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अल्मोड़ा के रवि टम्टा ने बनाया उड़ने वाला वाहन, हुनर की तारीफ के बजाय ट्रोलिंग क्यों? देव चौधरी | (ब्यूरो चीफ लक्ष्य इंडिया न्यूज़)पत्रकार की कलम से कभी-कभी सोशल मीडिया हमें यह सोचने पर मजबूर कर देता है कि आखिर हमारा देश तरक्की की राह पर इतनी तेजी से क्यों नहीं बढ़ पा रहा है। हाल ही में मैंने अल्मोड़ा के युवा रवि टम्टा की कहानी कवर की। यह सिर्फ उत्तराखंड की नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए गर्व की बात है। गांव से निकलकर सीमित संसाधनों में एक युवा ने उड़ने वाले वाहन का निर्माण किया और उसका सफल परीक्षण किया। खास बात यह है कि रवि टम्टा ने किसी बड़े IIT या प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान से औपचारिक वैज्ञानिक शिक्षा हासिल नहीं की, बल्कि इंटरनेट और अपने जुनून को ही अपनी प्रयोगशाला बनाया। लेकिन इस खबर के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर कुछ ऐसी टिप्पणियां भी देखने को मिलीं, जिन्हें पढ़कर दुख भी हुआ और गुस्सा भी। कोई कह रहा है—“ये तो ड्रोन है।” कोई लिख रहा है—“इसमें बड़ी बात क्या है?” तो कोई इसे “कॉपी” बता रहा है। सवाल यह है कि अगर यह कॉपी है, तो आप भी कॉपी करके दिखाइए ना! दुनिया में इतनी तकनीक मौजूद है, इतनी मशीनें और उपकरण हैं। अगर नकल करना इतना ही आसान है तो विदेशों से अरबों रुपये खर्च करके चीजें खरीदने की जरूरत ही क्या है? आप कॉपी करके देश में ही बनाइए। उड़ने वाली कार छोड़िए... कम से कम अपने घर में एक ऐसा टीवी रिमोट ही बनाकर दिखा दीजिए, जो आपने खुद तैयार किया हो। क्योंकि हकीकत यह है कि नकल करने के लिए भी अकल, मेहनत और हुनर की जरूरत होती है। यहां एक बात स्पष्ट करना भी जरूरी है कि रवि टम्टा ने कभी यह दावा नहीं किया कि दुनिया में पहली बार उड़ने वाला वाहन उन्होंने बनाया है। बातचीत में उन्होंने खुद स्वीकार किया कि विदेशों में इस तरह की तकनीक पर पहले से काम हो चुका है। उनका दावा भारत में इस तरह के वाहन के निर्माण और परीक्षण को लेकर है। और रवि की उपलब्धि सिर्फ उड़ने वाले वाहन तक सीमित नहीं है। उन्होंने इससे पहले भी समाज और पर्यावरण के लिए उपयोगी कई नवाचार किए हैं। इनमें वन विभाग के लिए अग्निशमन यंत्र, दिव्यांगों के लिए सहायक छड़ी, पाइन नीडल से संबंधित मशीन और इलेक्ट्रिक वाहन को कम समय में चार्ज करने वाली इलेक्ट्रोलाइट पंप मशीन जैसे प्रयोग शामिल हैं। सोचिए... जहां कई युवा सिर्फ संसाधनों की कमी का रोना रोते हैं, वहीं अल्मोड़ा का यह युवा सीमित साधनों के बावजूद कुछ नया करने की कोशिश कर रहा है। हो सकता है उनका आविष्कार अभी पूर्ण व्यावसायिक उत्पाद न हो। हो सकता है इसमें सुधार की गुंजाइश हो। हो सकता है तकनीकी विशेषज्ञ इसके कई पहलुओं पर सवाल उठाएं। लेकिन किसी प्रयास को शुरुआत में ही मजाक बना देना क्या सही है? आलोचना जरूर कीजिए, सवाल जरूर पूछिए, तकनीकी कमियां जरूर बताइए—लेकिन किसी के वर्षों के परिश्रम और जुनून का मजाक उड़ाना हमारी सोच पर सवाल खड़ा करता है। रवि टम्टा, उनका परिवार और उनके करीबी लोग ही जानते हैं कि इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्होंने कितनी मेहनत की होगी। हमें ऐसे युवाओं का मजाक नहीं, उनका हौसला बढ़ाना चाहिए। क्योंकि देश सिर्फ बड़ी-बड़ी प्रयोगशालाओं से नहीं बनता, कभी-कभी किसी गांव के छोटे से कमरे में बैठा एक जुनूनी युवा भी भविष्य की नई राह दिखा सकता है। रवि टम्टा को सलाम। उनके जज्बे को सलाम। और उन सभी युवाओं को सलाम, जो संसाधनों की कमी के बावजूद कुछ नया करने का सपना देखते हैं। ईश्वर से बस यही प्रार्थना है कि हमारे समाज को इतनी सद्बुद्धि जरूर दें कि हम किसी की उपलब्धि को नीचा दिखाने से पहले उसके संघर्ष को समझने की कोशिश करें। पत्रकार देव चौधरी की कलम से—आप इस विषय पर क्या सोचते हैं? अपनी राय कमेंट में जरूर दें। अगर आपको लगता है कि ऐसे प्रयासों को प्रोत्साहन मिलना चाहिए, तो इस पोस्ट को आगे शेयर जरूर करें। धन्यवाद। 🙏 #lakshayaindianewsfollowers #पत्रकार_की_कलम_से #DevChoudhary #RaviTamta #Almora #Uttarakhand #Inspiration #Innovation #ViralPost #viralreels - Gaunchi News