*राम को रोकना था मोह, आगे बढ़ाना था धर्म । विश्वामित्र की माँग, दशरथ का वात्सल्य, वसिष्ठ का विवेक और लोकमंगल की ओर श्रीराम का पहला कदम - —:* जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री सदानन्द सरस्वती जी महाराज (द्वारकाशारदापीठाधीश्वर) ।।
अयोध्या का राजदरबार सजा हुआ है । एक ओर महाराज दशरथ हैं — जिन्होंने वर्षों की प्रतीक्षा, तप, यज्ञ और प्रार्थना के बाद राम जैसे पुत्र को प्राप्त किया है । दूसरी ओर तपःपूत महर्षि विश्वामित्र खड़े हैं । उनका उद्देश्य व्यक्तिगत नहीं है; उनके यज्ञ में बार-बार विघ्न उत्पन्न किए जा रहे हैं, धर्मकार्य बाधित हो रहा है और उसकी रक्षा के लिए वे अयोध्या के राजकुमार श्रीराम को अपने साथ ले जाना चाहते हैं । महर्षि विश्वामित्र मानो महाराज दशरथ से पूछ रहे हों —
“राजन् ! आपके राम विद्या, विनय, शौर्य और संस्कार से सम्पन्न हैं । यदि इतना समर्थ बालक केवल राजमहल में ही सुरक्षित बैठा रहे, तो उसकी शक्ति लोककल्याण के काम कब आएगी ? सामर्थ्य केवल अपने सुख के लिए नहीं, परोपकार के लिए होता है ।” यहीं रामकथा प्रत्येक मनुष्य के सामने बड़ा प्रश्न खड़ा करती है —
विद्या मिली तो उसका उपयोग किसके लिए ? शक्ति मिली तो उसका उपयोग किसके लिए ? पद मिला तो किसके लिए ?
धन मिला तो किसके लिए ? और जीवन मिला है तो केवल अपने लिए या किसी के काम आने के लिए ? परोपकार श्रेष्ठ मनुष्य का स्वभाव है । वृक्ष स्वयं अपने फल नहीं खाता । नदी स्वयं अपना जल नहीं पीती । बादल स्वयं के लिए वर्षा नहीं करता ।
सूर्य स्वयं के लिए प्रकाश नहीं देता । प्रकृति का प्रत्येक महान तत्त्व मानो कह रहा है —
“जिसके भीतर जितनी अधिक शक्ति है, उसके ऊपर उतनी ही अधिक लोकसेवा की जिम्मेदारी है ।”
विश्वामित्र राम को अपने व्यक्तिगत कार्य के लिए नहीं माँग रहे थे; वे धर्म की रक्षा के लिए राम को माँग रहे थे । लेकिन पिता का हृदय तर्क से कहाँ चलता है ? दशरथ व्याकुल हो उठे । मानो कह रहे हों —
“मुनिवर! धन ले लीजिए, भूमि ले लीजिए, कोष ले लीजिए, सेना ले जाइए । आवश्यकता हो तो मैं स्वयं आपके साथ चलूँगा; लेकिन राम को मत माँगिए । राम को देने की शक्ति मुझमें नहीं है ।” उस क्षण दशरथ राजा नहीं रहे — वे केवल पिता थे ।
संसार जिसे धन मानता था, दशरथ के लिए वह वास्तविक धन नहीं था । उनका धन राम थे । उनका सुख राम थे । उनके प्राण राम थे । यहीं वेदान्त का अत्यन्त सुंदर सिद्धान्त स्मरण आता है —
*वित्तात्पुत्रः प्रियः पुत्रात्पिण्डः पिण्डात्तथेन्द्रियम् ।*
*इन्द्रियाच्च प्रियः प्राणः प्राणादात्मा परः प्रियः ॥*
अर्थात् — धन से पुत्र अधिक प्रिय है, पुत्र से अपना शरीर अधिक प्रिय है, शरीर से इन्द्रियाँ अधिक प्रिय हैं, इन्द्रियों से प्राण अधिक प्रिय हैं और प्राण से भी आत्मा परम प्रिय है । दशरथ के लिए राम केवल पुत्र नहीं थे; राम उनके प्राण थे । राम उनके जीवन थे । राम उनकी आत्मा के समान प्रिय थे । इसीलिए धन माँगना सरल था, कोष माँगना सरल था, सेना माँगना सरल था; लेकिन जब विश्वामित्र ने कहा —“राम मुझे दे दीजिए”, तो दशरथ को लगा मानो किसी ने उनका अपना जीवन ही माँग लिया हो ।
शास्त्र कहता है — *'प्राणादात्मा परः प्रियः।'* प्राण से भी आत्मा अधिक प्रिय है । दशरथ के लिए राम उसी आत्मा के समान प्रिय थे, इसलिए वे बार-बार कह रहे थे — “और कुछ माँग लीजिए, राम मत माँगिए ।” इसी प्रसंग को समझने के लिए इन्द्रियों और प्राण का वह सुंदर उपाख्यान स्मरण आता है । एक बार शरीर की सभी इन्द्रियों में विवाद हो गया — “हममें सबसे बड़ा कौन है ?” आँख ने कहा — “मैं बड़ी हूँ, मेरे बिना संसार दिखाई नहीं देगा ।” कान ने कहा — “मैं बड़ा हूँ, मेरे बिना सुनोगे कैसे ?”
