
#एक_वोट_से_77_तक… बिसाऊ में निर्दलीयों का ‘सियासी सूखा’!
25 प्रत्याशियों की जमानत जब्त, किसी को 1 तो किसी को मिले सिर्फ 4 वोट; 93 मतदाताओं ने NOTA दबाकर सभी को नकारा
बिसाऊ। नगरपालिका चुनाव का परिणाम सिर्फ हार-जीत की कहानी नहीं है, बल्कि कई निर्दलीय प्रत्याशियों के लिए ऐसा सियासी झटका है, जिसे वे शायद लंबे समय तक नहीं भूल पाएंगे। चुनाव मैदान में उतरकर जनता का विश्वास जीतने निकले 25 निर्दलीय प्रत्याशी ऐसे भी रहे, जिन्हें अपने वार्ड के मतदाताओं से इतने कम वोट मिले कि उनकी जमानत तक नहीं बच सकी। किसी के खाते में सिर्फ एक वोट आया तो किसी को चार वोट मिले। किसी प्रत्याशी का आंकड़ा 10 पर अटक गया तो कोई 77 वोट तक पहुंचकर भी जमानत नहीं बचा पाया। वहीं 93 मतदाताओं ने किसी भी प्रत्याशी को पसंद नहीं किया और NOTA का बटन दबाकर अपनी नाराजगी दर्ज कराई।
सिर्फ एक वोट… और पूरी चुनावी कहानी!
सबसे ज्यादा चौंकाने वाला मामला वार्ड 4 का रहा। यहां निर्दलीय प्रत्याशी अशोक कुमार भार्गव को महज एक वोट मिला। यानी जिस चुनाव में प्रत्याशी अपने लिए जनसमर्थन जुटाने के लिए घर-घर पहुंचे, उसी चुनाव में उनके पक्ष में सिर्फ एक मतदाता खड़ा दिखाई दिया। वार्ड 15 के विशाल और वार्ड 3 की सरिता देवी को सिर्फ 4-4 वोट मिले। वार्ड 8 के अशोक कुमार जांगिड़ को 7 वोट मिले। वार्ड 1 की मंजू, वार्ड 10 के मनीष सैनी, वार्ड 23 के पिंटू चौहान और वार्ड 24 की विजय लक्ष्मी के खाते में 10-10 वोट आए।
दहाई पार हुई… लेकिन जमानत फिर भी नहीं बची
वार्ड 6 के अब्दुल सलाम को 12 वोट, वार्ड 20 के दुर्गा प्रसाद मास्टर को 17 और रवि को 18 वोट मिले। वार्ड 17 की रेणु स्वामी और वार्ड 4 के इमरान को 33-33 वोट मिले। वार्ड 25 में महमूद को 29, अबू बकर को 57 और साबिर को 77 वोट मिले। लेकिन ये वोट भी उनकी जमानत बचाने के लिए पर्याप्त साबित नहीं हुए। इन प्रत्याशियों के साथ सात अन्य निर्दलीय प्रत्याशी भी जमानत नहीं बचा सके।
93 वोटों का NOTA… आखिर किससे नाराज थे मतदाता?
इस चुनाव का एक और आंकड़ा राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय है। 93 मतदाताओं ने NOTA का विकल्प चुना। यानी उन्होंने उपलब्ध प्रत्याशियों में से किसी को भी अपना प्रतिनिधि मानने से इनकार कर दिया। एक तरफ 25 निर्दलीयों की जमानत जब्त हुई, दूसरी तरफ 93 मतदाताओं ने NOTA दबाया। चुनाव परिणामों के ये आंकड़े बिसाऊ की राजनीति में एक गहरा संदेश छोड़ गए हैं—सिर्फ चुनाव लड़ना आसान हो सकता है, लेकिन जनता के दिल में जगह बनाना अब भी सबसे बड़ी चुनौती है।
नतीजा हार का नहीं, जनमत का आईना है
इन परिणामों ने साफ कर दिया कि चुनाव का मैदान सिर्फ नामांकन से नहीं जीता जाता। जनता का भरोसा, संगठन, संपर्क और वर्षों की सामाजिक पकड़ ही आखिरकार ईवीएम में वोट बनकर सामने आती है। किसी के हिस्से में सिर्फ एक वोट आया… किसी को चार वोट मिले… और किसी को 77 लेकिन संदेश एक ही था—जनता ने जिसे स्वीकार नहीं किया, उसे सत्ता की चौखट तक पहुंचने का मौका नहीं दिया।
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