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शरद श्रीवास्तव

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सीतापुर से बाराबंकी अपने किसी कार्य से आए पुलिसकर्मी रजनीश सिंह भाई साहब हमारे आवास पर भेंट करने कुशलक्षेम लेने पहुंचे 🙏 बाराबंकी में लगभग 12 वर्ष तक आपने सेवा दी और लगभग दो वर्ष तक हमारे आवास पर आप रहे है।
जन्मदिन पर आशीर्वाद शुभाशीष प्यारी पोती रानी
बातों से नहीं, कर्मों से महान बनता है इंसान
सिर्फ अच्छा बोलने से कोई इंसान अच्छा नहीं बन जाता। नेकी, ईमानदारी, त्याग, करुणा और मानवता की बातें करना आसान है, लेकिन उन बातों को अपने जीवन में उतारना ही असली परीक्षा है। शब्दों से किसी के सामने अपनी अच्छाई साबित की जा सकती है, लेकिन कर्मों से ही यह साबित होता है कि इंसान वास्तव में कैसा है।
आज के दौर में हम अक्सर ऐसे लोगों से मिलते हैं जो दूसरों को ईमानदारी का पाठ पढ़ाते हैं, लेकिन स्वयं अपने स्वार्थ के लिए उसूलों को भूल जाते हैं। कोई त्याग की बातें करता है, लेकिन जब त्याग करने की बारी आती है तो पीछे हट जाता है। कोई गरीब और जरूरतमंद के प्रति करुणा की बड़ी-बड़ी बातें करता है, लेकिन सामने किसी मजबूर व्यक्ति को देखकर उसकी मदद करने के बजाय रास्ता बदल लेता है।
सच्ची नेकी वह नहीं है जिसकी चर्चा हर जगह हो, बल्कि वह है जो बिना किसी दिखावे के की जाए। सच्चा त्याग वह नहीं है जिसे दुनिया देखे और उसकी प्रशंसा करे, बल्कि वह है जिसमें इंसान अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर किसी दूसरे के हित के लिए कुछ छोड़ दे।
ईमानदारी का अर्थ केवल दूसरों को ईमानदारी का उपदेश देना नहीं है। ईमानदारी तब दिखाई देती है जब कोई व्यक्ति अकेला हो, उसके सामने गलत रास्ते से लाभ उठाने का अवसर हो और फिर भी वह सही रास्ता चुने।
करुणा भी केवल शब्दों में नहीं होती। किसी के दुख को सुन लेना अच्छी बात है, लेकिन उसके दुख को कम करने के लिए अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़ना उससे कहीं बड़ी बात है।
इंसान की असली पहचान उसके भाषणों से नहीं, उसके व्यवहार से होती है। वह अपने से कमजोर व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करता है, अपने स्वार्थ के सामने अपने सिद्धांतों को कितना बचा पाता है और किसी जरूरतमंद के लिए बिना किसी लाभ की उम्मीद के कितना खड़ा होता है—यही उसके चरित्र का वास्तविक परिचय है।
महान बनने के लिए बड़े-बड़े शब्दों की जरूरत नहीं होती। एक छोटा-सा सच्चा कर्म भी हजारों उपदेशों से बड़ा हो सकता है। किसी भूखे को भोजन देना, किसी परेशान व्यक्ति का साथ देना, किसी का अधिकार न छीनना, गलती होने पर उसे स्वीकार करना और अवसर मिलने पर भी किसी के साथ अन्याय न करना—यही वे छोटे-छोटे कर्म हैं जो इंसान को भीतर से बड़ा बनाते हैं।
इसलिए जीवन में नेकी की बातें जरूर करें, लेकिन उससे पहले नेकी को अपने आचरण का हिस्सा बनाएं। ईमानदारी का उपदेश जरूर दें, लेकिन पहले स्वयं ईमानदार बनें। त्याग और करुणा की चर्चा जरूर करें, लेकिन जब समय आए तो उन्हें निभाकर दिखाएं।
क्योंकि अच्छा बोलने वाला व्यक्ति कुछ समय के लिए प्रभावित कर सकता है, लेकिन अच्छा आचरण करने वाला व्यक्ति लंबे समय तक याद रहता है।