वाणी ने कहा — “मेरे बिना अपनी बात कैसे कहोगे ?” मन ने भी अपनी श्रेष्ठता बताई । फिर निर्णय हुआ—एक-एक करके सब शरीर से अलग होकर देखें । आँख चली गई- शरीर जीवित रहा । कान गया-शरीर जीवित रहा । वाणी चली गई—शरीर जीवित रहा । लेकिन जब प्राण उठकर जाने लगे, तब सारी इन्द्रियाँ घबरा उठीं । सबने कहा -“आप मत जाइए! आपके जाने पर तो हममें से कोई भी टिक नहीं पाएगा ।” जैसे किसी बड़े भवन में पंखा खराब हो जाए तो काम चल सकता है, एक कंप्यूटर बंद हो जाए तो काम चल सकता है, एक बल्ब बुझ जाए तो भी व्यवस्था चलती रहती है; परन्तु यदि मुख्य बिजली ही चली जाए, तो सब उपकरण एक साथ निष्क्रिय हो जाते हैं । इसी प्रकार — “इन्द्रियाँ उपकरण हैं, प्राण उनकी शक्ति है ।” और दशरथ के लिए राम उसी प्राण से भी बढ़कर थे । इसीलिए राम को देने की बात सुनते ही उनका समस्त राजसी वैभव गौण हो गया । उनका हृदय केवल इतना कह रहा था — “मुनिवर! संसार की कोई दूसरी वस्तु माँग लीजिए, लेकिन मेरे राम मत माँगिए ।”
दीर्घ प्रतीक्षा और तप के पश्चात् प्राप्त वस्तु का प्रेम सामान्य नहीं होता । दशरथ ने वर्षों तक संतान की कामना की थी । पुत्रेष्टि यज्ञ के पश्चात् उन्हें राम प्राप्त हुए । ऐसे राम को अचानक अपने से दूर भेज देना उनके लिए सहज कैसे होता ? पर यहीं राजसभा में गुरु वसिष्ठ का विवेक सामने आता है । जहाँ पिता का वात्सल्य निर्णय को रोक रहा था, वहाँ गुरु ने धर्म का निर्णय सुनाया ।
यहीं गुरु की आवश्यकता समझ में आती है । हमारी आँखें पूरा संसार देख सकती हैं, लेकिन कई बार अपना मोह नहीं देख पातीं । हमारी बुद्धि दूसरों को समझा सकती है, पर अपनी आसक्ति के सामने असहाय हो जाती है । तभी जीवन में गुरु की आवश्यकता होती है— जो वहाँ सत्य दिखाए जहाँ हमारा अपना मन निर्णय करने में असमर्थ हो जाए ।
श्रीमद्भागवत का वचन है —
*आचार्यं मां विजानीयान्नावमन्येत कर्हिचित् ।*
*न मर्त्यबुद्ध्यासूयेत सर्वदेवमयो गुरुः ॥*
भगवान् कहते हैं — “आचार्य को मेरा ही स्वरूप जानो; उनमें कभी सामान्य मनुष्य की बुद्धि मत करो । गुरु सर्वदेवमय हैं ।”
दशरथ के सामने उस समय दो आवाजें थीं — एक पिता के हृदय की — “राम मेरे हैं ।” और दूसरी गुरु के विवेक की —“राम केवल तुम्हारे नहीं हैं । राम का सामर्थ्य धर्म और लोकमंगल के लिए है ।” गुरु का काम हमारी प्रिय वस्तु को हमसे छीनना नहीं है । गुरु हमारी दृष्टि को बड़ा करता है । हम जहाँ केवल अपना छोटा-सा हित देख रहे होते हैं, गुरु वहाँ विशाल भविष्य देख रहा होता है । आज माता-पिता अपने बच्चे को देखकर कहते हैं — “यह हमारा बच्चा है ।” गुरु कहता है —“हाँ, आपका है; लेकिन इसे इतना योग्य बनाइए कि एक दिन समाज भी कहे—यह हमारा है ।” यही विश्वामित्र का संदेश था । राम यदि केवल राजमहल में सुरक्षित रहते, तो उनकी शक्ति का विस्तार कैसे होता ? ताड़का-वध कैसे होता ? ऋषियों के यज्ञों की रक्षा कैसे होती ? अहल्या-उद्धार का प्रसंग कैसे आता ? मिथिला तक यात्रा कैसे होती ? जनकपुरी में सीता-स्वयंवर तक राम कैसे पहुँचते ? कई बार जीवन की अगली मंजिल सुरक्षा की सीमा से बाहर होती है। दशरथ राम को अपने पास रखना चाहते थे ।
