“कुर्सी प्रेमियों का कृषि प्रधान देश है भारत।”
- हरिशंकर परसाई
व्यंग्य छोटा है, लेकिन सवाल बहुत बड़ा है। देश को कृषि प्रधान कहा जाता है, किसान को अन्नदाता कहा जाता है, लेकिन जब किसान की असली समस्याओं की बात आती है तो व्यवस्था अक्सर कुर्सी, फाइल और आंकड़ों के बीच कहीं खो जाती है।
किसान खेत में धूप, बारिश और मौसम की मार झेलकर अन्न पैदा करता है। उसकी लागत बढ़ती है, खाद के लिए लाइन लगती है, कभी बीज महंगा मिलता है, कभी बाजार में फसल का उचित दाम नहीं मिलता। लेकिन किसान की समस्या पर चर्चा अक्सर तब होती है जब वह सड़क पर उतरता है।
विडंबना यह है कि किसान को अपनी बात सुनाने के लिए आंदोलन करना पड़ता है। सवाल यह होना चाहिए कि अगर सरकार और प्रशासन की व्यवस्था किसानों की समस्याओं को पहले ही समझ ले, तो किसान को आंदोलन की नौबत ही क्यों आए?
कृषि प्रधान देश की पहचान सिर्फ इस बात से नहीं होनी चाहिए कि यहां कितने किसान हैं या कितनी कृषि भूमि है। असली पहचान यह होनी चाहिए कि किसान की आय, उसकी लागत, उसकी फसल का मूल्य और उसकी मेहनत को व्यवस्था कितनी गंभीरता से समझती है।
परसाई जी का यह व्यंग्य आज भी इसलिए चुभता है, क्योंकि सवाल सिर्फ कुर्सी का नहीं है। सवाल उस सोच का है जिसमें कुर्सी बचाना प्राथमिकता बन जाए और किसान की समस्या बाद की बात।
किसान को भाषण नहीं, ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें खाद निर्धारित कीमत पर मिले, फसल का उचित बाजार मिले, बिचौलियों पर नियंत्रण हो, सिंचाई और बिजली की सुविधा मिले और प्राकृतिक आपदा में राहत समय पर पहुंचे।
कुर्सी पर बैठने वाले बदलते रहेंगे, लेकिन खेत में किसान वही रहेगा। इसलिए सत्ता की कुर्सी से ज्यादा महत्वपूर्ण उस किसान की स्थिति होनी चाहिए, जिसके खेत से देश की रसोई चलती है।
कृषि प्रधान देश में किसान अगर अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष करने को मजबूर है, तो सवाल किसान से नहीं, व्यवस्था से पूछा जाना चाहिए।
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