आखिरकार दुनिया हमारे शब्दों को नहीं, हमारे कर्मों को याद रखती है।
महानता बताने से नहीं मिलती, महानता जीने से मिलती है।
तीन दिनों की बारिश में टूटा पेड़ साथ में बिजली का खंभा लेकिन <nis:link nis:type=tag nis:id=बिजली_विभाग nis:value=बिजली_विभाग nis:enabled=true nis:link/> ने नहीं लिया कोई एक्शन बाराबंकी लखपेड़ाबाग मोहल्ला चित्रगुप्त नगर मोड़ पर, बिजली सप्लाई जारी कभी भी किसी के साथ हो सकती है कोई भी घटना दुर्घटना तार भी कई जगह जम्फर मार कर जुड़ा हुआ है,  टूटे खम्बे को आखिर क्यों नहीं बदला गया ??? अभी यही दिक्कत आम आदमी के साथ आ जाए तो लाइट काट देंगे ये लोग और परेशान अलग से करेंगे नोटिस व अन्य तरीके से 🥺 कमेन्ट बॉक्स में बताये क्या कहेंगे इस विषय पर आप???? MYogiAdityanath S.E. Barabanki Mvvnl
अजीमुद्दीन अशरफ इस्लामिया इंटर कॉलेज (निबलेट) बाराबंकी में चल रही प्रतियोगिता में बतौर मुख्य अतिथि पहुंचे भाजपा नेता राजा कासिम ने बच्चों को संबोधित किया तथा प्रतियोगिता में उत्तीर्ण छात्र छात्राओं को मेडल प्रदान किया
अगर 2026 का दौर न होता...
जरा सोचिए, अगर हम 2026 के दौर में नहीं, बल्कि उस समय में जी रहे होते जब राजा-महाराजाओं का शासन होता, सत्ता ही कानून होती और आम इंसान के अधिकारों की कोई स्पष्ट गारंटी नहीं होती—तो आज के हमारे पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय विवाद किस रूप में सामने आते?
आज किसी परिवार में संपत्ति को लेकर विवाद है, किसी समाज में विचारों को लेकर मतभेद है, कहीं राजनीतिक या सामाजिक असहमति है। इन सबके बीच हमारे पास न्यायालय हैं, पुलिस-प्रशासन है, कानून है और अपनी बात रखने के संवैधानिक रास्ते हैं। हर व्यक्ति को यह उम्मीद रहती है कि विवाद का अंतिम समाधान ताकत से नहीं, बल्कि कानून और न्याय की प्रक्रिया से होगा।
लेकिन उस दौर की कल्पना कीजिए, जब शासन की ताकत ही सबसे बड़ा हथियार हुआ करती थी। जहां राजा की इच्छा सर्वोपरि मानी जाती थी और कमजोर व्यक्ति के पास अपनी बात रखने के सीमित साधन होते थे। ऐसे समय में छोटी-सी बात भी बड़े संघर्ष का रूप ले सकती थी। जमीन, संपत्ति, सत्ता, सम्मान, परिवार या किसी पुराने विवाद को लेकर तलवारें खिंच सकती थीं और इंसानी जान की कीमत आज की तुलना में बेहद कम समझी जा सकती थी।
आज भी परिवारों में संपत्ति को लेकर झगड़े होते हैं, भाई-भाई में मनमुटाव होता है, रिश्तों में कटुता आती है। समाज में भी विचारों के मतभेद हैं। देश में राजनीतिक और वैचारिक असहमति भी दिखाई देती है। मगर लोकतांत्रिक व्यवस्था और कानून हमें यह रास्ता देते हैं कि असहमति के बावजूद हिंसा का सहारा न लिया जाए।
यही सभ्यता की सबसे बड़ी पहचान है।
सोचिए, अगर हर व्यक्ति अपने विवाद का फैसला स्वयं तलवार, बंदूक या ताकत के बल पर करने लगे, तो समाज में सबसे ताकतवर व्यक्ति ही सबसे सही नहीं, बल्कि सबसे प्रभावशाली व्यक्ति बन जाएगा। फिर न्याय और अन्याय के बीच अंतर करना कठिन हो जाएगा।
इसलिए आज के समय की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल आधुनिक तकनीक, बड़ी इमारतें या तेज रफ्तार जिंदगी नहीं है। असली उपलब्धि यह है कि इंसान ने धीरे-धीरे यह समझा कि विवाद का समाधान हिंसा से नहीं, संवाद और कानून से होना चाहिए।