विश्वामित्र उन्हें आगे ले जाना चाहते थे । एक ओर पिता का वात्सल्य था, दूसरी ओर धर्म का विराट उद्देश्य । श्रीमद्भागवत में एक अत्यन्त सुंदर पद आता है — गुरुदेवतात्मा । अर्थात् - साधक गुरु को देवता और आत्मा के समान मानकर भगवान् की ओर अग्रसर हो ।
*भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्याद्, ईशादपेतस्य विपर्ययोऽस्मृतिः ।*
*तन्माययातो बुध आभजेत्तं, भक्त्यैकयेशं गुरुदेवतात्मा ॥*
दशरथ यदि केवल अपने हृदय की सुनते तो राम का जाना कठिन था, लेकिन जब गुरु वसिष्ठ ने शास्त्र, धर्म और भविष्य—तीनों को सामने रखकर समझाया, तब निर्णय बदल गया । यहीं एक और महान सिद्धान्त सामने आता है —
सत्य का निर्णय भीड़ नहीं करती, ज्ञान करता है *। मनुस्मृति कहती है —*
*एकोऽपि वेदविद् धर्मं यं व्यवस्येद् द्विजोत्तमः।*
*स विज्ञेयः परो धर्मो नाज्ञानामुदितोऽयुतैः ॥*
अर्थात् - एक सच्चा वेदज्ञ विद्वान् शास्त्र के आधार पर जो धर्मनिर्णय करे, वह हजारों अज्ञानियों की बात से अधिक महत्त्वपूर्ण है । और आगे कहा गया —
*अव्रतानाममन्त्राणां जातिमात्रोपजीविनाम् ।*
*सहस्रशः समेतानां परिषत्त्वं न विद्यते ॥*
केवल हजारों लोगों के इकट्ठे हो जाने से कोई सभा धर्मनिर्णायक नहीं बन जाती । वहाँ ज्ञान, आचरण और शास्त्रदृष्टि चाहिए।
प्रवचन की भाषा में कहें — “हजार बुझी हुई बत्तियाँ मिल जाएँ, तब भी प्रकाश नहीं होगा; एक जलता हुआ दीपक पर्याप्त है अंधकार मिटाने के लिए ।” दशरथ के मन में राम को न भेजने के अनेक कारण थे; पर गुरु वसिष्ठ का एक शास्त्रसम्मत निर्णय उन सब पर भारी पड़ा ।मनुष्य की श्रेष्ठता के विषय में भी शास्त्र कहता है —
*भूतानां प्राणिनः श्रेष्ठाः प्राणिनां बुद्धिजीविनः ।*
*बुद्धिमत्सु नराः श्रेष्ठा नरेषु ब्राह्मणाः स्मृताः ॥*
जड़ से प्राणी श्रेष्ठ, प्राणियों में बुद्धियुक्त श्रेष्ठ और बुद्धिमानों में विवेकशील मनुष्य श्रेष्ठ । परंतु बुद्धि की वास्तविक श्रेष्ठता तब दिखाई देती है जब मनुष्य अपने छोटे हित से ऊपर उठकर बड़े हित को स्वीकार करता है । विश्वामित्र राम के शौर्य को समाज के लिए माँग रहे थे । यहीं से युवाओं के लिए रामकथा का महान संदेश निकलता है — “प्रतिभा का सर्वोच्च उपयोग परोपकार है ।”
केवल शक्तिशाली होना महानता नहीं । अपनी शक्ति से किसी निर्बल की रक्षा करना महानता है । केवल ज्ञानी होना महानता नहीं । अपने ज्ञान से किसी का अज्ञान दूर करना महानता है । केवल सम्पन्न होना महानता नहीं। अपनी सम्पन्नता से किसी अभावग्रस्त का जीवन सँवारना महानता है । नदी तभी महान है जब उसका जल खेतों तक पहुँचे । वृक्ष तभी उपयोगी है जब उसकी छाया किसी थके हुए यात्री को मिले । दीपक तभी सार्थक है जब उसका प्रकाश किसी दूसरे के अंधकार को दूर करे ।
