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oraijalauntimes

@oraijalauntimes
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**"आपकी सेवा, हमारा संकल्प"** — यह नारा सुनने में जितना बुलंद है, ज़मीनी हक़ीक़त उतनी ही कड़वी नज़र आती है।

सात साल... दो-दो जाँच... दोनों न्यायालय की कसौटी पर धराशायी... और आख़िरकार परिवाद दर्ज।

वाह! अगर यही "उत्कृष्ट विवेचना" है, तो नाकामी किसे कहेंगे?

इल्ज़ाम लगाना आसान है, मगर सबूत के साथ अदालत में टिकाना ही असली पुलिसिंग है। वरना बेगुनाह को मुल्ज़िम बना देना और फिर अदालत से फटकार खाना, क़ानून की नहीं बल्कि विवेचना की नाकामी कहलाती है।

**शांति, सुरक्षा और न्याय** नारों से नहीं, निष्पक्ष जाँच और जवाबदेही से स्थापित होते हैं।

क्योकि यह विश्व की। सर्वश्रेष्ठ यूपी पुलिस  की  शाखा जालौन पुलिस 

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<nis:link nis:type=tag nis:id=जालौन nis:value=जालौन nis:enabled=true nis:link/> इओरबिन्द्र कुमार
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जिस थाना प्रभारी की नाक नीचे मिश्रित गुटखा स्कूल सामने 10 मीटर दूरी बिक रहा हो 

वह निजी स्वार्थ संरक्षण दिए हो तो न्याय. ? 

प्राथमिक विद्यालय तुलसीनगर कम्पोजिट (पूर्व पांच विद्यालय थे जिसे गधा सकूल नाम से जाना जाता )

कई अबैध कार्यो का  ठेका लिए पुलिस ?
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पोस्ट तो बहाना असली खेल यह 

18 जनबरी 2021 पुन: अग्रिम विवेचना 
इसके बाद 4 अगस्त 2022 विवेचना किता की  सन्तोष दरोगा जी
29 जुलाई 2022 मे ट्रांसफर गोहन हुआ  3 को चार्ज ग्रहण कर लिया । 
अगले दिन एफआर लगा दी 
पूरी केश डायरी मे कटिंग है केश डायरी विभिन्न पेज ऐसे जिनमे कम्यूटर दिनांक सन 2022 की  विवेचक सिगनेचर 2021 के तथा इस्पेक्टर साहाब सिग्नेचर 2020 के जब आदेश ही नही हुआ था केश डायरी 3-4 सीडी अंतिम सादे कागज मे काटी गई और 2021 के बाद 2026 मे इन्ही साहाब के नेतृत्व न्यायालय मे दाखिल हुई ।  पूर्ण हुई विवेचना 11 दिन बाद नवन्तुक उपनिरीक्षक को‌मिली ।  अब न्यायालय किता करनर दो टियां दी 4 अगस्त 2022 तथा दूसरी 13-15 जनबरी 2023 तो उसमे पैरवी न करे इस वजह कुच्रक रचा गया लेकिन अब लिपिक महोदय पांच साल दबाये रहे और अभियोजन राय लेना मुनासिब नही समझा वह जवाब देना पड़ेगा ।

इसके अतिरिक्त अग्निकाण्ड़ घटना के पूर्व दो माह पहले पुलिस आग लगाने की  सूचना 2020 दी थी उसके दो माह बाद आग लगा दी गई ठीक उसी दिन जिस दुकान खुली ।
और आपत्ति‌जनक चीजे जो मिली थी वह दरोगा जी पहले सबूत नष्ट कर दिये।  अगर समय रहते कार्यवाही‌हो जाती तो शायद कुछ बेहतर होता लेकिन दाम करे सब काम‌ 

इस लिए किसी को सुरक्षा थ्रेट है तो भाई अपनी बात रख दी इसमे कोन सी धार्मिक भावनाएं आहत हुई
जो मेडीकल के आगे विवेकानन्द कलौनी मे हुआ था यही इस्पेक्टर साहाब मुकदमा न लिखे । 

