स्वतंत्रता दिवस पर शासकीय स्कूल में महात्मा गांधी और अंबेडकर की तस्वीर लगाने को लेकर विवाद: ग्रामीणों ने किया हंगामा,,
स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर जहां स्कूलों में देशभक्ति, संविधान और स्वतंत्रता संग्राम के मूल्यों की चर्चा होनी चाहिए, वहीं शिवपुरी जिले के कोलारस विधानसभा क्षेत्र के डेहरवारा गांव स्थित शासकीय विद्यालय में तस्वीर को लेकर विवाद खड़ा हो गया। बताया जा रहा है कि स्वतंत्रता दिवस समारोह के दौरान विद्यालय में डॉ. भीमराव अंबेडकर की तस्वीर लगाई गई, लेकिन महात्मा गांधी की तस्वीर नहीं लगाई गई। इस पर कुछ ग्रामीणों ने आपत्ति जताई और स्कूल स्टाफ से सवाल-जवाब शुरू हो गए। देखते ही देखते समारोह का माहौल असहज हो गया।
विवाद का सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी एक महापुरुष की तस्वीर लगाने के लिए दूसरे महापुरुष को हटाना जरूरी है? डॉ. भीमराव अंबेडकर भारतीय संविधान के शिल्पकार और सामाजिक न्याय के महान योद्धा थे, तो महात्मा गांधी स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में रहे।
दोनों का ऐतिहासिक योगदान अपनी-अपनी जगह महत्वपूर्ण है। ऐसे में स्वतंत्रता दिवस के मंच को किसी व्यक्ति या विचारधारा की श्रेष्ठता साबित करने का अखाड़ा बनाना शायद उस दिन की भावना के विपरीत है।
अगर विद्यालय में अंबेडकर की तस्वीर लगाई गई तो इसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए, लेकिन सवाल यह जरूर उठता है कि गांधी जी की तस्वीर क्यों नहीं लगाई गई? क्या यह महज आयोजन की चूक थी, या जानबूझकर किसी एक विचार को प्राथमिकता दी गई—इसका जवाब स्कूल प्रबंधन और संबंधित शिक्षा अधिकारियों को देना चाहिए।
देखा जाए तो आज सोशल मीडिया के दौर में इतिहास भी कभी-कभी ऐसी प्रतियोगिता में बदल जाता है, जिसका कोई विजेता नहीं होता—गांधी बनाम अंबेडकर, कौन बड़ा?
विडंबना यह है कि जिन महापुरुषों ने देश और समाज के लिए अपना जीवन लगाया, आज उनके नाम पर समर्थक एक-दूसरे से भिड़ने लगे हैं।
अंबेडकर को सम्मान देने के लिए गांधी को छोटा करना जरूरी नहीं और गांधी का सम्मान करने के लिए अंबेडकर के योगदान को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं।
इतिहास कोई कुर्सी की दौड़ नहीं है कि एक बैठेगा तो दूसरा खड़ा रहेगा।
स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम में तस्वीरें लगाना केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को देश के इतिहास और संविधान से जोड़ने का अवसर है। इसलिए स्कूल प्रबंधन को स्पष्ट करना चाहिए कि तस्वीर लगाने के संबंध में कोई निर्धारित प्रोटोकॉल था या नहीं और गांधी जी की तस्वीर क्यों नहीं लगाई गई।
ग्रामीणों की नाराजगी को भी इसी सवाल तक सीमित रहना चाहिए—किसी समुदाय या वर्ग को निशाना बनाने के बजाय तथ्य सामने आएं। क्योंकि देश की आजादी किसी एक व्यक्ति की नहीं थी और संविधान किसी एक वर्ग की जागीर नहीं है।
गांधी को हटाकर अंबेडकर बड़े नहीं होंगे, और अंबेडकर को नजरअंदाज करके गांधी महान नहीं होंगे। महानता की असली पहचान यह है कि हम दोनों के योगदान को समझें और अगली पीढ़ी को इतिहास लड़ाने के बजाय इतिहास पढ़ाएं।
अब देखना यह है कि शिक्षा विभाग इस विवाद को महज “तस्वीर लगाने की भूल” मानकर खत्म करता है या विद्यालय प्रबंधन से पूरे मामले की वास्तविकता पूछकर स्थिति स्पष्ट करता है।