और मनुष्य का सामर्थ्य भी तभी धन्य है जब उससे किसी दूसरे का कल्याण हो । अंततः गुरु वसिष्ठ ने दशरथ को समझाया कि महर्षि विश्वामित्र कोई सामान्य व्यक्ति नहीं हैं । उनके साथ राम का अहित नहीं हो सकता। राम उनके संरक्षण में रहेंगे और उनके जीवन का एक नया अध्याय प्रारम्भ होगा । दशरथ ने गुरु-वचन स्वीकार किया । राम विश्वामित्र के साथ चल पड़े । और यहीं से राम के जीवन की दिशा बदलने लगी । जिस राम को दशरथ अपने से क्षणभर दूर नहीं करना चाहते थे, वही राम अब अयोध्या की सीमा से बाहर निकलकर लोकमंगल की यात्रा पर जा रहे थे । इसीलिए यह प्रसंग केवल पिता-पुत्र के वियोग का प्रसंग नहीं है । यह है — मोह से कर्तव्य की यात्रा । घर से विश्व की यात्रा । व्यक्तिगत प्रेम से लोककल्याण की यात्रा ।
और राजकुमार राम के मर्यादा पुरुषोत्तम बनने की यात्रा । केनोपनिषद् की वाणी भी मानो इसी व्यापक दृष्टि की ओर संकेत करती है —
*'इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति, न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः ।*
*भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः, प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥*
विवेकी पुरुष सभी प्राणियों में उसी एक आत्मतत्त्व का दर्शन करता है । जब सभी में उसी आत्मा का दर्शन होने लगता है, तब परोपकार कोई अतिरिक्त कार्य नहीं रह जाता— वह स्वाभाविक हो जाता है । लोकभाषा में भी कहा गया —
*“आए एक ही घाट से, उतरे एक ही घाट ।*
*बाहर की हवा लगी, हो गए बारह बाट ॥”*
नाम अलग हैं, रूप अलग हैं, संबंध अलग हैं, लेकिन भीतर चेतना का मूल एक ही है । इसलिए जब मनुष्य “मेरा” से ऊपर उठकर “हमारा” तक पहुँचता है, तभी उसके जीवन में धर्म की व्यापकता आती है । विश्वामित्र की राम-माँग आज भी प्रत्येक परिवार और प्रत्येक युवा से प्रश्न करती है —“तुम्हारे भीतर जो सामर्थ्य है, वह केवल तुम्हारा है या उसमें समाज का भी अधिकार है ?” सच्चा वात्सल्य केवल सुरक्षा नहीं देता — संस्कार और साहस भी देता है । सच्चा गुरु केवल उपदेश नहीं देता—वह जीवन की दिशा निर्धारित करता है । और सच्चा युवा केवल अपना भविष्य नहीं बनाता — वह अपने पुरुषार्थ से समाज का भविष्य भी उज्ज्वल करता है ।
आज की कथा कथा के समापन में पूज्य महाराजश्री जगद्गुरु शंकराचार्य जी महाराज ने अपने उपदेश में कहा कि - अयोध्या के राजदरबार का वह दृश्य आज भी जीवित है । एक ओर दशरथ कह रहे हैं —“राम मेरे हैं ।” दूसरी ओर विश्वामित्र का मौन संदेश है — “राम लोकमंगल के लिए हैं ।” और बीच में गुरु वसिष्ठ धर्म का निर्णय दे रहे हैं । अंततः दशरथ समझ गए -
जिसे हम प्रेम के कारण अपने पास रोकना चाहते हैं, कभी-कभी उसी को उसके महान उद्देश्य के लिए आगे भेजना पड़ता है ।और राम चल पड़े । राजमहल से वन की ओर नहीं — व्यक्तिगत जीवन से विश्वकल्याण की ओर । यही इस प्रसंग का अमर संदेश है — “सामर्थ्य अपने लिए नहीं, समाज के लिए; ज्ञान प्रदर्शन के लिए नहीं, दिशा देने के लिए; और जीवन केवल जीने के लिए नहीं—किसी के काम आने के लिए है ।”