गरीब परिवार सरकारी अस्पताल इस उम्मीद से पहुंचता है कि कम खर्च में मां और बच्चे का सुरक्षित इलाज हो जाएगा। लेकिन आरोप है कि कुछ डॉक्टर, नर्स, आशा कार्यकर्ता और गार्ड की मिलीभगत से मरीजों को निजी क्लीनिक भेजा जाता है।
जिस परिवार के पास दवा के पैसे नहीं, उसे हजारों रुपये का बिल थमा दिया जाता है। जांच और डिलीवरी के नाम पर निजी अस्पताल भेजने और कथित कमीशन के खेल की शिकायतें हैं। आरोप है कि सामान्य डिलीवरी को भी गंभीर बताकर गरीब परिवार को डराया जाता है।
शिकायत की बात आती है तो लिखित आवेदन मांगा जाता है। गरीब परिवार अस्पताल और दफ्तरों के चक्कर लगाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता—बच्चे और मरीज की चिंता में उधार लेकर पैसे देता है और चुपचाप घर लौट जाता है।
सवाल सिर्फ कमीशन का नहीं, उस गरीब की मजबूरी का है… जिसके पास इलाज के लिए पैसा नहीं, लेकिन अपने अपनों को बचाने के लिए सब कुछ बेचने को तैयार है।