
मांदर को मिला जीआई टैग, झारखंड की लोकसंस्कृति को मिली नई पहचान; कुड़मी समाज में भी खुशी
रांची। झारखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति और पारंपरिक विरासत से जुड़े वाद्य यंत्र मांदर को जीआई टैग मिलने से राज्य की सांस्कृतिक पहचान को नई मजबूती मिली है। मांदर झारखंड के आदिवासी और कुड़मी समेत विभिन्न समुदायों के पर्व-त्योहारों, लोकनृत्य और पारंपरिक आयोजनों का अभिन्न हिस्सा रहा है।
कुड़मी समाज में भी मांदर का विशेष सांस्कृतिक महत्व है। करम, टुसू, बांदना सहित विभिन्न पारंपरिक पर्व-त्योहारों और सामाजिक आयोजनों में मांदर की थाप पर लोग पारंपरिक नृत्य करते हैं। कुड़मी समाज की सांस्कृतिक परंपराओं और लोकगीतों में भी मांदर की अहम भूमिका रही है।
मांदर को जीआई टैग मिलने से इसके पारंपरिक निर्माण, विशिष्ट बनावट और क्षेत्रीय पहचान को संरक्षण देने में मदद मिलने की उम्मीद है। साथ ही, मांदर बनाने वाले स्थानीय कारीगरों को अपनी कला और उत्पाद के लिए व्यापक पहचान मिलने का रास्ता भी मजबूत होगा।
झारखंड की सांस्कृतिक विविधता में मांदर की थाप अलग-अलग समुदायों को जोड़ने का काम करती है। कुड़मी समाज सहित राज्य के विभिन्न समुदायों के लोकजीवन में इसकी मौजूदगी झारखंड की साझा सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती है।
जीआई टैग की मान्यता से पारंपरिक वाद्य यंत्रों के संरक्षण, स्थानीय हस्तशिल्प को बढ़ावा देने और झारखंड की लोकसंस्कृति को देश-दुनिया तक पहुंचाने की संभावनाएं बढ़ेंगी।
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