
एक मासूम चला गया… लेकिन अपने पीछे कई सवाल छोड़ गया।
पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट क्षेत्र के भंडारीगांव में आज शाम करीब 4 बजे एक तेंदुआ 8 साल के मासूम बच्चे को उसके घर के बाहर से उठा ले गया।
वक्त शाम का था…
अंधेरी रात नहीं।
जंगल के भीतर नहीं।
बल्कि अपने घर से कुछ ही कदम की दूरी पर।
परिवार कुछ समझ पाता, उससे पहले तेंदुआ बच्चे को लेकर भाग गया। करीब 200 मीटर दूर बच्चे का शव बरामद हुआ।
सबसे ज्यादा दर्दनाक बात यह है कि गांव ने एक सप्ताह पहले ही खतरे की चेतावनी दे दी थी। ग्राम प्रधान ने तेंदुए की मौजूदगी को लेकर जिलाधिकारी को पत्र लिखकर कार्रवाई की मांग की थी।
एक पत्र लिखा गया था…
मदद की उम्मीद में।
लेकिन उस पत्र पर कार्रवाई होने से पहले ही एक मां की गोद सूनी हो गई।
पहाड़ों में अक्सर यही कहानी दोहराती है—
पहले ग्रामीण खतरे की सूचना देते हैं,
फिर इंतजार होता है,
फिर कोई हादसा होता है,
फिर पिंजरा आता है…
और आखिर में मुआवजे का चेक।
लेकिन एक बच्चे की जिंदगी की कीमत क्या कोई मुआवजा चुका सकता है?
जब खतरे की जानकारी पहले से थी, तो कार्रवाई पहले क्यों नहीं हुई? एक गांव को अपनी बात सुनाने के लिए आखिर कितनी बार पत्र लिखना पड़ेगा? और जब चेतावनी के बावजूद किसी मासूम की जान चली जाए, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
आज एक घर का चिराग बुझ गया है।
एक मां ने अपना लाल खो दिया है।
एक परिवार की दुनिया उजड़ गई है।
उस मासूम के लिए सिर्फ संवेदना नहीं… जवाब भी चाहिए।
ईश्वर दिवंगत मासूम की आत्मा को शांति दे और उसके परिवार को इस असहनीय दुख को सहने की शक्ति प्रदान करे।
ॐ शांति। 🙏