हमारे परिवारों में भी यही सोच जरूरी है। जमीन-जायदाद के विवाद हों तो दस्तावेज और न्यायिक प्रक्रिया का सहारा लिया जाए। सामाजिक मतभेद हों तो बातचीत की जाए। राजनीतिक मतभेद हों तो अपनी बात लोकतांत्रिक तरीके से रखी जाए। किसी की बात पसंद न आए तो उसका जवाब तर्क से दिया जाए, हिंसा से नहीं।
क्योंकि समय बदल गया है, लेकिन इंसान के भीतर क्रोध, अहंकार और बदले की भावना आज भी मौजूद है। फर्क सिर्फ इतना है कि आधुनिक कानून और व्यवस्था हमें उन भावनाओं को हिंसा में बदलने से रोकने का रास्ता देती है।
हमें यह भी याद रखना चाहिए कि इतिहास को केवल गौरव की कहानियों के रूप में नहीं, बल्कि सीख के रूप में पढ़ना चाहिए। पुराने समय में सत्ता संघर्ष और हिंसक टकराव के अनेक उदाहरण मिलते हैं; इसलिए आज की पीढ़ी का दायित्व है कि वह उन परिस्थितियों को दोहराने के बजाय उनसे सबक ले।
आज हमारे हाथ में तलवार की जगह कानून की किताब है, बदले की जगह न्याय का रास्ता है और व्यक्तिगत ताकत की जगह संस्थागत व्यवस्था है।
इसीलिए परिवार हो, समाज हो या राष्ट्र—मतभेद होना असामान्य नहीं है, लेकिन उन मतभेदों को किस तरीके से सुलझाया जाता है, यही किसी सभ्य समाज की असली पहचान है।
समय चाहे कोई भी हो, इंसान की सबसे बड़ी जीत किसी दूसरे को हराने में नहीं, बल्कि अपने क्रोध पर विजय पाने और न्यायपूर्ण रास्ता चुनने में है।
दो दशक से ऊपर संघर्ष का दूसरा नाम मनोज श्रीवास्तव
जिसने जिन्दगी में सबसे अधिक खाया हो धोखा वो कैसे करेगा किसी पर भरोसा, फिर जिन्दगी में आगे बढ़ते जाना है तो जितनी बार गिरना फिर उठना और खड़े हो जाना है 🥰
रिश्तों में थोड़ी दूरी भी जरूरी है
रिश्ते, व्यवहार और अपनापन—थोड़ी दूरी में ही अक्सर खूबसूरत रहते हैं
रिश्ते जिंदगी की सबसे खूबसूरत दौलत हैं, लेकिन हर रिश्ते की अपनी एक सीमा होती है। कुछ रिश्ते दूर रहकर भी दिल के बेहद करीब रहते हैं, जबकि कुछ रिश्ते जरूरत से ज्यादा नजदीक आकर धीरे-धीरे बोझ बन जाते हैं।
कहते हैं न—हर चीज की अति नुकसानदायक होती है। यही बात रिश्तों पर भी लागू होती है।
रिश्तों में अपनापन होना जरूरी है, लेकिन हर दिन की बेवजह बातचीत, हर छोटी-बड़ी बात पर चर्चा, हर मामले में दखल और जरूरत से ज्यादा मेल-जोल कई बार उसी अपनापन को कमजोर कर देता है। शुरुआत में जो बातें अच्छी लगती हैं, वही लगातार दोहराए जाने पर खटकने लगती हैं। छोटी-छोटी बातों से गलतफहमियां पैदा होती हैं और फिर वही गलतफहमियां धीरे-धीरे मन में कड़वाहट का रूप ले लेती हैं।
दूरी का मतलब रिश्ते खत्म करना नहीं होता।
कभी-कभी दूरी रिश्तों को बचाने का सबसे समझदार तरीका होती है।
कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिन्हें रोज मिलने की जरूरत नहीं होती। महीनों बाद मिलिए, फिर भी अपनापन वही रहता है। क्योंकि वहां अपेक्षाएं कम होती हैं, शिकायतें कम होती हैं और एक-दूसरे की जिंदगी में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं होता।
