
मनोगुप्ति मन पर वचन गुप्ति वचन पर काय गुप्ति शरीर पर नियंत्रण करती है.
संसार के दुखों से छुडाकर अभीष्ट स्थान दिलाता है धर्म
मुनि प्रयोग सागर
रहलीः आस्रव का रुकना संवर है अर्थात आत्मा में जिन कारणों से कर्मों का आस्रव होता था उन कारणों को दूर कर देने से जो कर्मों का आना बंद हो जाता है उसे संवर कहते हैं, संवर के दो भेद हैं द्रव्य संवर और भाव संवर द्रव्य संवर पुद्गलमय कर्मों के आस्रव का रुकना है और कर्मास्रव के कारण भावों का रुकना भाव संवर है.
10 लक्षण पर्व की नवम दिवस जैन धर्मशाला रहली में तत्वार्थ सूत्र की वाचना करते हुए मुनि श्री प्रयोग सागर जी ने बताया कि संसार भ्रमण के कारण स्वरूप मन वचन और काय इन तीनों योगों के निग्रह करने को गुप्ती कहते हैं. जीवो की हिंसा से बचने के लिए प्रवृत्ति में यत्नाचार को समिति कहते हैं. जो आत्मा को संसार के दुखों से छुड़ाकर अभीष्ट स्थान को प्राप्त कराता है उसे धर्म कहते हैं. शरीर आदि के स्वरूप का बार-बार विचार करने को अनुप्रेक्षा कहते हैं. भूख आदि की वेदना उत्पन्न होने पर कर्मों की निर्जरा के लिए उसे शांत भावों से सहन करने को परिषहजय कहते हैं कर्मों के आस्रव में कारण भूत आचरण का बाह्म और आभ्यंतर क्रियाओं के रोकने को चरित्र कहते हैं. मन पर नियंत्रण बचनगुप्ति और शरीर पर नियंत्रण काय गुप्ति है. उत्तम तब से निर्जला भी होती है और संवर भी होता है यद्यपि 10 धर्म में तप धर्म भी आ जाता है फिर भी तप का अलग से ग्रहण यह बतलाने के लिए किया है की तप से नवीन कर्मों का आना रुकता है और पहले बंधे हुए कर्मों की निर्जरा भी होती है. उदाहरण के लिए मंदिर जाकर पूजा आदि में रत रहते समय बुरे कर्मों का आना रुक जाता है और पूर्व कर्मों की निर्जरा भी होती रहती है तप संवर का प्रधान कारण है यद्यपि तप को सांसारिक अभ्युदय में भी कारण बतलाया है किंतु तप का प्रधान फल तो कर्मों का छय होना है और गौण फल सांसारिक अभ्युदय की प्राप्ति होना है जैसे खेती का प्रधान फल अनाज उत्पन्न करना है किंतु गौंड फल उससे भूसा आदि की प्राप्ति है.
Rehli, Sagar | Sep 25, 2026