
अगर आपकी धान पीली पड़ रही है तो इसे जरूर पढ़े ।पूरा उपचार बताया है कृषि डाक्टर ने
धान फसल में रोग एवं कीट व्याधि प्रबंधन पर समसामयिकी सलाह
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वर्तमान समय में जिले में धान की फसल में कीट व्याधि से बचाव के लिए कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिक डॉ. आर.के. जायसवाल एवं डॉ. रणविजय प्रताप सिंह द्वारा लक्षण अनुसार किसानों को प्रबंधन की सलाह दी गई है। जारी सलाह में बताया गया है कि धान में पत्ती लपेटक एवं तना छेदक कीट का प्रकोप हो रहा है। पत्ती लपेटक कीट पत्तियों को मोड़कर अंदर ही अंदर उनके द्वारा हरा पदार्थ खुरचकर खाता है, जिससे पौधे में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया प्रभावित होती है और पैदावार में भारी कमी आती है। तना छेदक कीट की इल्ली तने के निचले हिस्से में छेद करके अंदर प्रवेश करती है और अंदरूनी हिस्से को खा जाती है। इसके कारण पौधे का मुख्य भाग सूखकर पीला पड़ जाता है। इस सूखी हुई गोभ को खींचने पर यह आसानी से बाहर आ जाती है। जब तना छेदक कीट का आक्रमण बालियां बनने की अवस्था में होता है तब तना कट जाने के कारण बालियों में दाने नहीं बनते और बालियां पूरी तरह से सफेद, हल्की और सीधी खड़ी रह जाती हैं। इन दोनों कीट के नियंत्रण के लिए क्लोरएन्ट्रानीलीप्रोल (18.5 प्रतिशत एससी) 60 मिली या फ्लूबेन्डिमाईड (39.35 प्रतिशत एससी) 50 मिली या कार्टाप हाईड्रोक्लोराईड (50 प्रतिशत एससी) 400 ग्राम या इन्डोक्साकार्ब (14.5 प्रतिशत एससी) 200 मिली या प्रोफेनोफास 40 प्रतिशत प्लस साइपरमेथ्रिन 4 प्रतिशत ईसी 250 मिली प्रति एकड़ की दर से 150 से 200 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए।
धान की फसल में बालियां निकलने और दूध भरने की अवस्था में गंधीबग कीट का भी प्रकोप होता है। यह कीट दानों के अंदर मौजूद दूध का रस चूस लेता है और दाने खाली रह जाते हैं। कीट के रस चूसने वाले स्थान पर छोटे भूरे या काले रंग के धब्बे बन जाते हैं और सूखकर सफेद या बदरंग होकर खाली रह जाते हैं। इससे चावल की गुणवत्ता खराब हो जाती है और फसल के उत्पादन में भारी गिरावट आती है। इस कीट के नियंत्रण हेतु थायोमेथाक्जाम (25 प्रतिशत डब्लूजी) 40 ग्राम या इमिडाक्लोप्रिड (17.8 प्रतिशत एसएल) 60 मिली प्रति एकड़ की दर से 150-200 लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।
धान की फसल में बालियां निकलने और दाना भरने की अवस्था में भूरा फूंदका कीट का भी प्रकोप होता है