
जलेबी कहां खो गई? राष्ट्रीय पर्व की मिठास पर एक सवाल
✍️ पवन कुमार बरनवाल, पत्रकार
एक समय था जब 15 अगस्त और 26 जनवरी केवल तिरंगा फहराने, राष्ट्रगान गाने और देशभक्ति के कार्यक्रमों तक सीमित नहीं थे। इन पर्वों से जुड़ी कुछ छोटी-छोटी परंपराएं भी थीं, जो बच्चों के मन में इन दिनों को हमेशा के लिए यादगार बना देती थीं।
उनमें से एक थी—जलेबी। 🍥🇮🇳
झंडोत्तोलन के बाद बच्चों की निगाहें अक्सर मिठाई की ओर होती थीं। कहीं गरमा-गरम जलेबी मिलती थी, कहीं बूंदी या लड्डू। मिठाई छोटी थी, लेकिन बच्चों की खुशी बहुत बड़ी होती थी।
आज सवाल यह नहीं है कि जलेबी ही क्यों बांटी जाए?
सवाल यह है कि राष्ट्रीय पर्व से जुड़ी वह सहज खुशी और अपनापन धीरे-धीरे कम क्यों होता जा रहा है?
जलेबी को आम तौर पर भारत की राष्ट्रीय मिठाई कहा जाता है, हालांकि सरकार ने इसे आधिकारिक राष्ट्रीय मिठाई का दर्जा नहीं दिया है। फिर भी यह मिठाई देश के अलग-अलग हिस्सों में बेहद लोकप्रिय है और स्वतंत्रता दिवस जैसे अवसरों से इसकी एक मजबूत सांस्कृतिक याद जुड़ी हुई है।
आज कई जगह राष्ट्रीय पर्व पर कार्यक्रम तो भव्य होते हैं, लेकिन बच्चों के हाथ में वह छोटी-सी मिठाई नजर नहीं आती, जो कभी पूरे आयोजन की सबसे बड़ी खुशी हुआ करती थी।
इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं—महंगाई, बजट, प्रशासनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य संबंधी सोच, साफ-सफाई और खाद्य वितरण की बदलती व्यवस्था। कुछ जगहों पर जलेबी की जगह लड्डू, हलवा या खीर जैसे विकल्प भी दिए जा रहे हैं। यानी मिठाई की परंपरा पूरी तरह खत्म नहीं हुई, लेकिन उसका स्वरूप जरूर बदल रहा है।
लेकिन क्या विकास और व्यवस्था के बीच हम बच्चों की छोटी-छोटी खुशियों को भी भूलते जा रहे हैं?
एक गरमा-गरम जलेबी किसी बच्चे के जीवन की बहुत बड़ी जरूरत नहीं है।
लेकिन वही जलेबी उसके लिए 15 अगस्त की एक याद बन सकती है।
कई साल बाद जब वह बच्चा बड़ा होगा तो शायद उसे भाषण की एक-एक पंक्ति याद न रहे, लेकिन यह जरूर याद रह सकता है कि—
“15 अगस्त को झंडा फहराने के बाद हमें गरमा-गरम जलेबी मिली थी…”
और शायद यही तो राष्ट्रीय पर्वों की खूबसूरती है—
इतिहास हमें देश से जोड़ता है और यादें उस देश से हमारा रिश्ता मजबूत करती हैं।
इसलिए सवाल जलेबी का नहीं,
उस मिठास का है जो हमारी राष्ट्रीय पर्वों की परंपराओं में कभी हुआ करती थी।
आप बताइए—
आपके बचपन में 15 अगस्त या 26 जनवरी पर क्या जलेबी मिलती थी? और आज आपके आसपास यह परंपरा बची है या खत्म हो गई?
👇 अपनी याद और राय जरूर लिखिए।
— पवन कुमार बरनवाल, पत्रकार
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