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असली दिक्कत यह आदेश और सवाल करना कि पुन: अग्रिम विवेचना आदेश दिनांक 18.01.2021 से 5 बर्षो से कहां रखे रहे और अब सवाल आरटीआई लगाई तो खुन्नस मान गये लाखो रूपये नुकसान हुआ । अभी विवेचको सहित किसी शिकायत भी नही की  थी। मुकदमा न लिखवाते तो कम से कम राजस्व से छति पूर्ति मिल जाती ।

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राष्ट्रीय लोक अदालत को लेकर पांच प्री-ट्रायल बैठकें तय
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उरई। आगामी राष्ट्रीय लोक अदालत 12 सितंबर 2026 की सफलता के लिए जिला विधिक सेवा प्राधिकरण जालौन के निर्देश पर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, जालौन स्थान उरई न्यायालय द्वारा पांच प्री-ट्रायल बैठकें आयोजित किए जाने का आदेश जारी किया गया है।

न्यायालय द्वारा जारी आदेश के अनुसार राष्ट्रीय लोक अदालत में अधिक से अधिक मामलों के निस्तारण तथा पक्षकारों की सहभागिता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से संबंधित मामलों के पक्षकारों को निर्धारित तिथियों पर न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने के लिए निर्देशित किया गया है।

निर्धारित कार्यक्रम के तहत 12 अगस्त, 17 अगस्त, 25 अगस्त, 31 अगस्त तथा 5 सितंबर 2026 को प्री-ट्रायल बैठकें आयोजित होंगी। आदेश में कहा गया है कि संबंधित मामलों के पक्षकार दोपहर 2 बजे से 2:30 बजे के मध्य न्यायालय के समक्ष उपस्थित होकर प्री-ट्रायल बैठक में सहभागिता कर सकते हैं।

न्यायालय ने शमनीय अपराधों से संबंधित मामलों में पक्षकारों की उपस्थिति और आपसी सुलह-समझौते की संभावनाओं को बढ़ावा देने के लिए यह पहल की है। राष्ट्रीय लोक अदालत में मामलों के त्वरित एवं सुलहपूर्ण निस्तारण के लिए प्री-ट्रायल बैठकों को महत्वपूर्ण कड़ी माना जा रहा है।

आदेश की प्रतिलिपि जनपद न्यायाधीश, जालौन स्थान उरई, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण तथा बार संघ जालौन स्थान उरई को आवश्यक सूचना एवं अनुपालन के लिए भेजी गई है।
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सूत्रो से 
पुलिस कार्रवाई पर उठते सवाल: कानून का पालन जरूरी, पर पारदर्शिता और संवेदनशीलता भी उतनी ही महत्वपूर्ण

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यह कुचक्र है 
उरई में हाल के कुछ पुलिस प्रकरणों को लेकर नागरिकों के बीच पुलिस की कार्यप्रणाली, महिलाओं के साथ व्यवहार और कार्रवाई की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इन मामलों में लगाए जा रहे आरोपों की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच आवश्यक है, ताकि वास्तविकता सामने आ सके और किसी भी पक्ष के साथ अन्याय न हो।

आरोप है कि एक महिला, जिसे ब्रजेश शुक्ला के प्रकरण में पहले से थाने पर बैठाए जाने की बात कही जा रही है, को बाद में सह-अभियुक्त बनाकर जेल भेज दिया गया। यह भी आरोप लगाया गया है कि महिला का कथित तौर पर मुख्य कार्य अपने पति के पक्ष में थाने में वीडियो बनाना था। यदि वास्तव में महिला को 24 घंटे से अधिक समय तक थाने में रखा गया था, तो यह महत्वपूर्ण प्रश्न है कि उसे किस कानूनी आधार पर और किस समय से अभिरक्षा में रखा गया तथा उसकी गिरफ्तारी की विधिक प्रक्रिया कब पूरी की गई।

यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि केवल पुलिस कार्रवाई की वीडियो रिकॉर्डिंग करना अपने आप में अपराध है या नहीं, और यदि वीडियो बनाने के कारण कोई आपराधिक कार्रवाई की गई तो उसमें आरोपित अपराध के आवश्यक तत्व क्या थे। यदि महिला पर कोई अन्य स्पष्ट एवं स्वतंत्र आरोप था, तो उसे भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना चाहिए। केवल यह धारणा कि कोई व्यक्ति पुलिस कार्रवाई का वीडियो बना रहा था, अपने आप में किसी व्यक्ति को दोषी सिद्ध नहीं करती।

इसी क्रम में सोशल मीडिया पर सक्रिय एक महिला यू-ट्यूबर श्रद्धा के संबंध में भी पूर्व में पुलिसकर्मियों द्वारा कथित दुर्व्यवहार और कैमरा ऑन किए जाने को लेकर विवाद की चर्चा सामने आई थी। यदि उस मामले में मारपीट या अभद्र व्यवहार का कोई प्रमाण उपलब्ध है, तो उसकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। पत्रकारिता, सोशल मीडिया कवरेज अथवा नागरिक द्वारा किसी सार्वजनिक कार्रवाई का रिकॉर्ड किया जाना और पुलिस कार्य में वास्तविक बाधा उत्पन्न करना—इन दोनों स्थितियों के बीच कानूनी अंतर को स्पष्ट रखना आवश्यक है।

राजेन्द्र नगर चौकी से संबंधित बताए जा रहे एक अन्य पारिवारिक विवाद में भी पुलिसकर्मियों के व्यवहार को लेकर आरोप सामने आया जिसमे एस सी युवती 2018 बेंच कास्टेबिक थप्पड़ मार रही  हैं। इसी प्रकार प्रशिक्षु पुलिसकर्मी और 2018 बेच कांस्टेबल से जुड़े कथित विवाद का वीडियो सोशल मीडिया पर सीमित रूप से प्रसारित होने की बात कही गई है। ऐसे मामलों में किसी महिला की गरिमा और निजता को ध्यान में रखते हुए वीडियो या पहचान को अनावश्यक रूप से प्रसारित न करना उचित है, लेकिन यदि घटना वास्तव में हुई है तो विभागीय स्तर पर निष्पक्ष जांच होना भी उतना ही जरूरी है।

लॉर्ड कार्नवालिस की स्थापित  पुलिस पर आजादी के इतने बर्षो बाद भी लोग भरोसा नही कर पाते ? 

इन घटनाओं को किसी जाति, वर्ग या समुदाय के चश्मे से देखने के बजाय कानून के समान और निष्पक्ष अनुपालन के प्रश्न के रूप में देखा जाना चाहिए। किसी महिला को केवल उसकी सामाजिक या जातीय पहचान के आधार पर कार्रवाई का शिकार बनाया गया—ऐसा निष्कर्ष बिना जांच के निकालना उचित नहीं होगा। लेकिन यदि किसी महिला को विधिक प्रक्रिया का पालन किए बिना लंबे समय तक थाने में बैठाया गया, उसके अधिकारों का उल्लंघन हुआ या बिना पर्याप्त आधार के सह-अभियुक्त बनाया गया, तो यह गंभीर प्रशासनिक और कानूनी प्रश्न अवश्य बनेगा।

सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि क्या पुलिस कार्रवाई में कानून, गिरफ्तारी की निर्धारित प्रक्रिया, महिला की गरिमा और नागरिकों के मौलिक अधिकारों का पूरी तरह पालन किया गया? यदि पुलिस के पास कार्रवाई का ठोस कानूनी आधार है तो उसे तथ्य और अभिलेखों के साथ स्पष्ट किया जाना चाहिए। वहीं यदि पुलिसकर्मियों की ओर से नियमों के उल्लंघन के प्रमाण मिलते हैं तो जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।