वहीं दूसरी तरफ जब हम किसी रिश्ते में जरूरत से ज्यादा घुल-मिल जाते हैं, तो सामने वाले की कमियां ज्यादा दिखाई देने लगती हैं। उसकी बातें, आदतें और व्यवहार हमें प्रभावित करने लगते हैं। फिर छोटी-सी बात बड़ी लगती है, सामान्य मजाक अपमान लगने लगता है और सलाह हस्तक्षेप महसूस होने लगती है।
यही वजह है कि रिश्तों में प्रेम के साथ-साथ मर्यादा और एक-दूसरे की निजी सीमाओं का सम्मान भी जरूरी है।
हर बात जानना जरूरी नहीं।
हर बात बताना जरूरी नहीं।
हर बात पर राय देना जरूरी नहीं।
और हर रिश्ते में रोज उपस्थित रहना भी जरूरी नहीं।
कभी-कभी सामने वाले को उसकी जिंदगी जीने दीजिए और खुद भी अपनी जिंदगी में व्यस्त रहिए। जब मिलने का अवसर मिले तो पूरे मन से मिलिए, जब जरूरत हो तो पूरे दिल से साथ खड़े रहिए और जब दूरी जरूरी हो तो उसे भी सम्मानपूर्वक स्वीकार कीजिए।
रिश्तों की खूबसूरती इस बात में नहीं कि हम एक-दूसरे के कितने करीब हैं, बल्कि इस बात में है कि दूरी होने के बावजूद हमारे दिलों में एक-दूसरे के लिए सम्मान और अपनापन कितना बाकी है।
इसलिए रिश्तों को पकड़कर रखने की बजाय उन्हें सांस लेने की जगह दीजिए।
हर रिश्ता रोज की बातचीत का मोहताज नहीं होता।
कुछ रिश्ते दूर रहकर ही ज्यादा मजबूत रहते हैं, क्योंकि उनमें मुलाकात कम होती है लेकिन सम्मान, अपनापन और विश्वास बना रहता है।
याद रखिए—
रिश्तों में इतनी नजदीकी भी अच्छी नहीं कि अपनापन बोझ बन जाए और इतनी दूरी भी नहीं कि रिश्ता ही खत्म हो जाए। सही रिश्ता वही है जिसमें प्रेम भी हो, सम्मान भी हो और एक-दूसरे के लिए थोड़ी-सी जगह भी हो।
इतिहास बता देता है कि कौन सच्चा और कौन झूठा है अब मुर्गे नहीं जगाते है लोगों को बल्कि मोबाइल के अलार्म कुकड़ू कूं बोलते है 
<nis:link nis:type=tag nis:id=राम_राम nis:value=राम_राम nis:enabled=true nis:link/>
विश्वकर्मा श्रम योजना योजना के दस दिवसीय प्रशिक्षण शिविर के समापन अवसर पर बतौर मुख्य पहुंचे एमलसी 100006347646276:2048:Angad Kumar Singh 😱 18 सितंबर से 27 सितंबर 2026 तक चला प्रशिक्षण 🌹 हर तरह के कारीगरों को मिल रहा है विशेष अवसर प्रशिक्षण के साथ साथ मिल रहा है बैंक का अतिरिक्त लाभ 😱 देखिए वीडियो Part 7
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मेरी नन्ही सी प्यारी पोती मौज मस्ती करती खेलती हुई 😱 एक लाइक तो बनता है @highlight <nis:link nis:type=tag nis:id=गौरा_रूठ_गई_गीत nis:value=गौरा_रूठ_गई_गीत nis:enabled=true nis:link/> Sharad Srivastava Nitesh Srivastava Vijay Srivastava Yash Srivastava Ranjeet Bahadur Manoj Kumar Srivastav Harihar Kumar Srivastava Shyam Kumar Srivastava Vinay Srivastava Ratnesh Kumar Srivastav Sonam Sonam Dali Srivastava
जिसने जिन्दगी में सबसे अधिक खाया हो धोखा वो कैसे करेगा किसी पर भरोसा, फिर जिन्दगी में आगे बढ़ते जाना है तो जितनी बार गिरना फिर उठना और खड़े हो जाना है 🥰
रिश्तों में थोड़ी दूरी भी जरूरी है
रिश्ते, व्यवहार और अपनापन—थोड़ी दूरी में ही अक्सर खूबसूरत रहते हैं
रिश्ते जिंदगी की सबसे खूबसूरत दौलत हैं, लेकिन हर रिश्ते की अपनी एक सीमा होती है। कुछ रिश्ते दूर रहकर भी दिल के बेहद करीब रहते हैं, जबकि कुछ रिश्ते जरूरत से ज्यादा नजदीक आकर धीरे-धीरे बोझ बन जाते हैं।
