेनीपट्टी की उस पीढ़ी का नाम थे, जिसने अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी।

कहानी अभी खत्म नहीं हुई है।

अगली कड़ी में जानेंगे—भूमिगत जीवन के बाद डॉ. बैद्यनाथ झा और उनके साथियों ने आंदोलन को कैसे आगे बढ़ाया, नेपाल की धरती से क्या गतिविधियां चलीं और आजादी के बाद इन क्रांतिकारियों का जीवन किस दिशा में गया।

यहीं से भोगेन्द्र झा के जीवन की वह राजनीतिक यात्रा शुरू होती है, जिसने आगे चलकर जमींदारों को चुनौती दी, किसान आंदोलन को धार दी, जेल और यातनाएं झेलीं और अंततः उन्हें संसद तक पहुंचाया।

जिस लड़के को समाज ने कभी ‘कुल-कलंकी’ कहा था…

जिसे रसगुल्ले के नाम पर समाज से बाहर कर दिया गया था…

जिसने गांधीजी के सामने भी सवाल पूछने से परहेज नहीं किया…

वही आगे चलकर ‘भोगी भगवान’ कैसे बना?

जमींदारों के खिलाफ उसकी लड़ाई कितनी खतरनाक हुई?

अंधरी के महंत को उससे डर क्यों लगने लगा?

और आखिर वह कौन-सा दौर था, जब भोगेन्द्र झा को मृत समझकर फेंक दिया गया था?

यह कहानी अभी बहुत बाकी है…

अगर आपको अपनी मिट्टी के इन भूले-बिसरे नायकों की कहानी महत्वपूर्ण लगती है, तो अपनी प्रतिक्रिया कमेंट में जरूर लिखिए।

क्योंकि इतिहास केवल दिल्ली, पटना और बड़े नेताओं का नहीं होता।

इतिहास उन गांवों का भी होता है, जहां से निकलकर कुछ लोग अपनी पूरी जिंदगी देश के नाम कर देते हैं।

बेनीपट्टी के इन बागी सपूतों की कहानी अभी बाकी है… 

कृपया इसे कॉपी पेस्ट नहीं करें, संभव हो तो शेयर करें पोस्ट को 🙏

यह तमाम जानकारी सहित बेनीपट्टी से जुड़ी इतिहास से लेकर वर्तमान तक की तमाम जानकारी मैंने अपनी पुस्तक 'बेनीपट्टी 0 KM' में संकलित की हुई है, इच्छुक व्यक्ति पुस्तक भी प्राप्त कर सकते हैं।
बिजली हादसे से आक्रोशित लोगों ने बेनीपट्टी-उमगांव मुख्य मार्ग किया जाम, BDO ने की वार्ता