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दुल्हिन बाजार में बदहाल पड़ी दस नम्बर नहर: धान रोपाई पर संकट, किसान बोले- उड़ाही नहीं हुई तो बर्बाद होगी फसल पटना जिला के दुल्हिन बाजार प्रखंड की दस नम्बर नहर कभी धान की लहलहाती फसलों के लिए पहचान रखने वाली आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है। उलार, ऐनखां, अलीपुर हरपुरा, मोकिमपुर होते हुए आलमपुर तक जाने वाली यह नहर वर्षों से उड़ाही के अभाव में मिट्टी, गाद और जंगली पौधों से पट चुकी है। नतीजा यह है कि नहरी क्षेत्र होने के बावजूद किसानों के खेतों तक पानी नहीं पहुंच रहा है और धान की रोपाई बुरी तरह प्रभावित हो गई है। जिन किसानों के पास बिजली और मोटर पंप की सुविधा है, वे किसी तरह महंगा खर्च उठाकर खेतों में पानी पहुंचा रहे हैं। लेकिन बड़ी संख्या में ऐसे किसान हैं, जिनकी पूरी खेती नहर के पानी पर निर्भर है। वे अब केवल बारिश का इंतजार कर रहे हैं। मोकिमपुर के किसान रामनरेश, कृष्णा प्रसाद और दिनेश कुमार बताते हैं कि वर्षों से नहर में पानी नहीं आया। स्थानीय लोगों द्वारा नहर में कचरा फेंकने, गाद भर जाने और जंगली पौधों के फैलाव ने इसकी जलधारा पूरी तरह रोक दी है। समस्या केवल उड़ाही तक सीमित नहीं है। नहर पर बनी कई पुरानी पुलियाओं का हिस्सा टूटकर मलबे के रूप में नहर में गिर गया है, जिससे पानी का प्रवाह और बाधित हो गया है। किसानों का आरोप है कि जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा के कारण यह स्थिति विकराल हुई है। उनका कहना है कि नहर के मुख्य स्रोत ऐनखां और हरपुरा में पहले उड़ाही होनी चाहिए थी, लेकिन इसके बजाय अंतिम छोर मोकिमपुर में खानापूर्ति कर दी गई, जिससे किसानों को कोई वास्तविक लाभ मिलता नजर नहीं आ रहा है। हरपुरा निवासी राजेश राय कहते हैं कि समय पर नहर की सफाई नहीं होने से उपजाऊ खेत भी बंजर बनने लगे हैं। वहीं किसान सुभाष चंद्र बताते हैं कि महंगे दाम पर पानी खरीदकर धान की नर्सरी तो तैयार कर ली, लेकिन रोपाई के लिए आवश्यक पानी जुटाना अब असंभव होता जा रहा है। यदि जल्द बारिश नहीं हुई या नहर में पानी नहीं छोड़ा गया, तो हजारों रुपये की लागत डूब जाएगी। ऊपर से बच्चों की पढ़ाई और परिवार के खर्च ने किसानों की चिंता और बढ़ा दी है। गुरुवार को दिनभर आसमान में काले बादल छाए रहे, लेकिन बारिश नहीं हुई। मायूस किसान टकटकी लगाए आसमान और सूखी नहर दोनों को निहारते रहे। किसानों ने जिला प्रशासन और सिंचाई विभाग से तत्काल नहर की व्यापक उड़ाही, अवैध अतिक्रमण हटाने, क्षतिग्रस्त पुलियाओं की मरम्मत तथा नियमित जलापूर्ति सुनिश्चित करने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि अब भी व्यवस्था नहीं चेती, तो कभी "धान का कटोरा" कहलाने वाला यह इलाका खेती के गंभीर संकट का प्रतीक बन जाएगा।