कहते हैं न—हर चीज की अति नुकसानदायक होती है। यही बात रिश्तों पर भी लागू होती है।
रिश्तों में अपनापन होना जरूरी है, लेकिन हर दिन की बेवजह बातचीत, हर छोटी-बड़ी बात पर चर्चा, हर मामले में दखल और जरूरत से ज्यादा मेल-जोल कई बार उसी अपनापन को कमजोर कर देता है। शुरुआत में जो बातें अच्छी लगती हैं, वही लगातार दोहराए जाने पर खटकने लगती हैं। छोटी-छोटी बातों से गलतफहमियां पैदा होती हैं और फिर वही गलतफहमियां धीरे-धीरे मन में कड़वाहट का रूप ले लेती हैं।
दूरी का मतलब रिश्ते खत्म करना नहीं होता।
कभी-कभी दूरी रिश्तों को बचाने का सबसे समझदार तरीका होती है।
कुछ रिश्ते ऐसे होते हैं जिन्हें रोज मिलने की जरूरत नहीं होती। महीनों बाद मिलिए, फिर भी अपनापन वही रहता है। क्योंकि वहां अपेक्षाएं कम होती हैं, शिकायतें कम होती हैं और एक-दूसरे की जिंदगी में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं होता।
वहीं दूसरी तरफ जब हम किसी रिश्ते में जरूरत से ज्यादा घुल-मिल जाते हैं, तो सामने वाले की कमियां ज्यादा दिखाई देने लगती हैं। उसकी बातें, आदतें और व्यवहार हमें प्रभावित करने लगते हैं। फिर छोटी-सी बात बड़ी लगती है, सामान्य मजाक अपमान लगने लगता है और सलाह हस्तक्षेप महसूस होने लगती है।
यही वजह है कि रिश्तों में प्रेम के साथ-साथ मर्यादा और एक-दूसरे की निजी सीमाओं का सम्मान भी जरूरी है।
हर बात जानना जरूरी नहीं।
हर बात बताना जरूरी नहीं।
हर बात पर राय देना जरूरी नहीं।
और हर रिश्ते में रोज उपस्थित रहना भी जरूरी नहीं।
कभी-कभी सामने वाले को उसकी जिंदगी जीने दीजिए और खुद भी अपनी जिंदगी में व्यस्त रहिए। जब मिलने का अवसर मिले तो पूरे मन से मिलिए, जब जरूरत हो तो पूरे दिल से साथ खड़े रहिए और जब दूरी जरूरी हो तो उसे भी सम्मानपूर्वक स्वीकार कीजिए।
रिश्तों की खूबसूरती इस बात में नहीं कि हम एक-दूसरे के कितने करीब हैं, बल्कि इस बात में है कि दूरी होने के बावजूद हमारे दिलों में एक-दूसरे के लिए सम्मान और अपनापन कितना बाकी है।
इसलिए रिश्तों को पकड़कर रखने की बजाय उन्हें सांस लेने की जगह दीजिए।
हर रिश्ता रोज की बातचीत का मोहताज नहीं होता।
कुछ रिश्ते दूर रहकर ही ज्यादा मजबूत रहते हैं, क्योंकि उनमें मुलाकात कम होती है लेकिन सम्मान, अपनापन और विश्वास बना रहता है।
याद रखिए—
रिश्तों में इतनी नजदीकी भी अच्छी नहीं कि अपनापन बोझ बन जाए और इतनी दूरी भी नहीं कि रिश्ता ही खत्म हो जाए। सही रिश्ता वही है जिसमें प्रेम भी हो, सम्मान भी हो और एक-दूसरे के लिए थोड़ी-सी जगह भी हो।
दो दशक से ऊपर संघर्ष का दूसरा नाम मनोज श्रीवास्तव
अजीमुद्दीन अशरफ इस्लामिया इंटर कॉलेज (निबलेट) बाराबंकी में चल रही प्रतियोगिता में बतौर मुख्य अतिथि पहुंचे भाजपा नेता राजा कासिम ने बच्चों को संबोधित किया तथा प्रतियोगिता में उत्तीर्ण छात्र छात्राओं को मेडल प्रदान किया
अगर 2026 का दौर न होता...
जरा सोचिए, अगर हम 2026 के दौर में नहीं, बल्कि उस समय में जी रहे होते जब राजा-महाराजाओं का शासन होता, सत्ता ही कानून होती और आम इंसान के अधिकारों की कोई स्पष्ट गारंटी नहीं होती—तो आज के हमारे पारिवारिक, सामाजिक और राष्ट्रीय विवाद किस रूप में सामने आते?