ऐसे मामलों में पारदर्शिता की कमी जनता में अविश्वास पैदा कर सकती है। विशेषकर जब लगातार पुलिस व्यवहार को लेकर वीडियो और आरोप सोशल मीडिया पर सामने आते हों, तब विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा तथ्यों की जांच कर निष्पक्ष स्थिति सार्वजनिक करना जरूरी हो जाता है।

लोकतंत्र में सरकार और पुलिस के प्रति जनता का विश्वास केवल कठोर कार्रवाई से नहीं, बल्कि निष्पक्षता, संवेदनशीलता, जवाबदेही और कानून के समान अनुपालन से मजबूत होता है। यदि किसी कार्रवाई में वास्तविक रूप से विधिक प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ है तो उसका सुधार होना चाहिए; और यदि आरोप तथ्यहीन हैं तो पुलिस को भी दस्तावेजी तथ्यों के साथ स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

यह हमारी लोक प्रिय सरकार दुश्मन है जो ऐसी कार्यवाही करते जबकि खुद फंसे रखे फर्जी वाड़े मे परसो आदेश हुआ।

दिखायेंगे खेल केश डायरी का 

जनसूचना से इतनी खुन्नस जवाब तो सही देते नही है फर्जी कार्यवाही जरूर कर देते।

इसी पारदर्शी प्रक्रिया से उन आशंकाओं पर भी विराम लगाया जा सकता है कि कहीं पुलिस की कुछ कार्रवाइयां अनावश्यक रूप से जनता में निराशा, असंतोष अथवा सरकार के प्रति अविश्वास का कारण तो नहीं बन रहीं। अंततः सवाल किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि कानून के राज और नागरिकों के विश्वास की रक्षा का है।
किसी ब्यक्ति को सात गोली मारी जा चुकी हो  उस ब्यक्ति को पर्याप्त सुरक्षा न दी जा रही और कोई मानवीय आधार पर सुरक्षा के लिए सपोर्ट करे तो इन्हें परेशानी होती यह सरकार बदन‍‍ाम व युवाओ गुस्सा भरने कबायद कर रहे है । यह महत्वपूर्ण पदो पर विराज गये लेकिन सोच सरकार व भाजपा प्रति नकारात्मक है घटना हो जाये तो आरोप सरकार लगे इनको तो पूरा तन्खावाह मिलनी ही है। मैने स्वयं नगर पालिका मे निरीक्षण के दौरान सिर्फ होमगार्ड देखा था। जब तक वहां रहे । बाकि आप स्पष्ट करे कितनी सुरक्षा दी या नही मुकदमा लिखने टाईम है लेकिन कितने दिनो एक ब्यक्ति परेशान कर रहे सरकार छबि धूमिल हो रही ।
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योगी जी के जनता दर्शन यह बातजरूर  रखेंगे आपसे बात-चीत सहयोगी से बातचीत रिकोर्डिंग सब कुछ सार्टिफेक्ट 65 b लगाकर  देंगे इन्ही  इस्पेक्टर साहाब के कार्यकाल मे 2021 की  पुर्नविवेचना बिना आदेश कट पेस्ट के दाखिल हुई। सब कुछ मे जिम्मेदारी तय होगी हम है ही क्या ? 

जिम्मेदारो को जवाब देह होना पढेगा । 

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नोट - ये इस्पेक्टर साहाब जो घटना हुई थी मंदिर मे अश्लील कृत्य उस पर यह धारा नही लगाये थे ।
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मुख्यमंत्री जी नरोत्तम‌ मिश्रा पूर्वग्रहमंत्री म०प्र० के पीछे पड़े रहे और अब यह घोटाला 
आवश्यकता की इस पर कड़क कानूनी कार्यवाही हो 
बाकि वो आपके अपने है बाद मे देखना ----- समंजस बन ही जायेंगा।

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