
कभी जिस परिवार के नाम से दिल्ली के लाल किले और मुगल सल्तनत का इतिहास जुड़ा था, उसी खानदान की बहू आज हावड़ा की एक गरीब बस्ती में किराए के छोटे से घर में जिंदगी गुजार रही हैं। रजिया सुल्ताना बेगम खुद को मुगल सल्तनत के आखिरी बादशाह बहादुर शाह जफर के पड़पोते मिर्जा बेदार बख्त की पत्नी बताती हैं।
रजिया के मुताबिक, 15 अगस्त 1965 को महज 12 साल की उम्र में उनकी शादी बेदार बख्त से हुई थी। शादी के समय बेदार कोई नौकरी नहीं करते थे और उन्हें करीब 250 रुपए की पेंशन मिलती थी। घर में शाही ठाठ की यादें जरूर थीं, लेकिन आमदनी बेहद सीमित थी।
शादी के बाद दो बच्चे हुए तो खर्च बढ़ गया। पति को रोज गोश्त और अच्छे चावल पसंद थे। घर चलाने के लिए रजिया ने जिल्द बांधने, लाख की चूड़ियां बनाने, पेन के सॉकेट लगाने और दूसरी छोटी-मोटी मजदूरी का काम शुरू किया।
पति की बीमारी और फिर मौ'त के बाद हालात और मुश्किल हो गए। रजिया बताती हैं कि उन्होंने अपने बच्चों को कई बार पानी के साथ ब्रेड डुबोकर खिलाई, लेकिन किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया। कभी चाय की दुकान लगाई, कभी मोती पिरोए और कभी साड़ियों का काम करके परिवार चलाया।
आज उन्हें करीब 6 हजार रुपए की पेंशन मिलती है, जिसमें से 2500 रुपए किराए में चले जाते हैं। रजिया का कहना है कि वह मुगल खानदान की बहू होते हुए भी लाल किले में टिकट लेकर जाती हैं।
उनकी सबसे बड़ी मांग है कि बहादुर शाह जफर के परिवार से जुड़ी संपत्ति और इतिहास को सरकार याद करे। वह कहती हैं, “न हमारे पास जायदाद है, न शाही पेंशन और न रहने को अपना घर। बस इतनी इच्छा है कि जिंदगी के आखिरी दिनों में अपना एक ठिकाना मिल जाए।”