आज किसी परिवार में संपत्ति को लेकर विवाद है, किसी समाज में विचारों को लेकर मतभेद है, कहीं राजनीतिक या सामाजिक असहमति है। इन सबके बीच हमारे पास न्यायालय हैं, पुलिस-प्रशासन है, कानून है और अपनी बात रखने के संवैधानिक रास्ते हैं। हर व्यक्ति को यह उम्मीद रहती है कि विवाद का अंतिम समाधान ताकत से नहीं, बल्कि कानून और न्याय की प्रक्रिया से होगा।
लेकिन उस दौर की कल्पना कीजिए, जब शासन की ताकत ही सबसे बड़ा हथियार हुआ करती थी। जहां राजा की इच्छा सर्वोपरि मानी जाती थी और कमजोर व्यक्ति के पास अपनी बात रखने के सीमित साधन होते थे। ऐसे समय में छोटी-सी बात भी बड़े संघर्ष का रूप ले सकती थी। जमीन, संपत्ति, सत्ता, सम्मान, परिवार या किसी पुराने विवाद को लेकर तलवारें खिंच सकती थीं और इंसानी जान की कीमत आज की तुलना में बेहद कम समझी जा सकती थी।
आज भी परिवारों में संपत्ति को लेकर झगड़े होते हैं, भाई-भाई में मनमुटाव होता है, रिश्तों में कटुता आती है। समाज में भी विचारों के मतभेद हैं। देश में राजनीतिक और वैचारिक असहमति भी दिखाई देती है। मगर लोकतांत्रिक व्यवस्था और कानून हमें यह रास्ता देते हैं कि असहमति के बावजूद हिंसा का सहारा न लिया जाए।
यही सभ्यता की सबसे बड़ी पहचान है।
सोचिए, अगर हर व्यक्ति अपने विवाद का फैसला स्वयं तलवार, बंदूक या ताकत के बल पर करने लगे, तो समाज में सबसे ताकतवर व्यक्ति ही सबसे सही नहीं, बल्कि सबसे प्रभावशाली व्यक्ति बन जाएगा। फिर न्याय और अन्याय के बीच अंतर करना कठिन हो जाएगा।
इसलिए आज के समय की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल आधुनिक तकनीक, बड़ी इमारतें या तेज रफ्तार जिंदगी नहीं है। असली उपलब्धि यह है कि इंसान ने धीरे-धीरे यह समझा कि विवाद का समाधान हिंसा से नहीं, संवाद और कानून से होना चाहिए।
हमारे परिवारों में भी यही सोच जरूरी है। जमीन-जायदाद के विवाद हों तो दस्तावेज और न्यायिक प्रक्रिया का सहारा लिया जाए। सामाजिक मतभेद हों तो बातचीत की जाए। राजनीतिक मतभेद हों तो अपनी बात लोकतांत्रिक तरीके से रखी जाए। किसी की बात पसंद न आए तो उसका जवाब तर्क से दिया जाए, हिंसा से नहीं।
क्योंकि समय बदल गया है, लेकिन इंसान के भीतर क्रोध, अहंकार और बदले की भावना आज भी मौजूद है। फर्क सिर्फ इतना है कि आधुनिक कानून और व्यवस्था हमें उन भावनाओं को हिंसा में बदलने से रोकने का रास्ता देती है।
हमें यह भी याद रखना चाहिए कि इतिहास को केवल गौरव की कहानियों के रूप में नहीं, बल्कि सीख के रूप में पढ़ना चाहिए। पुराने समय में सत्ता संघर्ष और हिंसक टकराव के अनेक उदाहरण मिलते हैं; इसलिए आज की पीढ़ी का दायित्व है कि वह उन परिस्थितियों को दोहराने के बजाय उनसे सबक ले।
आज हमारे हाथ में तलवार की जगह कानून की किताब है, बदले की जगह न्याय का रास्ता है और व्यक्तिगत ताकत की जगह संस्थागत व्यवस्था है।
इसीलिए परिवार हो, समाज हो या राष्ट्र—मतभेद होना असामान्य नहीं है, लेकिन उन मतभेदों को किस तरीके से सुलझाया जाता है, यही किसी सभ्य समाज की असली पहचान है।
समय चाहे कोई भी हो, इंसान की सबसे बड़ी जीत किसी दूसरे को हराने में नहीं, बल्कि अपने क्रोध पर विजय पाने और न्यायपूर्ण रास्ता चुनने में है।