13 साल से मंदिर में स्कूल, फिर भी भवन का इंतजार; क्या बच्चों की शिक्षा से ज्यादा जरूरी हैं राजनीतिक दलों के कार्यालय?
सलूंबर। आजादी के 80 साल पूरे होने को हैं। देश विकास और आधुनिक शिक्षा के बड़े-बड़े दावे कर रहा है, लेकिन सलूंबर जिले के एक गांव में बच्चों की शिक्षा व्यवस्था आज भी सवालों के घेरे में है। यहां 13 साल से स्कूल भवन का इंतजार कर रहे बच्चे मंदिर के देवरे में पढ़ने को मजबूर हैं।
जिला मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर दूर लसाड़िया तहसील की धोलिया ग्राम पंचायत के कराकला गांव में वर्ष 2010 में प्राथमिक विद्यालय स्वीकृत हुआ था और वर्ष 2013 से स्कूल संचालन की अनुमति भी मिल गई। लेकिन स्कूल भवन नहीं बनने के कारण आज तक कक्षा पहली से पांचवीं तक के करीब 60 बच्चे मंदिर में बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं।
गांव में करीब 135 घर हैं और बच्चों की संख्या भी कम नहीं है। इसके बावजूद शिक्षा के लिए न तो पर्याप्त भवन है और न ही मूलभूत सुविधाएं। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि पांच कक्षाओं के बच्चों की जिम्मेदारी महज एक शिक्षक के भरोसे है।
स्कूल के नाम से शौचालय स्वीकृत हुए, लेकिन दोनों शौचालय बच्चों के इस्तेमाल के बजाय स्कूल का सामान रखने के काम आ रहे हैं। पीने के पानी के लिए भी बच्चों को आसपास के घरों में जाना पड़ता है।
पोषाहार भी दूसरे घरों के भरोसे
स्कूल में पोषाहार की व्यवस्था भी किसी विडंबना से कम नहीं है। पोषाहार का सामान करीब एक किलोमीटर दूर वार्ड पंच के घर में रखा जाता है, जबकि करीब 300 मीटर दूर दूसरे व्यक्ति के घर में पोषाहार तैयार होता है। यानी स्कूल है, लेकिन उसकी जरूरी व्यवस्थाएं स्कूल से बाहर चल रही हैं।
ग्रामीणों के अनुसार स्कूल के लिए करीब दो बीघा जमीन आवंटित है। ग्रामीणों ने भवन निर्माण के लिए विभागीय कार्यालयों के चक्कर भी लगाए, लेकिन बजट के अभाव में आज तक भवन का निर्माण नहीं हो सका।
बारिश में पढ़ाई या छुट्टी—बच्चों के सामने दो ही विकल्प
बारिश के दिनों में स्थिति और भी दयनीय हो जाती है। मंदिर में पर्याप्त जगह और सुरक्षित व्यवस्था नहीं होने के कारण बच्चों को कई बार खड़े होकर पढ़ना पड़ता है या फिर छुट्टी करनी पड़ती है।
गांव के निवासी नानालाल मीणा का कहना है कि वर्षों से बच्चे इसी तरह पढ़ रहे हैं। सवाल यह है कि जिन बच्चों के हाथों में किताबें होनी चाहिए, उन्हें आखिर कब एक सुरक्षित और सुविधायुक्त स्कूल भवन मिलेगा?
राजनीतिक कटाक्ष—कार्यालयों के लिए जगह, बच्चों के लिए नहीं?
सरकारें हर साल शिक्षा के बजट, डिजिटल शिक्षा और बेहतर स्कूलों की बातें करती हैं। राजनीतिक दल शिक्षा और बच्चों के उज्ज्वल भविष्य को लेकर बड़े-बड़े दावे करते हैं। लेकिन कराकला गांव की तस्वीर उन दावों पर सवाल खड़ा करती है।
विडंबना देखिए—राजनीतिक दलों के कार्यालयों के लिए जगह और संसाधन जुट जाते हैं, लेकिन बच्चों के लिए एक अदद स्कूल भवन के लिए 13 साल बाद भी बजट का इंतजार है।
यह सवाल किसी एक सरकार या पार्टी का नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था से है—क्या मंदिर में बैठकर पढ़ने वाले इन 60 बच्चों का भी उतना ही हक नहीं है, जितना शहरों के बच्चों का? आखिर इन बच्चों को अपना स्कूल भवन कब मिलेगा?